‘क्वी कोटद्वार, क्वी
दिल्ली, क्वी दून बसी गिन, सौ मौवसु का ये गौं मा पांच ही रै गिन।’
सोशल मिडिया पर भ्रमण
करते हुये, मुझे उपरोक्त पंक्तियाँ सुनने को मिली। जिसमे पहाड़ों का दुख, दर्द, और
वास्तविकता का मर्म का सजीव चित्रण है।
हिमालय की गोद में बसा
उत्तराखण्ड अपने प्राकृतिक वैभव और सौन्दर्य के लिए सुप्रसिद्ध है। समस्त भारत को
जलासिक्त करने वाली गंगा और यमुना के मैती, आज पलायन की विभीषिका से अभिशप्त है।
सीढ़ीनुमा खेती जहाँ हरी भरी दिखाई देती थी, आज बेकार और बंजर पड़ी है। दिन
प्रतिदिन अनुपयोगी होती जा रही है। सड़को से गुजरते हुये दूर तक नजर दौड़ायें तो
साफ दिखाई देता है कि हरियाली के लिये जूझते खेत। बाजारीकरण सब कुछ लील गया है।
इस गीत का पहला पक्ष तो
यही है कि पलायन इतने जोर शोर से हुआ कि जिस गाँव में सौ परिवार मौजूद थे, आज
मात्र पांच ही रह गये हैं। धीरे -धीरे पूरा गाँव पलायन कर गया। कुछ तो पढ़ लिख कर
रोजगार की तलाश मे अन्यत्र चले गये। कुछ लोग स्थानीय स्तर पर काम तो करते रहे
किन्तु अपने परिवारों को निकटतम मैदानी क्षेत्रो मे, जैसे देहरादून, कोटद्वार,
हल्दवानी आदि स्थानो में पलायन करते चले गये। गीत में चित्रित गाँव की बिडम्बना
देखिये कि जहां घरो मे रहने की जगह कम पड़ती थी, आज आदमी देखने को नही मिल रहे
हैं। अखण्ड रिक्तता बनी हुयी है। और महत्वपूर्ण बात जिस घर मे ये कलाकार मौजूद है
उसकी देहलीज तक विकास सड़क साफ साफ दिखाई दे रही है।
ये विकास की सड़क पलायन
के लिए बनी या गाँव की समृद्धि के लिए? पुरखों की संजोई
विरासत आज खण्डहरों मे परिवर्तित हो गयी है। जहाँ मनुष्यों की गूँज होती थी, वहाँ
आज दिन मे ही बाघ की दहाड़ सुनायी दे रही है।
उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भी परिस्थितियां सामान्य नहीं हुयी, किन्तु और
भी जटिल हुयी। देहरादून, कोटद्वार व हलद्वानी का भूत तो लोगो को उसके बाद ही चढ़ा।
विकास का कार्य तो कुछ हद तक हुआ है, स्कूलो की संख्या बढ़ी, सड़के अपनी लम्बाई
बढ़ाने में सक्षम हुयी, मैदानी शहरो में औद्यौगिकी करण भी हुआ, किन्तु गाँवो की
स्थितियों में आमूल चूक परिवर्तन नहीं हुआ। कई छोटे अस्पताल भी खुले किन्तु साधन
विहीन। आकस्मिक परिस्थितियो में वहां के
अस्पताल सिर्फ हाथी के दांत जैसे है।
एक समय था जब उत्तराखण्ड
अपने पशुधन के कारण समृद्ध था, किन्तु आज परिस्थितियां बदल गयी है। कभी दूध, घी,
शहद की कोई कमी नही होती थी, वहीं आज इन सब चीजो के लिए बाजारों पर निर्भर हो गये
है। बकरियों और भेड़ो से चलने वाली आर्थिकी मृत प्रायः हो गयी है। जहां कभी अन्न
के भंडार भरे होते थे अब राशन का दुकानो की निर्भरता बढ़ गयी है। इसका प्रमुख कारण
तो लोगो का पलायन ही है। पहले संयुक्त परिवारों मे श्रमबल की कमी नही होती थी, वही
आज एकल परिवारो के कारण लोगो ने वृहद रूप से खेती, व पशुपालन छोड़ दिया है।
जो लोग रोजगार के लिेए
बाहर निकले हैं और स्थानीय आवश्यकता के अनुकूल वहीं बस गये है, कुछ हद तक बात समझ
आती है, महानगरो की परिस्थितियों के अनुकूल वे तो विवश है, किन्तु ऐसे लोगो की
संख्या कम नही है जिनका रोजगार तो स्थानीय स्तर पर है, किन्तु इन लोगों ने अपने परिवारो
को देहरादून, हलद्वानी और कोटद्वार मे बसा दिया है।
मैं व्यक्तिगत तौर से, एक
ऐसे गाँव को जानता हूँ जो 40- 50 परिवारो का गाँव है, यहां पर कम से कम 10-15 से
अधिक लोग अध्यापन का कार्य स्थानीय रूप मे करते हैं, किन्तु उन मे से अधिकांश ने
अपने परिवारों को देहरादून मे शिफ्ट कर दिया है। शहरीकरण की संस्कृति के कारण
पलायन का दंश झेलने के लिेए लोग अभिशप्त हैं।
एक नया चलन और देखने मे
आया कि दूल्हे के परिवार वाले जब दुल्हन की खोज करते है, तब दुल्हन के पक्ष वाले
लोगों के समक्ष, देहरादून व अन्य मैदानी क्षेत्रों मे होने वाले दूल्हे के पास कोई
प्लाट या मकान उनके खुद के नाम पर हो, ताकि विवाहोपरान्त उनकी बेटी, सुखपूर्वक
देहरादून मे रह सके। उन्हे गाँव मे रहना अपनी बेटी के भविष्य के साथ खिलवाड़ लगता
है। इससे पता चलता है कि पलायन की गति किस तरह से भयावह रूप से गतिमान है।
अब तो उत्तराखण्ड केवल एक
पिकनिक स्थल बन कर रह गया है। लोग वहां का रुख तभी करते है, जब कोई शादी-ब्याह का
निमन्त्रण, या कोई देव पूजा का आयोजन हो रहा हो। या फिर गर्मियो की छुट्टियों मे
अल्पकालिक बसेरे के चले जाते है। लोगो के वापस आते ही पुनः सन्नाटा पसर जाता है।
गीत के बोलः-
नौयडा
दिनाँक - 04-06-2026








