यों तो गढ़वाल ही नहीं अपितु सारे उत्तराखंड में तीर्थ स्थलों, मंदिरों एवं सुरम्य पर्यटक स्थलों की भरमार है । इस धरोहर के लिए भारत ही नहीं पूरे विश्व में प्रसिद्द है इसी कारण हजारों तीर्थ यात्री एवं पर्यटक उत्तराखंड पहुँचते हैं।
प्रायः लोग मुख्य स्थानों , बदरीनाथ केदारनाथ , नैनीताल, कौसानी, मसूरी, हरिद्वार, ऋषिकेश, एवं गंगोत्री यामोत्री धाम की ओर रुख करते हैं। जो हमेशा के लिए अपने दर्शकों का मन मोह लेते हैं। परन्तु कई छोटे छोटे व् दुर्गम तीर्थ एवं पौराणिक , पर्यटक स्थल हैं जिनसे स्थानीय लोगों के सिवाय बाहर की दुनिया अभी भी अनभिज्ञ हैं।
आइये ऐसे ही कुछ स्थलों से आपका परिचय कराता हूँ :-
त्रिकुटी सरोवर ( तारा कुण्ड) - उत्तराखंड में कमलेश्वर ( पौड़ी गढ़वाल ) से लेकर बागेश्वर (कुमांऊ) तक फैला हुआ राष्ट्रकूट नामक पर्वत श्रृखला है । इस पर त्रिकुट नामक श्रेणी है । इस श्रेणी पर अकल्पनीय एक सुन्दर जलाशय एवं शिव मंदिर है जिसे तारकुंड या त्रिकुटी सरोवर भी कहते हैं। विरानेश्वर( विन्देश्वर या बिनसर ) भी इसी पर्वत श्रृखला पर स्थित है। इसका वर्णन स्कन्द पुराण में भी उपलब्ध है। लोगों के मतानुसार इस क्षेत्र का नाम राठ भी इसी पर्वत के नाम का विकृत रूप है।
तारा कुण्ड पौड़ी से लगभग ६० से ७० किलो मीटर की दूरी समुद्र ताल से १६०० मीटर की उचाई पर पट्टी धैज्युली ग्राम बडेथ के ठीक ऊपर चोटी पर स्थित है। यहाँ तक पहुचने के लिए पौड़ी से पैठाणी-चाकिसैन तक मोटर मार्ग तथा चकिसैन से पैदल सीधी खड़ी चढ़ाई लगभग ७- ८ किलोमीटर । चाकिसैन समुद्र तल से लगभग १५३० मी की उचाई पर स्थित है । दूसरा मार्ग पैठाणी से मोटर मार्ग होता हुआ सिर्तोली , पल्ली होते हुए ठीक बडेथ गाँव तक पहुंचा जा सकता है।
इस शिखर पर एक शिव मंदिर एवं सुन्दर जलाशय व् एक कुंवा है जिसकी गहराई १०-१२। मी बताई जाती है इस शिखर से दोनों ओर के सभी गाँव दृष्टिगोचर होते हैं। इतनी ऊँचाई पर होने के बावजूद पानी की उपलब्धता , एक तालाब और कुण्ड के रूप में अकल्पनीय लगती है। परन्तु यहाँ हर मौषम में पूरे साल पानी उपलब्ध रहता है।
भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी एवं phalgun शिवरात्रि पर मेले के आयोजन भी होता है। कृष्ण जन्माष्टमी पर इस सरोवर में प्रायः नील कमल खिले रहते हैं मन भावनी बरसात की हरियाली और वसंत पर खिलते लाल बुरांश इन मेलों की शोभा पर चार चाँद लगा देते हैं प्रकृति का यह मनोरम दृश्य बरबस मन को मोह लेता है।
मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक छोटी से गुफा नुमा सुरंग सी है कुछ वर्ष पहले यहं एक योगिनी रहा करती थी जब श्रद्धालु गुफा के आगे चावल या भेट स्वरूप पैसे रखते थे तो तो चूहे आकर वस्तुओं को उठाकर योगिनी तक ले जाते थे ऐसा योगिनी स्वयं बताती थी
किंवदंतियों के अनुसार भागीरथ जब आकाश मार्ग से गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास कर रहे थे कुछ छोटी सी जल धारा यहाँ पर पदार्पित हुई और और पानी का बहाव इतना तेज था किआज भी नीचे के गांवों ( ऐन्गार , कुटकांडई,) में स्पष्ट दिखाई देता है कि कभी यहाँ बढ़ जैसी आपदा आयी होगी बड़े बड़े शिलाखंड इस बात कि ओर कुछ तो इशारा करते हैं ।
कुटकांडई महदेव के ठीक ऊपर एक बहुत बड़ा शिलाखंड है जो दूर से देखने पर शीघ्र गिर जाने कि संभावना प्रतीत होती है कई वर्षोंसे यह एक छोटे पत्थर की ओट पर टिका हुआ है।
तारा कुण्ड की विशेषता तालाब और कुण्ड के पानी की है । बरसात में प्रायः तालाब का पानी गन्दा हो जाता है किन्तु साथ में ही कुण्ड का पानी बिलकुल स्वच्छ रहता है। कुण्ड के पानी को लोग गंगा जल की तरह घरों को लेकर जाते हैं निकासी के रूप में कुण्ड का पानी दो श्रोतो से कोटेश्वर( कुट कांडई ) महादेव तथा राहू के मंदिर पैठाणी में निकलता है।
राहू का मंदिर - त्रिकुट पर्वत की घाटी में , श्योलिगड़( रथ वाहिनी) एवं पश्चिमी नयार ( नवालिका ) के पुनीत संगम पर पैठाणी गाँव स्थित है। यहाँ पर राहू का मंदिर है । कुछ लोगों के मतानुसार यह मंदिर पांडवों तथा कुछ शंकराचार्य द्वारा निर्मित बताते है। इस मंदिर की उपरी शिखा कुछ झुकी हुई प्रतीत होती है। इस स्थान का नाम पैठाणी राहू के गोत्र पैठानासी के कारण पड़ा । "राठेनापुरादेभव पैठानासी गोत्र राहो इहागच्छेदनिष्ठ " और राहू के मंदिर के कारण संभवतः इस समूचे क्षेत्र का नाम राठ पड़ा । यहाँ के लोग पहले काले वस्त्र पहना करते थे चूँकि राहू को काले वस्तुए एवं वस्त्र पसंद है इसीलिए संभवतः काले वस्त्र प्रचलन में आये हों ।
पौड़ी से पैठाणी की दूरी लगभग ५०की मी है यहाँ तक सीधे मोटर मार्ग उपलब्ध है। मंदिर का निर्माण काल तथा बनावट के निश्चय हेतु पुरातत्वा वेताओं का अध्यन आवश्यक है। फिलहाल यह मदिर भारतीय पुरातत्वा विभाग के संरक्षण में है। सरकार को चाहिए ऐसे स्थलों की ओर ध्यान देकर उनका पुनरुधार तथा संदार्यी करण एवं विकास करना चाहिए।
शिन्गोड़-इसी राष्ट्रकूट पर्वत श्रृखला पर दूधातोली वन प्रखंड में शिन्गोड़ नामक स्थान है। जिसे रिस्ती की भरवाडी भी कहते है रिस्ती रथ क्षेत्र का आखिरी गाँव है। चाकी सैन से रिस्ती की दूरी लगभर ३५-४० कि मी
है। यहं के लिए माना जाता है कि रामायण कालीन महर्षि श्रृंग का आश्रम है यह क्षेत्र प्राकृतिक सम्पदा एवं सुन्दरता के लिए अलोकिक रूप से धनी है।
स्कन्द पुराण के अनुसार इस आश्रम के पास से ही वहां की तीन प्रमुख नदियों का उदगम स्थल है।ये नदियाँ रथवाहिनी , नावालिका , तथा व्यास गंगा कहलाती हैं । रथ वाहिनी ( स्योलिगड़ ) तथा नावालिका ( पश्चिमी नयार ) दोनों पैठाणी में संगम करती हैं तथा ये दोनों मिलकर व्यास गंगा( पूर्वी नयार) के साथ सतपुली संगम करते हैं ।
इस क्षेत्र में अन्न और दूध, घी तथा शहद कि प्रचुरता पाई जाती है।
इतने पौराणिक स्थलों एवं प्राकृतिक सुन्दरता की अनुपम छटा लिए हुए होने पर भी ये सभी स्थान विकास की गति से दूर हैं यदि यहाँ पर सुविधाएं एवं संरक्षण सरकार द्वारा प्रदान किया जाय तो ये सभी स्थल पर्यटन और तीर्थ के रूप में उभर सकते हैं। इन स्थानों पर पर्याप्त शोध की आवश्यकता है। जिससे पर्यटन में नया अध्याय जुड़ सके ।
मंगलवार, 4 जनवरी 2011
शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010
नव वर्ष की शुभकामनाये
सभी ब्लागरों , पाठकों, लेखकों व् नागरिकों, को सहृदय, नव आगंतुक वर्ष के लिए, हार्दिक शुभ कामनाएं ,
.आशा करता हूँ कि सभी के लिए नव वर्ष में अपार हर्ष और खुशियाँ आयें आपका लेखन दिनोदिन मर्म और जीवंत हो उठे जिससे समाज और देश का गौरव बढ़ सके .
इस सन्देश को पढने तक संभवतः नव वर्ष आपकी दहलीज पार करचुका होगा !
शनिवार, 25 दिसंबर 2010
शिक्षा सभी के लिए , सभी के द्वारा ,सामान्य रूप से पोषित हो
भारत सरकार ने बुनियादी रूप से शिक्षा के लिए कानून तो बना लिया किन्तु इस कानून का हस्र इस तरह भयावह हो जायेगा शायद कल्पना नहीं की होगी . आजकल दिल्ली के स्कूलों में भारी गहमागहमी बनी हुई है दिल्ली की सरकार ने प्रवेश की छूट तो उन्हें दे दी किन्तु मनमानी के लिए पूरी लगाम हाथ में रखी हुई है या यों कहे की मिल बाँट की बंदर बाँट होने जा रही है. सभी समाचार पत्र इन दिनों नर्सरी प्रवेश की सुर्खियाँ बनाने में लगे हुये हैं.
इन नौ निहालों को स्कूल भेजना , पढाना, टेढ़ी खीर होती जा रही है कभी तो जमाना था लोगो को पढ़ने से लाभ नहीं दिखाई देता था और अब लोगो की जरूरत बनी , जागरूकता के कारण , तो शिक्षा दो कदम दूर होती जा रही है. माध्यम वर्गीय लोगों के लिए तो आज शिक्षा दूभर बन गयी है शिक्षा एक अभिशाप्प की तरह पनप रही है जब कि कभी अशिक्षा अभिशाप का पर्याय हुआ करती थी .
प्राइवेट स्कूलों में फ़ीस की मात्रा इतनी अधिक है कि हर व्यक्ति इसे वहन करने में समर्थ नहीं है सरकारी स्कूलों की हालत बदतर बनी हुई है यहाँ तो माद्यम और धनाड्य वर्ग के बीच एक बड़ी लाइन खींचती हुई दृष्टिगोचर होती है पूंजीवादी वर्ग अपने हितों के आगे सभी का शोषण इस तरह कर देना चाहता है कि पुनः कोई भी शिक्षा के लिए किसी स्कूल को खोजना बंद कर दे . सरकारें इन लोगों कि बंधक बनती जा रही हैं. और ये स्कूल सरकार को ब्लाक्मैल करने पर तुले हुए है.
प्रवेश की इतनी जटिल प्रक्रिया बन गयी है कि विश्वविद्यालयों व् M B A 's की CAT ,MAT XAT आदि प्रवेश परीक्षाएं भी कमतर लग रही हैं कितने ही वर्ग उसमे बने है एक नया वर्ग पैदा हुआ है अलुमिनी . ना जाने इन सब के पीछे लूट का मकसद है या फिर कानून को विफल करने की सफल कोशिश . नर्सरी की फीस प्रति वर्ष ३००००/ से लेकर १०००००/ और इससे भी ज्यादा हो सकती है
गरीब के बच्चों के कोटे में प्रवेश पर समर्थ व्यक्ति से फ़ीस वसूलने का फार्मूला भी गजब ढा रहा है. गरीब की परिभाषा भी परिभाषित नहीं है अर्थात गरीब के नाम पर अमीर के बच्चों को ही प्रवेश की चाल स्पष्ट दिखाई दे रही है, पोईन्ट्स, और लाटरी के शिष्टम, दोनों में अंतर किया जा रहा है हर स्कूल अपने मन मफिग पॉइंट्स या लाटरी शिष्टम अपना रहा है हित स्कूल का ही साधा जा रहा है
इतनी जटिलताये उन बच्चों के लिए जिन्होंने अभी पूरी तरह से आंख भी ना खोली है जिनके प्रकृति के साथ अठखेलियाँ करने के दिन है क्यों उन्ही के लिए इस तरह की जटिलताएं पनप रही है. समाज और सरकार,इन बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करके, . क्या प्राप्त करना चाहती है ?
इतनी जटिलताओं में घिरने के बजाय तो इन्हें सीधी MBA प्रवेश की पात्रता क्यों ना दी जाय ताकि बड़े होने पर पुनः M B A के लिए पात्रता ना हाशिल करनी पढ़े ? शिक्षा मूल अधिकार है उसे हर व्यक्ति और बच्चे के लिए उपलब्ध होना चाहिए उसके दरवाजे तक . धन की कीमत पर शिक्षा की दुकानदारी ने सभी मूल्यों को चौपट कर दिया है. समाज की विकृतियाँ , बेरोजगारी . इस अवमूल्यन की प्रमुख देन हैं . शिक्षा सभी के लिए , सभी के द्वारा ,सामान्य रूप से पोषित हो . तभी समाज का समुचित विकास संभव है
इन नौ निहालों को स्कूल भेजना , पढाना, टेढ़ी खीर होती जा रही है कभी तो जमाना था लोगो को पढ़ने से लाभ नहीं दिखाई देता था और अब लोगो की जरूरत बनी , जागरूकता के कारण , तो शिक्षा दो कदम दूर होती जा रही है. माध्यम वर्गीय लोगों के लिए तो आज शिक्षा दूभर बन गयी है शिक्षा एक अभिशाप्प की तरह पनप रही है जब कि कभी अशिक्षा अभिशाप का पर्याय हुआ करती थी .
प्राइवेट स्कूलों में फ़ीस की मात्रा इतनी अधिक है कि हर व्यक्ति इसे वहन करने में समर्थ नहीं है सरकारी स्कूलों की हालत बदतर बनी हुई है यहाँ तो माद्यम और धनाड्य वर्ग के बीच एक बड़ी लाइन खींचती हुई दृष्टिगोचर होती है पूंजीवादी वर्ग अपने हितों के आगे सभी का शोषण इस तरह कर देना चाहता है कि पुनः कोई भी शिक्षा के लिए किसी स्कूल को खोजना बंद कर दे . सरकारें इन लोगों कि बंधक बनती जा रही हैं. और ये स्कूल सरकार को ब्लाक्मैल करने पर तुले हुए है.
प्रवेश की इतनी जटिल प्रक्रिया बन गयी है कि विश्वविद्यालयों व् M B A 's की CAT ,MAT XAT आदि प्रवेश परीक्षाएं भी कमतर लग रही हैं कितने ही वर्ग उसमे बने है एक नया वर्ग पैदा हुआ है अलुमिनी . ना जाने इन सब के पीछे लूट का मकसद है या फिर कानून को विफल करने की सफल कोशिश . नर्सरी की फीस प्रति वर्ष ३००००/ से लेकर १०००००/ और इससे भी ज्यादा हो सकती है
गरीब के बच्चों के कोटे में प्रवेश पर समर्थ व्यक्ति से फ़ीस वसूलने का फार्मूला भी गजब ढा रहा है. गरीब की परिभाषा भी परिभाषित नहीं है अर्थात गरीब के नाम पर अमीर के बच्चों को ही प्रवेश की चाल स्पष्ट दिखाई दे रही है, पोईन्ट्स, और लाटरी के शिष्टम, दोनों में अंतर किया जा रहा है हर स्कूल अपने मन मफिग पॉइंट्स या लाटरी शिष्टम अपना रहा है हित स्कूल का ही साधा जा रहा है
इतनी जटिलताये उन बच्चों के लिए जिन्होंने अभी पूरी तरह से आंख भी ना खोली है जिनके प्रकृति के साथ अठखेलियाँ करने के दिन है क्यों उन्ही के लिए इस तरह की जटिलताएं पनप रही है. समाज और सरकार,इन बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करके, . क्या प्राप्त करना चाहती है ?
इतनी जटिलताओं में घिरने के बजाय तो इन्हें सीधी MBA प्रवेश की पात्रता क्यों ना दी जाय ताकि बड़े होने पर पुनः M B A के लिए पात्रता ना हाशिल करनी पढ़े ? शिक्षा मूल अधिकार है उसे हर व्यक्ति और बच्चे के लिए उपलब्ध होना चाहिए उसके दरवाजे तक . धन की कीमत पर शिक्षा की दुकानदारी ने सभी मूल्यों को चौपट कर दिया है. समाज की विकृतियाँ , बेरोजगारी . इस अवमूल्यन की प्रमुख देन हैं . शिक्षा सभी के लिए , सभी के द्वारा ,सामान्य रूप से पोषित हो . तभी समाज का समुचित विकास संभव है
शनिवार, 18 दिसंबर 2010
बुन्खाल में काली की पूजा और पशु संहार
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके , शरण्यं त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते .
उत्तराखंड देव भूमि कहलाती है तमाम देवी देवताओं का निवास स्थल है उत्तराखंड . मान्यताएं और आस्था का अनुपमन संगम .
प्राकृतिक सुन्दरता और वैभव से सुसज्जित . किन्तु इसके साथ हैं कुछ अभिशप्त करने वाली आस्थाएं जैसे विभिन्न देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए की गयी पशु बलि मनोतियां .
पशु बलि वंहा पर अक्षर सभी देवी देवताओं को चढ़ाई जाती है किन्तु माँ काली के सम्मुख तो असंख्य पशुओं को एक साथ निर्मम संहार होता है माँ काली का प्रभाव तो सबसे अधिक पशिचिमी बंगाल में था परन्तु आज वहां पर बलि प्रथा समाप्त हो चुकी है. प्रतीकात्मक बलि तो आज भी दी जाती है पशु हत्या पर रोक लग चुकी है. . उत्तराखंड ने अभी भी इस प्रथा को कायम रखा है.
गढ़वाल क्षेत्र में, बुन्खाल में काली माँ का थाल है यहाँ पर हर वर्ष मार्गशीर्ष के महीने में भव्य मेला लगता है दूर दूर तक के लोग यहं मेला देखने, अपनी मनोती मनाने और पूर्ण हुई मनोती की पूर्णाहुति देने पहुँचते हैं .
घटना कुछ सत्य बातों पर आधारित है, उनिस्व्वी शताब्दी के उतरार्ध में किसी समय कुछ गाँव के बच्चे इन खेतों के पास गाय बछियों के साथ खेलते रहे किसी विवाद या खेल के कारण इन बच्चों ने किसी लड़की को गढ़े में गाढ़ दिया और सारे बच्चे घर चले गए किन्तु उस लड़की को बाहर निकालना भूल गए फलस्वरूप उसकी म्रत्यु हो गयी जब घर में खोज की गयी तो उसका कही पता नहीं चला . कहते है उस लड़की ने अपनी माँ को सपने में अपने मरने की व्यथा सुनाई और ये भी कहा की मुझे वहां से मत निकालना मैं देवी के रूप में परवर्तित हो चुकी हूँ . कहते है कभी देर रात्रि तक जो लोग घर नहीं पहुँच पाते थे या किसी प्रकार का खतरा होता था तो वह आवाज देकर उन्हें सचेत करती थी जंगली जानवरों से , लुटेरों डाकुओं आदि खतरों से स्थानीय लोगो को सचेत करती रहती थी . सचेत ही नहीं सुरक्षा भी करती थी
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गढ़वाल में गोरखे आततायी बन कर आये इसी समय गढ़वाल की सुरक्षा के लिए गढ़वाल नरेश ने ब्रिटिश शासन से मदद मांगी थी . उस समय भी काली ने लोगों को सुरक्षा के लिए सचेत किया था उसकी आवाज गोरखों के कानो में पड़ी और उन्होंने उसे गढ़े से निकालकर उसी गढ़े में उल्टा गाढ़ दिया तब से उसकी आवाजे लगनी बंद हो गयी .
इसी महत्व के कारण यहाँ पर प्रारंभ से ही मेला लगता रहा और पशु बलिया होती चली आ रही हैं. सैकणों निरीह भैसा ( बागी) और मेढ़ो (खाडू) की बालियाँ दी जारही हैं.
कुछ समय से प्रशासन यहाँ लोगों को चेतावनियाँ देता आ रहा था कई बार पुलिस बल तैनात भी किये गए कितुं आस्था का सैलाब पुलिस और प्रशासन को बौना कर देता और वे सिर्फ मेले के दर्शक बन कर रह जाते . सुना है इस बार प्रशासन ने पहले ही इसके लिए कुछ व्यवस्था बनाई और किसी सीमा तक सफलता भी प्राप्त की अर्थात कुछ लोगो ने प्रशासन के रुख को देखते हुए अपने कार्यकर्म या रद्द कर दिए या उन में परिवर्तन किया जो लोग पशुओं को लेकर वहां पहुचे उन्हें रोका तो नहीं कितु उन्हें परंपरागत तरीके से बलि देने में परेशानी हुई क्योंकि मुख्य हन्ता ( जो सबसे पहले पशु पर तलवार आंशिक रूप से चलाता है) भी अनुपस्थित रहे .
खबर है की अब प्रशासन उन पर मुकदमें चलाने की फिराक में है. अन्ततोगत्वा अब लोग भी धीरे धीरे जागरूक होते जा रहे हैं . इस सारी सफलता के लिए स्थानीय गाँव के लोग ही स्वयं आगे आये आशा है भविष्य में इस पर पूरी तरह से रोक लग सके कानूनी रोक जरूरी नहीं है लोगो की जागृत भावना इस दिशा में काम करे त्तभी सफलता मिलेगी . बुन्खाल का तो मात्र जिक्र है ऐसी कई जगहे है जहा पर सामूहिक रूप से इस तरह की पशु बलि का आयोजन होता है. और लोग अपने स्वार्थ को सिद्ध करते पाए जाते हैं.
मां काली उन्हें सद बुद्धि प्रदान करे और इन पशुओं की अभिवृद्धि हो सके जो अब इन बालियों के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं.
उत्तराखंड देव भूमि कहलाती है तमाम देवी देवताओं का निवास स्थल है उत्तराखंड . मान्यताएं और आस्था का अनुपमन संगम .
प्राकृतिक सुन्दरता और वैभव से सुसज्जित . किन्तु इसके साथ हैं कुछ अभिशप्त करने वाली आस्थाएं जैसे विभिन्न देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए की गयी पशु बलि मनोतियां .
पशु बलि वंहा पर अक्षर सभी देवी देवताओं को चढ़ाई जाती है किन्तु माँ काली के सम्मुख तो असंख्य पशुओं को एक साथ निर्मम संहार होता है माँ काली का प्रभाव तो सबसे अधिक पशिचिमी बंगाल में था परन्तु आज वहां पर बलि प्रथा समाप्त हो चुकी है. प्रतीकात्मक बलि तो आज भी दी जाती है पशु हत्या पर रोक लग चुकी है. . उत्तराखंड ने अभी भी इस प्रथा को कायम रखा है.
गढ़वाल क्षेत्र में, बुन्खाल में काली माँ का थाल है यहाँ पर हर वर्ष मार्गशीर्ष के महीने में भव्य मेला लगता है दूर दूर तक के लोग यहं मेला देखने, अपनी मनोती मनाने और पूर्ण हुई मनोती की पूर्णाहुति देने पहुँचते हैं .
घटना कुछ सत्य बातों पर आधारित है, उनिस्व्वी शताब्दी के उतरार्ध में किसी समय कुछ गाँव के बच्चे इन खेतों के पास गाय बछियों के साथ खेलते रहे किसी विवाद या खेल के कारण इन बच्चों ने किसी लड़की को गढ़े में गाढ़ दिया और सारे बच्चे घर चले गए किन्तु उस लड़की को बाहर निकालना भूल गए फलस्वरूप उसकी म्रत्यु हो गयी जब घर में खोज की गयी तो उसका कही पता नहीं चला . कहते है उस लड़की ने अपनी माँ को सपने में अपने मरने की व्यथा सुनाई और ये भी कहा की मुझे वहां से मत निकालना मैं देवी के रूप में परवर्तित हो चुकी हूँ . कहते है कभी देर रात्रि तक जो लोग घर नहीं पहुँच पाते थे या किसी प्रकार का खतरा होता था तो वह आवाज देकर उन्हें सचेत करती थी जंगली जानवरों से , लुटेरों डाकुओं आदि खतरों से स्थानीय लोगो को सचेत करती रहती थी . सचेत ही नहीं सुरक्षा भी करती थी
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गढ़वाल में गोरखे आततायी बन कर आये इसी समय गढ़वाल की सुरक्षा के लिए गढ़वाल नरेश ने ब्रिटिश शासन से मदद मांगी थी . उस समय भी काली ने लोगों को सुरक्षा के लिए सचेत किया था उसकी आवाज गोरखों के कानो में पड़ी और उन्होंने उसे गढ़े से निकालकर उसी गढ़े में उल्टा गाढ़ दिया तब से उसकी आवाजे लगनी बंद हो गयी .
इसी महत्व के कारण यहाँ पर प्रारंभ से ही मेला लगता रहा और पशु बलिया होती चली आ रही हैं. सैकणों निरीह भैसा ( बागी) और मेढ़ो (खाडू) की बालियाँ दी जारही हैं.
कुछ समय से प्रशासन यहाँ लोगों को चेतावनियाँ देता आ रहा था कई बार पुलिस बल तैनात भी किये गए कितुं आस्था का सैलाब पुलिस और प्रशासन को बौना कर देता और वे सिर्फ मेले के दर्शक बन कर रह जाते . सुना है इस बार प्रशासन ने पहले ही इसके लिए कुछ व्यवस्था बनाई और किसी सीमा तक सफलता भी प्राप्त की अर्थात कुछ लोगो ने प्रशासन के रुख को देखते हुए अपने कार्यकर्म या रद्द कर दिए या उन में परिवर्तन किया जो लोग पशुओं को लेकर वहां पहुचे उन्हें रोका तो नहीं कितु उन्हें परंपरागत तरीके से बलि देने में परेशानी हुई क्योंकि मुख्य हन्ता ( जो सबसे पहले पशु पर तलवार आंशिक रूप से चलाता है) भी अनुपस्थित रहे .
खबर है की अब प्रशासन उन पर मुकदमें चलाने की फिराक में है. अन्ततोगत्वा अब लोग भी धीरे धीरे जागरूक होते जा रहे हैं . इस सारी सफलता के लिए स्थानीय गाँव के लोग ही स्वयं आगे आये आशा है भविष्य में इस पर पूरी तरह से रोक लग सके कानूनी रोक जरूरी नहीं है लोगो की जागृत भावना इस दिशा में काम करे त्तभी सफलता मिलेगी . बुन्खाल का तो मात्र जिक्र है ऐसी कई जगहे है जहा पर सामूहिक रूप से इस तरह की पशु बलि का आयोजन होता है. और लोग अपने स्वार्थ को सिद्ध करते पाए जाते हैं.
मां काली उन्हें सद बुद्धि प्रदान करे और इन पशुओं की अभिवृद्धि हो सके जो अब इन बालियों के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं.
मंगलवार, 7 दिसंबर 2010
बुधवार, 1 दिसंबर 2010
तीन पीढ़ियों की मित्रता का पुरुस्कार - फूट डालो गलत फहमियां पैदा करो
कल ही दिव्या के द्वारा लिखा " क्या आपके पास एक आदर्श मित्र है ? - श्री कृष्ण जैसा " आलेख पढ़ा और संक्षिप्त समीक्षा के बाद अपने कार्यो में लग गया . आलेख दिमाग में पर यो हावी होता गया की मेरा ध्यान अभी अभी गाँव में हुई एक छोटी सी घटना पर आ पड़ा . जिसने इस आलेख की विस्तृत समीक्षा, व्याख्या और प्रकरण जनित बातें स्पष्ट का दी
.वर्तमान में हमारे गाँव के ग्राम प्रधान महोदय , का बचपन बड़ी ही गरीबी, अभावों और विकटताओं से जूझता हुआ प्रगतिशेल होता है . आस्सम रायफल की नौकरी से प्रारंभ हुई प्रगति I T B P की नौकरी तक निरंतर चलती रही. आवश्यकता के अनुरूप , खेती, मवेशी, घर, मकान, सभी कुछ जोड़ा कभी पनघट के पिसे आटा की भगोड़ी ( जब लोग आटा पीसते हैं तो लोग घरात मालिक को दोनों हाथ के हथेलियों पर जितना आटा आ सके पारिश्रमिक के रूप में देते हैं ) पर निर्भर जिन्दगी को बदल दिया . अपने सबसे छोटे भाई को स्नातकोत्तर की पढाई उपलब्ध करवाई . ये छोटे साहब बड़े ही कूटनीतिक किस्म के इंसान हैं बचपन में कुत्तों और बैलों के लड़ाई करवाने वाला व्यक्ति आज लोगो की लड़ाई सफाई से करवाता है और बाद में सुलह के लिए भी खुद पहुच जाता है . प्रधान जी I T B P में ड्राइवर थे तो द्रैवारी से कमाया भी खूब . प्रगति देखते ही सभी की प्रसंसा का पात्र भी बना रहा . रिटायर होने बाद व्यक्ति ने धनार्जन औ बहु बलिष्ठ होने कारण कुछ अख्खड़ स्वभाव ग्रहण कर लिया यानि कभी भी किसी को कुछ भी कह दो
धन प्रदर्शन की बारी आयी तब जब महोदय ग्राम प्रधान के चुनाव के लिए उठे . हमारे परिवार का और इनके परिवार का तीन पीढ़ियों का प्रेम और मित्रता रही है गाँव में कई दंश झेलने की शक्ति उन्हें मेरे दादाजी लोगो से मिलती रही है यानि पक्का प्रेम और पक्का साहचर्य . दोनों परिवार एक दूसरे के पूरक रहे है वर्तमान तक हम अभी भी इन लोगो को हर भले बुरे काम में पारिवारिक रूप में शामिल करते रहे है. किसी कारण वश प्रधानी के चुनाव हमारे परिवार की नाराजगी का परिणाम उनेह हार से देखना पड़ा . परन्तु अगली बार गलती को सुधारते हुए महोदय को समर्थन भी मिला और प्रधानी भी . यानी यहाँ पर भी मित्रता का पलड़ा भारी रहा .
१७ नवम्बर को मेरी भतीजी कि शादी संपन्न हुई और २२ नवम्बर को हमारी जेष्ठ स्वर्गीय भाभी का वार्षिक पिंडदान था पिंडदान में हमारे यहाँ तीन दिन तक परिक्रिया चलती रहती है अर्थात २० नवम्बर से निकट पारिवारिक मेहमानों का आगमन शुरू हो गया था २१ ता को अन्य परिचित मित्र रिस्तेदार आदि लोग सम्मिलित होते हैं . तो बात २० नम्बर की है मैं दिन में ही काम काज के देख भाल के लिए नीचे बड़े भाई के घर में चले गया ( हमारा घर गाँव में सबसे ऊपर है आने जाने में लगभग दस से पंद्रह मिनट लगते हैं ) मेरे साथ मेरा भतीजा कपिल भी था सारे काम , बैठने की व्यवस्था , खाने पीने के व्यवस्था आदि सभी कार्यों को निपटाने लगे .
प्रधान जी बड़े भाई जी के निकटतम पडोसी भी हैं , शाम को मित्रगनो के लिए कुछ विशेष प्रबंध किये जा रहे थे , और प्रधान जी सादर आमंत्रित थे . जैसे प्रधान जी का आगमन हुआ और बैठते ही प्रधान जी बड़े भाई से कहते है " दाताराम देखो मोहन (मेरे अपने सगे दूसरे नम्बर के भाई का नाम है ) के परिवार वाले तो सब ऊपर में गप्पें लड़ा रहे है. मैंने अभी आते समय उन्हें फटकार लगायी तो वे अब पहुंचे " आगे कि बात को भापते हुए मैंने उन्हें टोक दिया उन्हें अँधेरे में मेरी उपस्थिति का भान नहीं था यानि हमारे पारिवारिक मामलेमें दखल देकर मित्रताका अनूठा नारदीय परिचय देना था जिसे परिवार के बीच फूट और गल्फह्मियाँ पैदा हो सकें . मेरे अवरोध और विरोध के बाद श्रीमान जी उठ कर चल दिए किसी ने भी नहीं रोका .
तो ये था तीन पीढ़ियों कि मित्रता का परिणाम और पुरूस्कार फूट डालो और राज करो . घरों में आग लगावो और फिर पानी भी दिखाओ बुझाने के लिए .
.वर्तमान में हमारे गाँव के ग्राम प्रधान महोदय , का बचपन बड़ी ही गरीबी, अभावों और विकटताओं से जूझता हुआ प्रगतिशेल होता है . आस्सम रायफल की नौकरी से प्रारंभ हुई प्रगति I T B P की नौकरी तक निरंतर चलती रही. आवश्यकता के अनुरूप , खेती, मवेशी, घर, मकान, सभी कुछ जोड़ा कभी पनघट के पिसे आटा की भगोड़ी ( जब लोग आटा पीसते हैं तो लोग घरात मालिक को दोनों हाथ के हथेलियों पर जितना आटा आ सके पारिश्रमिक के रूप में देते हैं ) पर निर्भर जिन्दगी को बदल दिया . अपने सबसे छोटे भाई को स्नातकोत्तर की पढाई उपलब्ध करवाई . ये छोटे साहब बड़े ही कूटनीतिक किस्म के इंसान हैं बचपन में कुत्तों और बैलों के लड़ाई करवाने वाला व्यक्ति आज लोगो की लड़ाई सफाई से करवाता है और बाद में सुलह के लिए भी खुद पहुच जाता है . प्रधान जी I T B P में ड्राइवर थे तो द्रैवारी से कमाया भी खूब . प्रगति देखते ही सभी की प्रसंसा का पात्र भी बना रहा . रिटायर होने बाद व्यक्ति ने धनार्जन औ बहु बलिष्ठ होने कारण कुछ अख्खड़ स्वभाव ग्रहण कर लिया यानि कभी भी किसी को कुछ भी कह दो
धन प्रदर्शन की बारी आयी तब जब महोदय ग्राम प्रधान के चुनाव के लिए उठे . हमारे परिवार का और इनके परिवार का तीन पीढ़ियों का प्रेम और मित्रता रही है गाँव में कई दंश झेलने की शक्ति उन्हें मेरे दादाजी लोगो से मिलती रही है यानि पक्का प्रेम और पक्का साहचर्य . दोनों परिवार एक दूसरे के पूरक रहे है वर्तमान तक हम अभी भी इन लोगो को हर भले बुरे काम में पारिवारिक रूप में शामिल करते रहे है. किसी कारण वश प्रधानी के चुनाव हमारे परिवार की नाराजगी का परिणाम उनेह हार से देखना पड़ा . परन्तु अगली बार गलती को सुधारते हुए महोदय को समर्थन भी मिला और प्रधानी भी . यानी यहाँ पर भी मित्रता का पलड़ा भारी रहा .
१७ नवम्बर को मेरी भतीजी कि शादी संपन्न हुई और २२ नवम्बर को हमारी जेष्ठ स्वर्गीय भाभी का वार्षिक पिंडदान था पिंडदान में हमारे यहाँ तीन दिन तक परिक्रिया चलती रहती है अर्थात २० नवम्बर से निकट पारिवारिक मेहमानों का आगमन शुरू हो गया था २१ ता को अन्य परिचित मित्र रिस्तेदार आदि लोग सम्मिलित होते हैं . तो बात २० नम्बर की है मैं दिन में ही काम काज के देख भाल के लिए नीचे बड़े भाई के घर में चले गया ( हमारा घर गाँव में सबसे ऊपर है आने जाने में लगभग दस से पंद्रह मिनट लगते हैं ) मेरे साथ मेरा भतीजा कपिल भी था सारे काम , बैठने की व्यवस्था , खाने पीने के व्यवस्था आदि सभी कार्यों को निपटाने लगे .
प्रधान जी बड़े भाई जी के निकटतम पडोसी भी हैं , शाम को मित्रगनो के लिए कुछ विशेष प्रबंध किये जा रहे थे , और प्रधान जी सादर आमंत्रित थे . जैसे प्रधान जी का आगमन हुआ और बैठते ही प्रधान जी बड़े भाई से कहते है " दाताराम देखो मोहन (मेरे अपने सगे दूसरे नम्बर के भाई का नाम है ) के परिवार वाले तो सब ऊपर में गप्पें लड़ा रहे है. मैंने अभी आते समय उन्हें फटकार लगायी तो वे अब पहुंचे " आगे कि बात को भापते हुए मैंने उन्हें टोक दिया उन्हें अँधेरे में मेरी उपस्थिति का भान नहीं था यानि हमारे पारिवारिक मामलेमें दखल देकर मित्रताका अनूठा नारदीय परिचय देना था जिसे परिवार के बीच फूट और गल्फह्मियाँ पैदा हो सकें . मेरे अवरोध और विरोध के बाद श्रीमान जी उठ कर चल दिए किसी ने भी नहीं रोका .
तो ये था तीन पीढ़ियों कि मित्रता का परिणाम और पुरूस्कार फूट डालो और राज करो . घरों में आग लगावो और फिर पानी भी दिखाओ बुझाने के लिए .
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010
संस्कार विहीन बनता शादियों का बदलता स्वरूप
दिल्ली से उत्तराखंड जाना अपने में एक सुखद अनुभूति होती है गृह प्रदेश में पदार्पण की खुशियाँ छलकती रहती है . किन्तु बच्चों में ऐसा प्रतीत नहीं होता है वे यही के परिवेश में पले बढे . मैं १३.११.२०१० को दिल्ली से देहरादून के लिए निकला , पुनः दूसरे ही दिन मुझे परिवार के साथ गढ़वाल के लिए रवाना होना था सीधी बस के इन्तजार में काफी भीड़ इकठी हो गयी थी . कंडक्टर महोदय परिचित होने के कारण मुझे थोड़ी से सुविधा मिली और ड्राईवर के पीछे की सीट मिल गयी जिससे रास्ता आसान हो गया . नहीं तो मुझे रास्ते में उल्टियाँ होने कारण परशानी होती . बस अपने गंतब्य के लिए प्रातः ८ बजे चल पड़ी और ऋषिकेश के बाद सड़क सर्पीली आकर लेने लगती है किन्तु गंगा के किनारे से होते हुए सड़क मार्ग का रोचक दृश्य मन को रोमांचित करता रहता है गंगा का छलकता धवल निर्मल जल, राफ्टिंग करते हुए नाविक , भाव विभोर करते रहते हैं. . देव प्रयाग के पुल को पार करते ही रोमाच जैसे गायब हो जाता है क्योंकि यहाँ से धीरे धीरे गंगा का साथ छूटने लगता है और पहाड़ियां भी कुछ बीहड़ सी लगती है .
ठीक दो बजे पौड़ी में थे अनुमान से हम पांच बजे तक अपने गंतब्य तक पहुँच जाते किन्तु रास्ते में एक जगह ( सान्कर्सैन) में मुख्यमंत्री जी के कार्यकर्म के कारण लगभग एक घंटे का विलम्ब हुआ अब हम अपने गंतब्य तक ६.३० बजे पहुचे अँधेरा हो चूका था बस से उतरते हुए मेरे बड़े बेटे के हाथ से मोबाइल फ़ोन भी गिर गया जिसका अभी तक पता नहीं चल सका .
गाँव में हम अपनी भतीजी के शादी में गए थे . जब हम छोटे थे तो तब शादियों का माहोल बहुत आकर्षक लगता था बारात रात को आती थी , घर को सजाया जाता था रंग बिरंगे कागज के पतंगों से . या फिर पयां ( एक पेड़ होता है इसकी पत्तियों को शुद्ध माना जाता है इसका बोटानिकल नाम मैं नहीं जानता ) की पत्तियों से गेट की खूबसूरती के लिए हरी रिंगाल और केले के तनो से भी सजाया जाता था रात में महफिल में हारमोनियम ढोलक तबला की थाप से संगीतमय वातावरण तैयार होता था बाराती हों या घराती महफिल के शौक़ीन इन वाद्य यंत्रो की तरफ लपकते थे गाने वाले भी पीछे नहीं रहते . बरात का स्वागत स्कूली बच्चे करते, चाय आदि का प्रबंध भी इन्ही के जिम्मे होता था एक अलग ही आकर्षण बनता था .
लोग भी शादी ब्याह के समय सारा काम मिल जुल कर करते खाने से लेकर सोने तक का प्रबंध सभी आपसी तालमेल से करते . पहाड़ों में आज भी शादियों में गैस का प्रयोग बहुत कम होता है जंगली लकड़ी से ही सारा खाना तैयार होता है गाँव के लोग ही जंगल से लकड़ी घर तक लेकर आते थे भोज जमीन में बैठ कर मालू के पतों की पत्तल में या फिर केले के पत्तों में परोसा जाता था जब भोजन परोसा जा रहा हो तो परोसने वालों के अलावा किसी दूसरे का पंगत में जाना निषेध होता था
सारे रस्ते मैं इन्ही कल्पनाओं और यादों को समेटने में लगा रहा . हमारे बच्चों ने तो ऐसा परिद्रश्य देखा ही नहीं .
बदलते परिदृश्य ने करवट ली और सारी परम्पराए दरकिनार होती चली गयी जैसे युगों पुरानी, कथा कहानी की बात हो. वहां भी एक दिवसीय शादियों का प्रचलन चल पड़ा . जब मैं १९८२ में लुधियाना गया था तब मुझे वहां पर एक दिवसीय शादियाँ देखने को मिली और यह मेरे लिए आश्चर्य की बात थी. धीरे धीरे यही चलन सभी जगह पहुँच गया और अब गढ़वाल में भी . यहाँ पर भी दिल्ली , देहरादून की तरह आपको स्टेंडिंग भोज की प्रचुरता मिल रही है
घर जाते समय जब मेरे बड़े भाई ने मुझे स्टेंडिंग भोज , और एक दिवसीय शादी का प्रोगाम बताया तो मैंने उनसे एतराज जताया तब उन्होंने मुझे इसके कुछ कारण भी बताये जिनके कारण आज पहाड़ों में अपरिहार्य होते हुए भी एक दिवसीय शादियों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है. कारण निम्न प्रकार से हैं:
१. रात्री कालीन शादियों में शराब का बढ़ता चलन . जिससे शराबियों पर काबू पाना कठिन हो जाता है और अक्षर मार पिटाई तक की नौबत आ जाती है.
२ बारातियों की संख्या रात्रि कालीन शादियों में अधिक होती है उनका समुचित प्रबंध कठिन हो चला क्योंकि गाँव में भी शहरी पन आ गया है कोई भी अपने यहाँ बारातियों को सुलाने के लिए तैयार नहीं होते ऐसे मौके पर अपराधी प्रवृति भी बलवती रहती है. कुछ लोग शरारते भी करने लगते हैं
३ एक रात का भोज का खर्च भी कम हो जाता है .
४ स्टेंडिंग भोज अब ठेके पर हलवाई तैयार करते हैं गाँव के लोगों में सहायता भाव समाप्त हो चूका है इतना ही नहीं समय पर गाँव वाले खाने के लिए पहुँच जाये तो गनीमत समझे . अन्य सहयोग तो दूर की कौड़ी हो चुकी है .
कारण और भी होते है चाहे व्यवस्था से जुड़े हों या आर्थिक रूप से . किन्तु बदलाव आ चुका है जिनकी आर्थिक स्थिति बिलकुल डामाडोल है वे भी इसी माडल को अपना रहे हैं एक दिवसीय शादी कुल मिला कर एक युद्ध जनित कार्य बन गया है
सिर्फ शादी हो गयी . संस्कार , रस्म अदायगी के रूप में फिस्सडी काम हो गया है यानि चलताऊ शादी हो रही है. हर कोई जल्दी में है सर्दियों में तो और भी टेढ़ी खीर सी बन गयी है पंडित जी से भी बाराती यह कहते हुए सुने जा रहे हैं पंडीजी जल्दी करे . महासंकल्प और वेदी में फेरों के समय की चुटकियाँ तो अब ईद का चाँद हो गयी है वधु पक्ष की लड़कियों और बारातियों के बीच होने वाले वाद विवाद, नोक झोंक की रस्मे कथा चित्रों में शामिल हो चुकी हैं अब कहाँ वो शादियाँ .
बदलते परिवेश ने सभी कुछ बदला डाला हाँ आर्थिक परिदृश्य भी गढ़वाल का बहुत मजबूत हुआ है शायद इन्ही बातों ने बदलाव को स्वीकार किया हो
मेरी भतीजी की शादी भी इसी तरह संपन हुई महसूस ही नहीं हुआ की शादी दिल्ली , देहरादून में हो रही है या मेरे घर सिमाड़ी ( गढ़वाल ) में .
रस्मों और संस्कारों की बलि लेता हुआ बदलाव को नमस्कार . सब कुछ यादें बन कर रह गया .
ठीक दो बजे पौड़ी में थे अनुमान से हम पांच बजे तक अपने गंतब्य तक पहुँच जाते किन्तु रास्ते में एक जगह ( सान्कर्सैन) में मुख्यमंत्री जी के कार्यकर्म के कारण लगभग एक घंटे का विलम्ब हुआ अब हम अपने गंतब्य तक ६.३० बजे पहुचे अँधेरा हो चूका था बस से उतरते हुए मेरे बड़े बेटे के हाथ से मोबाइल फ़ोन भी गिर गया जिसका अभी तक पता नहीं चल सका .
गाँव में हम अपनी भतीजी के शादी में गए थे . जब हम छोटे थे तो तब शादियों का माहोल बहुत आकर्षक लगता था बारात रात को आती थी , घर को सजाया जाता था रंग बिरंगे कागज के पतंगों से . या फिर पयां ( एक पेड़ होता है इसकी पत्तियों को शुद्ध माना जाता है इसका बोटानिकल नाम मैं नहीं जानता ) की पत्तियों से गेट की खूबसूरती के लिए हरी रिंगाल और केले के तनो से भी सजाया जाता था रात में महफिल में हारमोनियम ढोलक तबला की थाप से संगीतमय वातावरण तैयार होता था बाराती हों या घराती महफिल के शौक़ीन इन वाद्य यंत्रो की तरफ लपकते थे गाने वाले भी पीछे नहीं रहते . बरात का स्वागत स्कूली बच्चे करते, चाय आदि का प्रबंध भी इन्ही के जिम्मे होता था एक अलग ही आकर्षण बनता था .
लोग भी शादी ब्याह के समय सारा काम मिल जुल कर करते खाने से लेकर सोने तक का प्रबंध सभी आपसी तालमेल से करते . पहाड़ों में आज भी शादियों में गैस का प्रयोग बहुत कम होता है जंगली लकड़ी से ही सारा खाना तैयार होता है गाँव के लोग ही जंगल से लकड़ी घर तक लेकर आते थे भोज जमीन में बैठ कर मालू के पतों की पत्तल में या फिर केले के पत्तों में परोसा जाता था जब भोजन परोसा जा रहा हो तो परोसने वालों के अलावा किसी दूसरे का पंगत में जाना निषेध होता था
सारे रस्ते मैं इन्ही कल्पनाओं और यादों को समेटने में लगा रहा . हमारे बच्चों ने तो ऐसा परिद्रश्य देखा ही नहीं .
बदलते परिदृश्य ने करवट ली और सारी परम्पराए दरकिनार होती चली गयी जैसे युगों पुरानी, कथा कहानी की बात हो. वहां भी एक दिवसीय शादियों का प्रचलन चल पड़ा . जब मैं १९८२ में लुधियाना गया था तब मुझे वहां पर एक दिवसीय शादियाँ देखने को मिली और यह मेरे लिए आश्चर्य की बात थी. धीरे धीरे यही चलन सभी जगह पहुँच गया और अब गढ़वाल में भी . यहाँ पर भी दिल्ली , देहरादून की तरह आपको स्टेंडिंग भोज की प्रचुरता मिल रही है
घर जाते समय जब मेरे बड़े भाई ने मुझे स्टेंडिंग भोज , और एक दिवसीय शादी का प्रोगाम बताया तो मैंने उनसे एतराज जताया तब उन्होंने मुझे इसके कुछ कारण भी बताये जिनके कारण आज पहाड़ों में अपरिहार्य होते हुए भी एक दिवसीय शादियों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है. कारण निम्न प्रकार से हैं:
१. रात्री कालीन शादियों में शराब का बढ़ता चलन . जिससे शराबियों पर काबू पाना कठिन हो जाता है और अक्षर मार पिटाई तक की नौबत आ जाती है.
२ बारातियों की संख्या रात्रि कालीन शादियों में अधिक होती है उनका समुचित प्रबंध कठिन हो चला क्योंकि गाँव में भी शहरी पन आ गया है कोई भी अपने यहाँ बारातियों को सुलाने के लिए तैयार नहीं होते ऐसे मौके पर अपराधी प्रवृति भी बलवती रहती है. कुछ लोग शरारते भी करने लगते हैं
३ एक रात का भोज का खर्च भी कम हो जाता है .
४ स्टेंडिंग भोज अब ठेके पर हलवाई तैयार करते हैं गाँव के लोगों में सहायता भाव समाप्त हो चूका है इतना ही नहीं समय पर गाँव वाले खाने के लिए पहुँच जाये तो गनीमत समझे . अन्य सहयोग तो दूर की कौड़ी हो चुकी है .
कारण और भी होते है चाहे व्यवस्था से जुड़े हों या आर्थिक रूप से . किन्तु बदलाव आ चुका है जिनकी आर्थिक स्थिति बिलकुल डामाडोल है वे भी इसी माडल को अपना रहे हैं एक दिवसीय शादी कुल मिला कर एक युद्ध जनित कार्य बन गया है
सिर्फ शादी हो गयी . संस्कार , रस्म अदायगी के रूप में फिस्सडी काम हो गया है यानि चलताऊ शादी हो रही है. हर कोई जल्दी में है सर्दियों में तो और भी टेढ़ी खीर सी बन गयी है पंडित जी से भी बाराती यह कहते हुए सुने जा रहे हैं पंडीजी जल्दी करे . महासंकल्प और वेदी में फेरों के समय की चुटकियाँ तो अब ईद का चाँद हो गयी है वधु पक्ष की लड़कियों और बारातियों के बीच होने वाले वाद विवाद, नोक झोंक की रस्मे कथा चित्रों में शामिल हो चुकी हैं अब कहाँ वो शादियाँ .
बदलते परिवेश ने सभी कुछ बदला डाला हाँ आर्थिक परिदृश्य भी गढ़वाल का बहुत मजबूत हुआ है शायद इन्ही बातों ने बदलाव को स्वीकार किया हो
मेरी भतीजी की शादी भी इसी तरह संपन हुई महसूस ही नहीं हुआ की शादी दिल्ली , देहरादून में हो रही है या मेरे घर सिमाड़ी ( गढ़वाल ) में .
रस्मों और संस्कारों की बलि लेता हुआ बदलाव को नमस्कार . सब कुछ यादें बन कर रह गया .
बुधवार, 24 नवंबर 2010
खिलाडी कैसे प्रयोग करते है राष्ट्रीय ध्वज का !!!
अंतर्राष्ट्रीय खिलाडी सोना तो उगलते हैं अपने देश के लिए , किन्तु राष्ट्रीय झंडे का सम्मान करने से क्यों चूक जाते है क्या उन्हें इतनी जल्दी , और ख़ुशी होती है कि वे मनको को भूल जाते है या इतने लापरवाह होते है कि मालूम ही नहीं पदता कि झंडे का प्रयोग कैसे किया जाये इस तस्वीर में कुछ इसी तरह का नज़ारा पेश कर रहे हैं टेनिस देव
जहाँ ख़ुशी सोना जीतने की है वंही दुःख है झंडे के अनुचित प्रयोग का . खेल के साथ इन्हें राष्ट्रीय ध्वज का प्रयोग भी सिखाना चाहिए तस्वीर दैनिक जागरण से ली गयी है.
जहाँ ख़ुशी सोना जीतने की है वंही दुःख है झंडे के अनुचित प्रयोग का . खेल के साथ इन्हें राष्ट्रीय ध्वज का प्रयोग भी सिखाना चाहिए तस्वीर दैनिक जागरण से ली गयी है.
शुक्रवार, 5 नवंबर 2010
प्रकाश पर्व दीपावली
आज दीपावली है मैंने आज सवेरे हिंदी के प्रख्यात लेखक श्री लीलाधर जुगुड़ी का हिंदुस्तान में एक लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने श्री राम द्वारा अमावश्य को घर लोटने पर कुछ रौशनी डाली है वे कहते हैं कि जब अँधेरा होता है तो लोग प्रकाश की खोज करते है . अँधेरा यदि प्रज्वलित होता है तो प्रकाश जगमग करने लगता है वास्तव में उन्होंने बहुत ही दार्शनिक एवं वैज्ञानिक ढंग से दीपावली के त्यौहार पर सुन्दर मार्मिक वर्णन किया है राम ने वन से लौटने पर अँधेरे का चुनाव किया कि अँधेरे में उनके प्रकाश से वे अपनी प्रजा को भली भांति देख सकेंगे अथवा प्रजा उनको श्री राम की कांति में अच्छी तरह पहचान सकेंगे । अँधेरा उजाले से प्राचीन है और प्रकाश अँधेरे कि आवश्यकता बन गयी है ।
आज जब मै बाजार में था तो लगभग ४-५ बजे का समय था कुछ सामान खरीदना था, एक दुकान से दूसरी देखते हुए काफी समय व्यतीत हो गया दुकानों में रौशनी जगमगा रही थी रात का एहसास सा हो रहा था, जब बाजार से निवृत हुए और बाहर सड़क पर पहुंचे तो सड़क सुनसान सी नजर आई । मुझे कुछ पल के लिए ऐसा भ्रम बना कि लगभग रात कि ९ बज चुके है मेरे मुह से अनायास ही निकल पड़ा कि हमें बस नहीं मिलेगी क्योंकि आज दीपावली है सभी बसे अपने गंतब्य तक पँहुच कर छुट्टी कर चुके होंगे किन्तु ऐसा था नहीं चूँकि सडको पर ट्रैफिक कम हो चूका था और दीवाली मानाने की सभी को जल्दी थी तो लोग घरों को लौट रहे थे, इतने में बस आ गयी, हम बस में चढ़ गए पुनः जब बस से उतरे तो तब मैंने समय देखा तो अभी ६.५० बज रहे थे। तो मुझे यकायक सबेरे ही माननीय जुगुड़ी जी का लेख का ध्यान आ गया
मेरे अपने घर में दीपावली का पर्व इस वर्ष वर्जित है क्योंकि अभी हमारे एक जेष्ठ भ्राता का २८ सितम्बर को देहावसान हुआ मेरी बड़ी दीदी यही रहती है उनके घर चले आये तब आकाश में अधेरा अपना साम्राज्य कायम कर चुका था, और पूरा भारत दीप जला कर , बिजली की लडियां लगा कर , पटाखों से आतिश बाजी से आकाश जगमग होने लगा था, जैसे सभी अँधेरे को तोड़ कर प्रकाश का साम्राज्य कायम कर रहे हों ।
.बस यही था उनके लेख का भी सारांश। सभी लोग मानो बुराईयाँ छोड़ कर एक सुगम, सुंदर और प्रकाशित मार्ग पर गमन करना चाहते हों, सभी बच्चे और बड़े प्रसन्न है। खुशिया ही खुशिया चारो ओर दिखाए दे रही थी।
अंत में आप सभी को दीपावली प्रकाश पर्व की शुभ कामनाएं .
आज जब मै बाजार में था तो लगभग ४-५ बजे का समय था कुछ सामान खरीदना था, एक दुकान से दूसरी देखते हुए काफी समय व्यतीत हो गया दुकानों में रौशनी जगमगा रही थी रात का एहसास सा हो रहा था, जब बाजार से निवृत हुए और बाहर सड़क पर पहुंचे तो सड़क सुनसान सी नजर आई । मुझे कुछ पल के लिए ऐसा भ्रम बना कि लगभग रात कि ९ बज चुके है मेरे मुह से अनायास ही निकल पड़ा कि हमें बस नहीं मिलेगी क्योंकि आज दीपावली है सभी बसे अपने गंतब्य तक पँहुच कर छुट्टी कर चुके होंगे किन्तु ऐसा था नहीं चूँकि सडको पर ट्रैफिक कम हो चूका था और दीवाली मानाने की सभी को जल्दी थी तो लोग घरों को लौट रहे थे, इतने में बस आ गयी, हम बस में चढ़ गए पुनः जब बस से उतरे तो तब मैंने समय देखा तो अभी ६.५० बज रहे थे। तो मुझे यकायक सबेरे ही माननीय जुगुड़ी जी का लेख का ध्यान आ गया
मेरे अपने घर में दीपावली का पर्व इस वर्ष वर्जित है क्योंकि अभी हमारे एक जेष्ठ भ्राता का २८ सितम्बर को देहावसान हुआ मेरी बड़ी दीदी यही रहती है उनके घर चले आये तब आकाश में अधेरा अपना साम्राज्य कायम कर चुका था, और पूरा भारत दीप जला कर , बिजली की लडियां लगा कर , पटाखों से आतिश बाजी से आकाश जगमग होने लगा था, जैसे सभी अँधेरे को तोड़ कर प्रकाश का साम्राज्य कायम कर रहे हों ।
.बस यही था उनके लेख का भी सारांश। सभी लोग मानो बुराईयाँ छोड़ कर एक सुगम, सुंदर और प्रकाशित मार्ग पर गमन करना चाहते हों, सभी बच्चे और बड़े प्रसन्न है। खुशिया ही खुशिया चारो ओर दिखाए दे रही थी।
अंत में आप सभी को दीपावली प्रकाश पर्व की शुभ कामनाएं .
गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
kashmir aur arundhati roy
बुकर पुरूस्कार से समान्नित लेखिका अरुंधती रॉय अचानक समाचारों की सुर्खियाँ बन गयी हैं. अभी कुछ ही दिन पूर्व सैद गिलानी के साथ उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर एक कटु सत्य को पुरजोर तरीके से कह दिया . सच तो वही जो उन्होंने कहा किन्तु कहने के तरीके से थोडा चूक गयी और यही अब उनके लिए गले की phaans बन गयी . उन्होंने कहा था " कश्मीर का विलय भारत में कभी नहीं हुआ " इस बयां ने tool पकड लिया और राजनितिक दलों ने उनके राष्ट्रविरोधी होने का फतुआ jaari कर दिया और गिरफ्तार करने की मांग करने लगे.
अब प्रश्न उठता है कि रॉय ने सार्वजानिक मंच से एक संवेदन शील मुद्दे पर गिलानी जैसे अलगाववादी के साथ क्यों कही ? क्या अरुंधती जी इसकी संवेदन शीलता से परिचित नहीं थी या उन्हें सुखियाँ बटोरनी थी ? क्या यह एक कटु सत्य है जो उन्होंने कहा / यदि ऐसा है तो फिर राजनितिक दल क्यों परेशान है. अथवा श्रीमती रॉय ने जानबूझ कर ऐसा बयां दिया .
अब बात आती है अभिव्यक्ति कि स्वंत्रता की. आप के कहने मात्र से किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा तो नहीं पड़ती है यदि खlal पदता है तो इसे स्वतंत्रत का हनन कहा जायेगा शायद संवेदन शील mudde पर बोल कर उन्होंने ऐसा ही किया है. कितु उन्होंने तो सिर्फ सच कह दिया है तो उस पर इतना बवाल कि उन्हें जेल भेजने की तैयारी गृहमंत्रालय कर रहा है. परन्तु आज तक जिन्होंने हम्मारी संसद पर हमला किया , कई पुलिस , सेना के जवानों को maar गिराया , निर्दोषों की हत्या कर दी , कनिष्क विमान को समुद्र में मार गिराया, उन्हें तो अभी तक सजा भी नहीं हुई और वे लगातार aisi हरकते करते जा रहे हैं. उन्हें देश द्रोह के बजाय मुख्यधारा का अंग बनाने के प्रयास किये जाते रहे हैं. तो रॉय ने कौन सा पहाड़ इस देश में तोड़ डाला है. अभी इससे पहले कश्मीर की विधान सभा में तो यही बयान umar अब्दुल्लाह ने भी दिया जबकि वह तो राजनितिक प्रदेश का मुखिया है तो unhe क्यों नहीं देश द्रोही कहा गया .
यदि कश्मीर विवादस्पद राज्य नहीं है तो फिर बार बार सरकार को इसे " भारत का अभिन्न अंग" क्यों कहा जाता है ऐसा अन्य प्रदेशों के मामले में नहीं होता है. तो क्या अब रॉय के बयान के बाद बर्ताकारों का विषय भी बदल जायेगा और इस मुद्दे के वास्तव में हल करने के गंभीर प्रयास किये जायंगे ? या रॉय को जेल में daal दिया जायेगा और मुद्दे को फिर से दबा दिया jayega .? या फिर कश्मीर हमेशा की तरह सुलगता रहेगा ? ये बहुत सरे प्रश्न खड़े है जिनका उत्तर अब कश्मीर की जनता और भारत सरकार निकालने होंगे .
apne vichaar bhi rakhe ek mahaan lekhak ko kaisi saja milni chahiye
अब प्रश्न उठता है कि रॉय ने सार्वजानिक मंच से एक संवेदन शील मुद्दे पर गिलानी जैसे अलगाववादी के साथ क्यों कही ? क्या अरुंधती जी इसकी संवेदन शीलता से परिचित नहीं थी या उन्हें सुखियाँ बटोरनी थी ? क्या यह एक कटु सत्य है जो उन्होंने कहा / यदि ऐसा है तो फिर राजनितिक दल क्यों परेशान है. अथवा श्रीमती रॉय ने जानबूझ कर ऐसा बयां दिया .
अब बात आती है अभिव्यक्ति कि स्वंत्रता की. आप के कहने मात्र से किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा तो नहीं पड़ती है यदि खlal पदता है तो इसे स्वतंत्रत का हनन कहा जायेगा शायद संवेदन शील mudde पर बोल कर उन्होंने ऐसा ही किया है. कितु उन्होंने तो सिर्फ सच कह दिया है तो उस पर इतना बवाल कि उन्हें जेल भेजने की तैयारी गृहमंत्रालय कर रहा है. परन्तु आज तक जिन्होंने हम्मारी संसद पर हमला किया , कई पुलिस , सेना के जवानों को maar गिराया , निर्दोषों की हत्या कर दी , कनिष्क विमान को समुद्र में मार गिराया, उन्हें तो अभी तक सजा भी नहीं हुई और वे लगातार aisi हरकते करते जा रहे हैं. उन्हें देश द्रोह के बजाय मुख्यधारा का अंग बनाने के प्रयास किये जाते रहे हैं. तो रॉय ने कौन सा पहाड़ इस देश में तोड़ डाला है. अभी इससे पहले कश्मीर की विधान सभा में तो यही बयान umar अब्दुल्लाह ने भी दिया जबकि वह तो राजनितिक प्रदेश का मुखिया है तो unhe क्यों नहीं देश द्रोही कहा गया .
यदि कश्मीर विवादस्पद राज्य नहीं है तो फिर बार बार सरकार को इसे " भारत का अभिन्न अंग" क्यों कहा जाता है ऐसा अन्य प्रदेशों के मामले में नहीं होता है. तो क्या अब रॉय के बयान के बाद बर्ताकारों का विषय भी बदल जायेगा और इस मुद्दे के वास्तव में हल करने के गंभीर प्रयास किये जायंगे ? या रॉय को जेल में daal दिया जायेगा और मुद्दे को फिर से दबा दिया jayega .? या फिर कश्मीर हमेशा की तरह सुलगता रहेगा ? ये बहुत सरे प्रश्न खड़े है जिनका उत्तर अब कश्मीर की जनता और भारत सरकार निकालने होंगे .
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