मंगलवार, 28 जुलाई 2026

क्वी कोटद्वार, क्वी दिल्ली, क्वी दून

 


 

क्वी कोटद्वार, क्वी दिल्ली, क्वी दून बसी गिन, सौ मौवसु का ये गौं मा पांच ही रै गिन।

 

सोशल मिडिया पर भ्रमण करते हुये, मुझे उपरोक्त पंक्तियाँ सुनने को मिली। जिसमे पहाड़ों का दुख, दर्द, और वास्तविकता का मर्म का सजीव चित्रण है।

हिमालय की गोद में बसा उत्तराखण्ड अपने प्राकृतिक वैभव और सौन्दर्य के लिए सुप्रसिद्ध है। समस्त भारत को जलासिक्त करने वाली गंगा और यमुना के मैती, आज पलायन की विभीषिका से अभिशप्त है। सीढ़ीनुमा खेती जहाँ हरी भरी दिखाई देती थी, आज बेकार और बंजर पड़ी है। दिन प्रतिदिन अनुपयोगी होती जा रही है। सड़को से गुजरते हुये दूर तक नजर दौड़ायें तो साफ दिखाई देता है कि हरियाली के लिये जूझते खेत। बाजारीकरण सब कुछ लील गया है।

इस गीत का पहला पक्ष तो यही है कि पलायन इतने जोर शोर से हुआ कि जिस गाँव में सौ परिवार मौजूद थे, आज मात्र पांच ही रह गये हैं। धीरे -धीरे पूरा गाँव पलायन कर गया। कुछ तो पढ़ लिख कर रोजगार की तलाश मे अन्यत्र चले गये। कुछ लोग स्थानीय स्तर पर काम तो करते रहे किन्तु अपने परिवारों को निकटतम मैदानी क्षेत्रो मे, जैसे देहरादून, कोटद्वार, हल्दवानी आदि स्थानो में पलायन करते चले गये। गीत में चित्रित गाँव की बिडम्बना देखिये कि जहां घरो मे रहने की जगह कम पड़ती थी, आज आदमी देखने को नही मिल रहे हैं। अखण्ड रिक्तता बनी हुयी है। और महत्वपूर्ण बात जिस घर मे ये कलाकार मौजूद है उसकी देहलीज तक विकास सड़क साफ साफ दिखाई दे रही है।

ये विकास की सड़क पलायन के लिए बनी या गाँव की समृद्धि के लिए? पुरखों की संजोई विरासत आज खण्डहरों मे परिवर्तित हो गयी है। जहाँ मनुष्यों की गूँज होती थी, वहाँ आज दिन मे ही बाघ की दहाड़ सुनायी दे रही है।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भी परिस्थितियां सामान्य नहीं हुयी, किन्तु और भी जटिल हुयी। देहरादून, कोटद्वार व हलद्वानी का भूत तो लोगो को उसके बाद ही चढ़ा। विकास का कार्य तो कुछ हद तक हुआ है, स्कूलो की संख्या बढ़ी, सड़के अपनी लम्बाई बढ़ाने में सक्षम हुयी, मैदानी शहरो में औद्यौगिकी करण भी हुआ, किन्तु गाँवो की स्थितियों में आमूल चूक परिवर्तन नहीं हुआ। कई छोटे अस्पताल भी खुले किन्तु साधन विहीन। आकस्मिक परिस्थितियो में  वहां के अस्पताल सिर्फ हाथी के दांत जैसे है।

 

एक समय था जब उत्तराखण्ड अपने पशुधन के कारण समृद्ध था, किन्तु आज परिस्थितियां बदल गयी है। कभी दूध, घी, शहद की कोई कमी नही होती थी, वहीं आज इन सब चीजो के लिए बाजारों पर निर्भर हो गये है। बकरियों और भेड़ो से चलने वाली आर्थिकी मृत प्रायः हो गयी है। जहां कभी अन्न के भंडार भरे होते थे अब राशन का दुकानो की निर्भरता बढ़ गयी है। इसका प्रमुख कारण तो लोगो का पलायन ही है। पहले संयुक्त परिवारों मे श्रमबल की कमी नही होती थी, वही आज एकल परिवारो के कारण लोगो ने वृहद रूप से खेती, व पशुपालन छोड़ दिया है।

जो लोग रोजगार के लिेए बाहर निकले हैं और स्थानीय आवश्यकता के अनुकूल वहीं बस गये है, कुछ हद तक बात समझ आती है, महानगरो की परिस्थितियों के अनुकूल वे तो विवश है, किन्तु ऐसे लोगो की संख्या कम नही है जिनका रोजगार तो स्थानीय स्तर पर है, किन्तु इन लोगों ने अपने परिवारो को देहरादून, हलद्वानी और कोटद्वार मे बसा दिया है।

मैं व्यक्तिगत तौर से, एक ऐसे गाँव को जानता हूँ जो 40- 50 परिवारो का गाँव है, यहां पर कम से कम 10-15 से अधिक लोग अध्यापन का कार्य स्थानीय रूप मे करते हैं, किन्तु उन मे से अधिकांश ने अपने परिवारों को देहरादून मे शिफ्ट कर दिया है। शहरीकरण की संस्कृति के कारण पलायन का दंश झेलने के लिेए लोग अभिशप्त हैं।

 

एक नया चलन और देखने मे आया कि दूल्हे के परिवार वाले जब दुल्हन की खोज करते है, तब दुल्हन के पक्ष वाले लोगों के समक्ष, देहरादून व अन्य मैदानी क्षेत्रों मे होने वाले दूल्हे के पास कोई प्लाट या मकान उनके खुद के नाम पर हो, ताकि विवाहोपरान्त उनकी बेटी, सुखपूर्वक देहरादून मे रह सके। उन्हे गाँव मे रहना अपनी बेटी के भविष्य के साथ खिलवाड़ लगता है। इससे पता चलता है कि पलायन की गति किस तरह से भयावह रूप से गतिमान है।

 

अब तो उत्तराखण्ड केवल एक पिकनिक स्थल बन कर रह गया है। लोग वहां का रुख तभी करते है, जब कोई शादी-ब्याह का निमन्त्रण, या कोई देव पूजा का आयोजन हो रहा हो। या फिर गर्मियो की छुट्टियों मे अल्पकालिक बसेरे के चले जाते है। लोगो के वापस आते ही पुनः सन्नाटा पसर जाता है।

 

गीत के बोलः-

 https://youtu.be/KRIJHBmwbaw?si=ltlgV3mLXFCnJpKx

नौयडा

दिनाँक - 04-06-2026

 

 

 

रविवार, 18 जनवरी 2026

नववर्ष26 पर मतवाली यात्रा- उत्तराखंड कोटाबाग।

  2 जनवरी 2026 हमारे संस्थान के लोगों का समूह नव वर्ष के उपलक्ष‌ मे  उत्तराखंड के कोटाबाग भ्रमण करने के चलने को तैयार था। कुछ ने जाने से व्यक्तिगत कारणों से परहेज किया। 

1 जनवरी की सांय को ‌सभी व्वस्थाए पूर्ण कर ली गयी। साथ ही सभी को प्रातः 6बजे नोएडा सेक्टर 18 पर पहुंच कर गंतव्य के लिए बस पकड़नें का निर्देश  दिया गया। अब प्रतीक्षा थी प्रातः छ बजे की। सभी ने अपनी सम्भावित व्यवस्थाए गंतव्य‌  तक पहुंचनें ‌कर ली। मेरा घर सबसे नजदीक था और पैदल ही पहुंचने में मै सक्षम था। 

आवश्यकतानुसार मैने सभी ‌व्यवस्थाए रात मे ही कर ली थी। प्रातः पांच बजे का अलार्म लगा कर सो गए। किन्तु नींद खुलने मे विलम्ब और अलार्म का सुनायी‌ नही देना तथा सवा छ बजे का समय‌ को सवा चार बजे का भ्रम, सोने पर सुहागा। किन्तु उठ गया और नित्यकर्म से निवृत होने लगा। इस बीच पुनः मोबाइल पर समय देखा तो 6.45, आश्चर्य‌चकित‌ हुआ साथ मे अनेक पुकारें। एक पल लगा कि मै अब रह गया। इन पुकारों से पुनः ‌समपर्क‌ करने पर पता चला कि अभी चलने कुछ समय‌ बाकी‌ है। जल्दी मेैने बेटे‌ को‌ उठा कर बस तक, छोड़ने ‌के‌लिए कहा, ठीक सात बजे मै समूह के साथ सम्मिलित ‌हो‌ सका।

लगभग सवा सात बजे बस रवाना हुयी। तत्पश्चात इंदिरापुरम के पास कुछ अन्य साथियों को भी सम्मिलित किया और गंतव्य की ओर बस गतिमान हुयी। गनीमत थी उस दिन कोहरे से कुछ राहत के कारण दृश्यता अच्छी थीं।  प्रातः कालीन खेतो के हरे भरे दृश्य मन मोह रहे थे।

इस बीच विनीत‌ जैन जी‌ ने, समय‌ को सुगम करने के लिए  अन्ताक्षरी की उद्घोषणा कर दी । फिर ‌क्या‌ लडके और लड़कियों की टोलियां अपनी-अपनी जीत पक्की करने के लिए संघर्षरत रही। और कब हम गजरौला पहुंच गए, अहसास ही नहीं हुआ।

गजरौला मे मोगा रिसोर्ट मे अल्पाहार की व्यवस्था थी। इस अल्पाहार के हाल मे किसी ‌विवाहोत्सव का अहसास हो रहा था, तो अल्पाहार भी विवाह जन्य था।  नव्य व भव्य था।‌ खाऊ प्रकृति वालों ने तो वह खूब उंडेल दिया उदर मे।



अल्पाहार के पश्चात हमे पुनः अपने गंतव्य के लिए चलना तय था। नियति के अनुकूल हम लगभग दस बजे यहां से कोटा वाग की ओर निकल पड़े। बस ने धीरे -धीरे गति पकडी, और गतिमान हो चली। फिर बीच में एक दो जगहों पर, लघुशंका हेतु अल्पविराम ‌ले लिया गया।

दिन मे लगभग ढाई बजे हम लोग कोटा बाग अपने नियत गंतव्य स्थल रिसोर्ट मे पंहुच चुके थे। दोपहर के भोजनोपरान्त तय हुआ कि कुछ दर्शनीय स्थलों की ओर रुख किया जाय। 
 
तत्पश्चात कई गाड़ियों में हम लोग सीतावनी मन्दिर की ओर रवाना हुए। करीब दस पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर निर्जन वन के बीच मे यह मन्दिर ए एस आई की निगरानी मे स्थित है। रास्ता कच्चा, और नितान्त जंगल व सूखी, जंगली नदियों से होते हुए जाता है। अकेले व्यक्ति के या पैदल व खुली गाड़ियों जैसे बाइक आदि से जाने पर , जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है।



पांच बजे के लगभग हमार जत्था धीरे -धीरे मंदिर के पास पंहुचने लगा। मंदिर यद्यपि ‌छोटा सा ही है किन्तु पौराणिक ‌मान्यताए बडी है
सबसे आखिर मे पंहुचने वाला समूह,महभिष, मुस्कान और चांदनी थे। महभिष तो काफी डरी हुई थी, मुझे देखते ही उन्होंने एक आक्रमण किया, कहने लगी, भई आपको अपने सहयोगी कनिष्ठ मुस्कान की चिंता नहीं थी, अब भला कौन समझाए कि मेले खेले मे बड़े बच्चों ‌का‌, कौन ऊंगली पकड़ ‌कर रखता है। खैर अपनी वरिष्ठता का मान रखते हुए माफी मांगने मे ही भलाई समझी। फिर वापसी मे तो तीनो को साथ गाड़ी मे बिठा लिया।
इस मन्दिर के बारे में हमें बताया गया कि यह त्रेता युगीन स्थल है,‌ यहीं पर सीतामाता ने अपने दोनो पुत्रो, लव व कुश को जन्म दिया है। मन्दिर मे सीता माता की,‌ दोनो पुत्रो को गोद बिठाकर, मूर्ति स्थापित की गई है। यहां की खास विशेषता, पानी की तीन धाराएं है, हमें बताया गया कि पहले यहां पर तीन के स्थान पर चार धाराए थी, जिन से, एक से दूध, गरम पानी, दो धाराओं से सामान्य‌ पानी निकलता था, कि कालान्तर मे भौगोलिक संरचनात्मक बदलाव व अन्य‌ कारणों से तीन ही धाराएं शेष है, ये सभी सामान्य‌ जल का उत्पादन करती है। इस निर्जन प्रदेश के इस मन्दिर मे एक नागा साधु धुनी जमाए बैठे मिले।
यही आस पास ही बाल्मीकि आश्रम भी बताया गया। लगभग एक‌ घंटे का समय बिताने के पश्चात हम सभी लोग पुनः अपने रिसोर्ट वापस‌ चले गए।
रात्रिकालीन पार्टी ‌का‌ दौर नौ बजे से प्रारम्भ हुआ। कुछ जाम छलकते रहे। कड़ाकेदार ठंड मे लड़कियों ने अल्प वस्त्रो की पोशाक पहन डाली।  शराब और नृत्य‌, दोनो ने ठंड‌ पर कडा प्रहार किया, फिर क्या था रात‌ की बारह बजे लोग भोजन की मेज तक पंहुच‌ सके। कुछ लोग ‌तो बिना खाए ही बादशाहत तक पंहुच गए। कुछ को तो अगले दिन भी अहसास नहीं हुआ कि उन्होने रात‌ को‌ खाना खाया या नहीं।
नृत्य‌करते सहकर्मी 

खैर, रात को ही तय‌ हुआ कि प्रातः छ बजे जंगल सफारी के‌ लिए जिम कार्बेट पार्क चला‌ जाय। रात‌ जिस‌ कमरे मे मै था वहां मेरे साथी थे सुधीर ‌जी और अनीश। बस एक‌ ओर से बजाज चेतक चल रहा था तो दूसरी ओर से हीरो होंडा। फिर ‌नीद‌ का‌ हुआ कबाड़ा। फिर क्या था, प्रातः ‌पांच‌ बजे ही नित्य कर्म से निवृत्त हो बाहर निकला तो आसमान बिलकुल साफ और ठंड का अहसास नही। रिसोर्ट ‌के अन्दर दो तीन काली बतखे दिखाई ‌दी, मेरी आहट पाकर चौकन्नी तो हुयी किन्तु डरी नही।

किन्तु सहयात्रियों मे सन्नाटा। कोई भी नही जागा। साढ़े ‌छ बजे के आस पास कुछ लोग जागे और फिर सभी ‌एकत्रित‌ होने शुरू हुए। और फिर ‌सभी‌ लोग‌ बस‌ मे बैठ कर काली ढूंगी वाले गेट की ओर रवाना हुए।  वहां पर हमारे साथ चलने वाले गाइड व गाडियां प्रतीक्षा मे थे। 
आवश्यक निर्देश।

पार्क का नक्शा।

समूह का कारवां 

यह लगभग 25किमी‌ का सफर है जहां लोग इस आशा से जाते है कि उन्हें वन्य जीवों ‌से आमने-सामने साक्षात्कार हो सके, किन्तु ऐसा कभी कभी ही होता है। मानवीय‌ गतिविधियों से  जीव भी सजग रह कर दूरी बना लेते है। एक जगह पर मुश्किल से हिरन व नील गाये दिखाई दी, शेष कुछ नही। किन्तु प्रातः कालीन वन भ्रमण अपने आप मे एक संस्मरणीय है। कोलाहल से दूर शान्त व निर्जन वन। जहां सिर्फ शेष स्मृतियां थी तो जिम कार्बेट की। एक‌ शिकारी अंग्रेज की। जिसने उत्तराखंड मे कई नरभक्षी बाघ और बाघिन ‌का‌ शिकार किया।
लगभग ग्यारह बजे प्रातः  समूह वापस रिसोर्ट आ पंहुचा। नाश्ता व अन्य कार्यों ‌से‌ निवृत‌ होकर पुनः वापस नौएडा के लिए चल पडे।
अब सब थके हुए थे, इसलिए ‌बस‌ मे कुछ नींद ‌की आगोश मे थे और कु‌छ मोबाइल के आगोश में। शाम को पांच बजे पुनः मोगा रिसोर्ट पर लंच के लिए रुके। तत्पश्चात यात्रा का अंतिम ‌पडाव प्रारम्भ होता है।
गाजियाबाद से सहयात्री उतरने लगे और अपने‌घरो‌को जाने लगे।  अंत मे श्री मधुसूदन जी का परिवार,जतिन, विजय खुराना जी के साथ मै, आखिरी पड़ाव सेक्टर 18, से रात्री नौ बजे अपने घरों को लौट गए।


गुरुवार, 18 मई 2023

मृदुला गर्ग-"वे नायाब औरतें "

 साहित्य की दुनिया मे एक नाम है मृदुला गर्ग। नाम तो सुना था शायद कहीं अखबारो मे पढ़ा भी था, किन्तु उनकी किताबों से पूरी तरह अनजान। नौकरी की भागदौड़ में तो किताबें कोसों दूर हो गयी थी।  लगभग पढ़ना तो जैसे दूभर हो चुका था। हां अखबार की निरन्तरता सदा बनी रही। समाचार पत्रों के माध्यम से ही लेखको का परिचय होता रहा।

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। 'हिन्दुस्तान' हिन्दी में नयी पुस्तको की समीक्षाएं छपती रहती है। जिससे पता चलता रहता है कि नयी किताब कौन सी आयी है। बस एक दिन मृदुला गर्ग की नयी नवेली किताब " वे नायाब औरतें" की संक्षिप्त समीक्षा छपी थी, पढ़ने पर थोड़ी  उत्सुकता जगी और किताब सीधे प्रकाशक से मंगा डाली। अमेजन व अन्य प्लेट फार्म पर उपलब्ध न थी। पुस्तक आने में लगभग  एक सप्ताह का वक्त लग गया। पहले तो ऐसा लगा कि प्रकाशक आर्डर पर तो नही छाप रहा! किन्तु आखिर पुस्तक आ ही गयी।

पुस्तक को मृदुला ने अपने यादों, संस्मरणों व यात्रा वृत्तान्तों के गुलदस्ते से सजाया है।चटपटे किस्से और कहानियों के संग, दोस्तो, सहेलियों, और बहिनों के बीच के जीवन्त वृत्तान्त, पुस्तक  सदानीरा नदियों की तरह सरपट भागती है, बस आगे क्या! ये उत्सुकता बनी रहती है।

"घर का एक अघोषित नियम था कि कोई भी किसी का पत्र नही खोलता यानि प्राइवेसी का पूरा सम्मान। तो बहिन रेणु को जब जनरल थिमैया का आटोग्राफ्ड फोटो पत्र आता है तो सभी की उत्सुकता का बढ़ना अवश्यमभावी था।"

सो सब को रेणु ने अपनी उपलब्धता गर्व के साथ दिखाई। वही दूसरी ओर एक चचेरी बहन जो सरो साजो सामान को टपकाने में सिद्धहस्त। विवाहोपरान्त भी  उसका जलवा जारी  रहा। पकड़े जाने पर भी ठसक के साथ कोई झेंप नही। स्वीकारने मे हिचक नही।

पिता की सहेलियां तो जैसी पूरी तरह से पिता के अंतरंग सम्बन्धो की पोल खोलते है। बड़ा दिलचस्प और मनोयोग से पढ़ा जाने योग्य किन्तु कुछ भी अश्लील नही। साफगोई से लिखती  है और स्वीकार करती हैं कि पिता के इन के साथ अंतरंग संसर्ग के सम्बन्ध अवश्य होंगे। मां ने तो जैसे स्वयं छूट दे रखी हो।

सास के घर की  भी बात करती है किन्तु स्वयं के लिये भी स्वीकार करती है कि मैं ऐसी बहू न थी जो चूल्हा चौका मे  जूझ रही होती। दिलचस्प किस्सा कहती हैं कि बनारस जाने के लिये रेल की टिकट ली, किन्तु जाते समय पति और देवर तो आगे निकल कर ट्रेन में बैठ जाते है किन्तु वृद्ध सास और ससुर के साथ चलते हुये,वे देरी से पहुंचते है और ट्रेन छूट जाती है, और फिर घर वापस। वापसी मे ससुर  जी ने रास्ते में नारियल नीरा पिलाने का प्रस्ताव रखा।  और पीने के पश्चात पता  चला कि नीरा तो सुबह सुबह मिलती है दिन दुपहरी तो वह ताड़ी को रूप  ले ती है, सो वह सबने पी ली।

पिताजी ने खेतीहर को पूछा कि "नीरा ही थी न'!   "ना रउबा, ताड़ी बा"। डगमगाते घर पहुंच गये। तत्पश्चात पति आनन्द के साथ तो  उन्होने जैसे पूरे बिहार को नाप डाला। पति आनन्द का भी दर्शनशास्त्र बड़ा उच्चकोटि का था । यानि पैसा खर्च हो जाने, या डूब जाने के बाद, वे  डूबा न बता कर, देर से वापसी की दलील दे डालते।

बस एक ऐसा दौर से भी वे गुजरी, जब राजस्थान से उनके पुत्र व पुत्रवधू दिल्ली लौटते हुए सड़क हादसे के शिकार हो जाते हैं और दोनो को मौत अपने आगोश मे समा लेती है। तब कही बनारस मे किसी के पास रहते अपने नए उपन्यास " कठगुलाब"      लिख रही थी। बस वही से उनकी बदहवासी सी शुरू हो गयी और कही भी अन्यत्र जाना और लिखना जैसे सब बन्द हो गया। इस उपन्यास बाद मे अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

मंजुल भगत, बड़ी बहन की आत्मीयता हो या कृष्णा सोबती के साथ खट्टा मीठा सम्बन्ध। मनोहर श्याम जोशी हो या हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव। सभी के साथ का सोहार्द व अनुभव।

कुछ विदेशी लेखिकाएं और मित्र, व अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों के चटपटे किस्से।वहीं कुछ थोड़ी खिचाई बल्ब वाले सरदार जी यानि खुशवन्त सिहं की भी।

गगन के साथ गुवाहाटी के सम्मेलन के उपरान्त गंगटोक तक की यात्रा अविस्मरणीय सी है वहां पर वे दोनो महिलाएं मस्त हो स्वछन्द बन गयी। वे बताती है कि गगन टैक्सी वाले से पूछती है,कि बांस के डंडे से सुड़कने वाली शराब कहां पर मिलती है। है न दिलचस्प।

बस किस्से कहानियां तो यत्र तत्र भरी पड़ी हैं। साफगोई से लिखी है। पचहतर साल की महिला आज भी ऊर्जावान लगती है। बस लिखते हुए ऐसा मालूम पड़ रहा है कि कल की ही बात लिख रही है।

हां एक बात जो मुझे अखरी है वह है किताब मे प्रयुक्त भारी भरकम उर्दू शब्दावली। कई शब्दो को समझने पंक्तियां पुनः पढ़नी पड़ती। 

कुछ भी हो पुस्तक के वृत्तांत जीवन्त है। पढ़ें  जरूर।
















सोमवार, 6 अप्रैल 2020

कोरोना और मनुष्य




आज पूरी दुनिया पिछले एक महीने से कोरोना वायरस के आक्रमण के कारण बन्दी करण के तहत
थम सी गयी है। सब कुछ अप्रत्याशित सा लग रहा है। यह वायरस चीन से चलकर,महासागरो को पार करता हुआ, मजबूत सीमाओ को तोड़ता हुआ,बेहद शक्तिशाली सिहांसनो को डोलता हुआ,दुनिया को अपने अधिकार क्षेत्र मे करता जा रहा है। जब विज्ञान और विकास के चरमोत्कर्ष,का अनुभव मनुष्य कर रहा था तब इस वाय रस ने उसे बेबस और लाचार कर दिया है।

मनुष्य हमेशा से महत्वाकांक्षी रहा है। प्रकृति का दमन पूरे अधिकार से किया। इन्ही गतिविधियो के कारण यह कहा जाता है कि कुछ समय बाद समुद्रो के जल स्तर मे बढ़ोतरी हो सकती है। कई ग्लेशियर पिघलने के कगार पर है। नदियो मे औद्योगिक कचरा डालने से उनके प्रवाह व जल की गुणवता पर विपरीत प्रभाव पडा है। वनस्पति , जंगलो का अनावश्यक कटान, वनचरो का बध,के कारण अनेक प्रजातियॉ या तो विलुप्त हो गयी है या फिर विलुप्ति के कगार पर खड़ी है। हिमालय व आल्पस की ऊची श्रृंखलाओं तथा महासागरो को भी प्रदूषित करने से नही छोड़ा। ऐसा भी नही है कि विज्ञान को ऐसे खतरो का आभास नही है, किन्तु मनुष्य की विजयी होड़ उसे उकसाती रहती है।

आज लगभग भारत समेत विश्व के अधिकॉश देश बन्दीग्रसत( लाकडाउन ) हैं। एकाएक सारी हलचल सिमट सी गयी है। सारे बाजार, औद्योगिक कल कारखाने, पर्यटन यातायात सब कुछ थम सा गया है। सड़कें वीरान सी हो गयी है।समुद्री तट भी वीरान हो चुके है।  लोग सिर्फ अपनी देहलीज पर सिमट गये है।  इस वीरानगी मे कुछ सकारात्मकता भी प्रतीत होती है। बड़े बड़े महानगरो का वायु प्रदूषण,  कल कारखानो एवं गाड़ियो से निकलने वाली जहरीली गैसे कम होने लगी है। इतना ही नही गंगा नदी के जल प्रदूषण मे कमी पायी गयी ।  कारण साफ है कि मानव का इन कुछ दिनो से हस्तक्षेप कम हुआ है। पर्यटको की दखलन्दाजी से समुद्री तटो का प्रदूषण मे भी कमी आंकी जा रही है। इन कमियो को दूर करने के लिये सरकारे तमाम माथापच्ची करते है किन्तु कुछ भी लाभ नही होता है। है न विचित्र बात! और कई टन कार्बन उत्सर्जन अचानक कम हो गया है। इस प्रकारन्तर मे समूचे विश्व को प्रकृति  के साथ न्याय करने का अवसर भी मिल गया है।
स्वास्थ्य के लिये हवा साफ चाहिये,कोरोना भी फेफड़ों पर आक्रमण करता है,इसलिए ठीक होने के लिए साफ हवा की भी आवश्यकता होगी ।  निश्चित है मरीजो के उपचार मे ये लाभदायक होगा। आशा ही नही  विश्वास भी है कि मनुष्य  पुन्: विजयी होगा। किन्तु कुछ प्रश्न चिन्हो के साथ।

इसी सन्दर्भ मे आज एक सुखद समाचार भी देखने को मिला। बताया जा रहा है कि फिलीपीन्स का समुद्रीतट जो पर्यटको से भरा रहता  था आजकल वीरान सा है।और इस वीरानगी मे समुद्री गुलाबी जेलफिश ने तट पर अपना डेरा डाल दिया है। स्पष्ट है कि मानवीय व्यवधानो के कारण ये भी अपनी रक्षा के लिए समुद्र के निचले तल पर जाने के लिये मजबूर है। जबकि आज वे स्वयं सूर्य दर्शन के लिये बाहर निकली है।

और ऐसा भी नही है कि मनुष्य को प्रकृति ने कभी चेतावनी न दी हो किन्तु वह समझने को तैयार ही नही। सागरो मे उठती सुनामी, नदियो मे आती प्रलयंकारी बाढे ये सब उसकी वे आवाजे थी जिन पर कभी मानवीय विवेचना हुयी ही नही। वह तो स्वयं के ही बचाव के रास्ते ढूंढता रहा है। यह परजीवी कोराना भी मानवीय भूलो के रूप मे उत्पन्न हुआ है और जिसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

निश्चित बात तो यह है कि मनुष्य इस आपदा पर विजयी होगा, किन्तु  फिलहाल यह क्षुद्र जीव ही भारी पड़ रहा है। और यह भी सीख दे रहा है कि प्रकृति की अवहेलना कितनी भारी पड़ती है। बताया जा  रहा है कि चीनऔर वियतनाम ने तो अब कीड़े मकोडे वन्य पशुओ को खाने पर प्रतिबन्ध लगाना प्रारम्भ कर दिया है। जो कि इस वायरस की उत्पति का मुख्य कारण माना जा रहा है।




5/4/2020

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

व्यापार और रोजगार की नयी विधाये

डिजिटल युग मे ONLINE SHOPPING और व्यापार की असीमित संम्भावनाये हैं कुछ प्रयोग कर  देखे।

सोमवार, 9 मई 2016

गंगाजी का जन्मदिन- अक्षय तृतीया।




वैशाख शुक्ल पक्ष  की तृतीया को अक्षय तृतीया  का त्योहार भारत मे बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। प्रायः इस दिन पर लोग स्वर्ण व चांदी के धातुओं को व इन से निर्मित आभूषण खऱीद कर मनाते हैं। इस तिथि को अबूझ मुहूर्त या चिरंजीवी तिथि भी कहते हैं। इसी दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी का जन्म हुआ था और गणेश जी ने व्यास जी के साथ महाभारत लिखना प्रारम्भ किया। इस दिन लोग व्रत और गंगा स्नान कर,  पुण्य अर्जित करते हैं।


अनेक कहानियॉ प्रचलित है। आज ही के दिन,भारतवर्ष को जीवन प्रदान करने वाली पापनाशिनी पुण्य सलिला गंगां का जन्म भी पर्वत राज हिमालय के घऱ,मेनका के  गर्भ से ज्येष्ठ पुत्री के रूप मे हुआ।
               तृतीया नाम वैशाखे शुक्ला नाम्नाक्षया तिथिः।
               हिमालय गृहे यत्र गंगा जाता चतुर्भुजा ।।
               वैशाखे मासिशुक्लायां तृतीयायां दिनार्धके।
               बभूव देवी सा गंगा शुक्ला सत्युगाकृतिः।।
                                           वृहद्धर्मपुराण।

सती के देह त्याग के पश्चात् देवताओ ने महेश्वरी की स्तुति कर पुनः महादेव के वरण की प्रार्थना की,तभी वह स्वयं कीं इच्छानुकूल हिमालय के घर ज्येष्ठ पुत्री गंगा के रूप में प्रकट हुयी। तदन्नतर वे देवताओ के अनुरोध पर शिव के साथ कैलाश धाम चली गयी। ब्रहमा के अनरोध पर अन्तर्धानांश से अर्थात् निराकार रूप मे कमण्डलु में स्थित हो गयी।तत्पश्चात भगवान शंकर गंगा जी को लेकर वैकुण्ठ में गये। वहां विष्णु के आग्रह पर महादेव रागिनी गाने लगे,तो भावविभोर होकर विष्णु स्वयं  रसमय होकर द्रवीभूत हो गये, उसी समय ब्रहमा जी ने उस द्रव को अपने कमण्डलु से स्पर्श कराया,स्पर्श होते ही गंगा जी स्वयं निराकारा  से  नीराकार अर्थात् जलमय हो गयी।
 
दीर्घावधि तक गंगा जी कमण्डलु मे ही अवस्थित रही। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कियाऔर शुक्राचार्य के व्यवधान के पश्चात् भी राजा बलि वामन भगवान को तीन पग जमीन प्रदान करते है। जैसे ही श्री विष्णु एक पग मे धरती और दूसरे मे वैकुण्ठ धाम नाप देते


है, उसी समय ब्रहमां जी भगवान विष्णु के पैर को कमण्डलु के जल से प्रक्षालित कर देते हैं, और इस प्रकार वह जल पूर्ण रूप से ब्रहमद्रव मे परिवर्तित हो गया।

देवी भागवत के अनुसार लक्ष्मी, सरस्वती व गंगा, तीनो ही भगवान विष्णु की पत्नियां हैं। किन्तु तीनो में सदैव ईर्ष्यां के कारण कलह व्याप्त रहता था।  एक बार सऱस्वती और गंगा के झगड़े के दौरान लक्ष्मी ने गंगा का बचाव किया और सरस्वती को झगड़ा खत्म करने को कहा, परन्तु सरस्वती ने लक्ष्मी को ही शाप दे डाला कि तुम मृत्यु लोक मे जाकर वृक्ष एवं नदी स्वरूपा हो जाओ तथा गंगा को भी मृत्युलोक मे नदी रूप मे परिवर्तित होकर वहां के पाप धोने का शाप दिया। तब गंगा ने भी सरस्वती को शापित कर नदी रूप मे मृत्यु लोक जाने का कहा। 

तदनन्तर विष्णु जी ने तीनो को पास  बुलाया  और कहा लक्ष्मी तुम अपनी कला से पृथ्वी पर जाओ। वहां राजा धर्मध्वज के यहां जाकर स्वयं प्रकट हो जाना। कुछ समय बाद भारतकी पुण्य भूमि मे त्रैलोकपावनी तुलसी के रूप मे तुम्हारी ख्याति होगी, परंतु अभी तुम सरस्वती के शाप से आर्यधरा पर पद्मावती सरिता बन कर जाओ।

गंगे ! तुम्हे सरस्वती का शाप पूर्ण करने के लिये  अपने अँश से पापनाशनी पवित्र सरिता बन कर भारतवर्ष में, राजा भगीरथ के तप और अनुरोध पर जाना पड़ेगा। वहॉ धरातल पर तुम भगीरथी के नाम से प्रख्यात होगी,तथा मेरे अंश से समुद्र की पत्नी होना स्वीकार कर लेना।

“भारती!”प्रभु ने सरस्वती से कहा। तुम गंगा के शाप निहित अपनी एक कला से आर्यभूमि पर जाओ तथा पूर्ण अंश से ब्रहम सदन जाकर उनकी कामिनी बन जाओ,और गंगा अपने पूर्ण अंश से शिव के यहां जाये।  तथा लक्ष्मी को पूर्ण अंश से स्वयं के पास रहने का निर्देश दिया।
इस प्रकार इनके शाप भी भारतवर्ष के लिये वरदान साबित हुये। किन्तु लक्ष्मी के अनुरोध पर भगवान विष्णु बताते है कि कलिके पांच सहस्र वर्ष व्यतीत होने पर तुम  सरिता स्वरूपणी तीनो का उद्धार हो जायेगा और पुनःवैकुण्ठ वापस आ जाओगी।