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शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

ढोल और ढोल सागर - लुप्त होती उतराखंड की लोक कला

ढोल और दमाओं
संगीत और नृत्य  दोनों के लिए वाद्य यंत्रों की आवश्यकता मनुष्य की सदा से बनी रही है. इसीलिए समयानुकूल तरह तरह  के वाद्य यंत्रों का अविष्कार  होता रहा। कुछ यंत्र तो सामयिक रूप से अवतरित होते रहे, किन्तु कुछ पारंपरिक रूप से दीर्घावधि में ज्यों के त्यों बने रहे। उनके स्वरूप और प्रयोग में विशेष परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ। उन्हीं में से एक यन्त्र है ढोल। जिसके स्वरुप और प्रयोग में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई दिया।

ढोल  की थाप पर मनुष्य के तो पैर थिरकते ही हैं, किन्तु स्वर्ग से सोते हुए देवी , देवता और अप्सराये  भी धरा पर थिरकने को मजबूर हो जाती हैं। एक थाप पर  अनेको लोग देव रूप धारण कर लेते हैं, और  एक गलत थाप पर न जाने कौन सी  आपदा आ पड़े  कोई नहीं जानता।

ढोल बजाने की  कई विधियां  हैं कई ताल हैं। इस पर पूरा ढोल सागर लिखा गया है, ढोल सागर का मूल संकलन पंडित ब्रह्मानंद थपलियाल ने १९१३ से आरंभ कर श्री बद्रिकेदारेश्वर प्रेस  पौड़ी गढ़वाल से १९३२ में प्रकाशित किया था। तत्पश्चात श्री अबोध बंधू बहुगुणा ने इसे आदि गद्य के नाम  से "गाड मेटी गंगा" में प्रकाशित  किया। तथा एक ढोल वादक शिल्पकार केशव अनुरागी ने महान संत  गोरख  नाथ के दार्शनिक सिद्धांतों  के आधार पर विस्तृत व्यख्या एवं संगीतमय लिपि का प्रचार प्रसार भी किया। केशव अनुरागी के विषय में मंगलेश डबराल लिखते हैं :-

  ढोल एक समुद्र है साहब केशव अनुरागी कहता था,
  इसके बीसियों  ताल  और सैकड़ों सबद , अरे कई तो मर खप गए पुरखों की तरह,
  फिर भी संसार में आने जाने  अलग अलग ताल साल,
  लोग कहते हैं केशव अनुरागी ढोल के भीतर रहता है.
,
स्व शिवा नन्द नौटियाल, उत्तर प्रदेश के पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री  जिन्होंने ढोल सागर के कई छंदों को गढ़वाल के नृत्य-गीत पुस्तक में सम्पूर्ण स्थान दिया, एवम   बरसुड़ी  के डा विष्णुदत्त कुकरेती एवम डा विजय दास ने भी ढोल सागर की समुचित  व्याख्या की है ।
प्रारंभिक जानकारियों के अनुसार ढोल की उत्पति और वाद्य  शैली पर शिव और पार्वती के बीच एक लम्बा संवाद होता है। प्राय उत्तराखंड में जब भी किसी शुभ या अशुभ अवसर पर ढोल वादन होता है तो ढोली (ढोल वादक) के मुख से इस सवांद का गायन मुखरित होता है।

ढोल सागर में पृथ्वी संरचना के नौ खंड सात द्वीप और नौ मंडल का वर्णन व्याप्त है। ढोल ताम्र जडित, चर्म पूड़ से मुडाया जाता है। ढोल की उत्पति के बारे में ढोल सागर कहता है " अरे आवजी ढोल किले ढोल्य़ा   किले बटोल्य़ा किले ढोल गड़ायो किने  ढोल मुडाया , कीने ढोल ऊपरी कंदोटी चढाया अरेगुनी जनं ढोलइश्वर ने ढोल्य़ा पारबती ने बटोल्या विष्णु नारायण जी गड़ाया चारेजुग ढोल मुडाया ब्रह्मा जी ढोलउपरी कंदोटी चढाया इ"आगे कहते है " श्री इश्वरोवाच I I अरे आवजी कहो ढोलीढोल  का मूलं कहाँ ढोली ढोल कको शाखा कहाँ ढोली ढोली का पेट कहाँ ढोली ढोल का आंखा II श्री पारबत्युवाच II  अरे आवजी उत्तर ढोलीढोल का मूलं पश्चिम ढोली ढोल का शाखा दक्षिण ढोल ढोली का पेट पूरब ढोल ढोली का आंखा I "।
ढोल सागर में  वर्णित है ढोल शिव पुत्र है, डोरीका ब्रह्मा पुत्र ,पूड़ विष्णु  पुत्र, कुण्डलिया नाग पुत्र, कन्दोतिका कुरु पुत्र, गुनिजन पुत्र कसणिका, शब्दध्वनि  आरंभ पुत्र, और भीम पुत्र गजाबल।  

ढोल की भाषा का आदि उत्पति अक्षर भी " अरे आवजी शारदा उतपति अक्षर प्रकाश I I  अ ई उ रि ल्रि ए औ ह य व त ल गं म ण न झ घ ढ ध  ज ब ग ड द क प श ष स इति अक्षर प्रकाशम I  इश्वरो वाच I I " ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार पाणिनि के व्याकरण  के आरंभ सूत्र जो कि शिव डमरू से उत्पन्न हुए ।   जब ढोली ढोल को कसता है  तो शब्द त्रिणि त्रिणि ता ता ता ठन ठन, तीसरी बार कसने पर त्रि ति तो कनाथच त्रिणि  ता ता धी धिग ल़ा धी जल धिग ल़ा ता ता के रूप में बज उठता है  इसी तरह बारह बार ढोल को कसने की प्रक्रिया होती है और भिन्न भिन्न ध्वनिया गूंज  उठती हैं।

ढोल सुख, दुःख और पूजा सभी कार्यों में  बजता है उतराई, चढाई, स्वागत प्रस्थान,  आरंभ और समापन सभी के लिए अलग अलग ताल और सबद हैं। ढोली की पांच अंगुलियाँ  और हथेली और दुसरे हाथ से डंडे, जब ढोल पर थाप देते हैं तो भगवन शंकर  कहते हैं "  अरे आवजी प्रथमे अंगुळी में ब्रण बाजती I  दूसरी अंगुली मूल बाजन्ती I तीसरी अंगुली अबदी बाजंती I चतुर्थ अंगुली ठन ठन ठन करती I झपटि झपटि बाजि अंगुसटिका  I  धूम धाम बजे गजाबलम I  पारबत्यु वाच I  अरे आवजी दस दिसा को ढोल बजाई तो I पूरब तो खूंटम . दसतो त्रि भुवनं . नामाम गता नवधम  तवतम ता ता तानम तो ता ता दिनी ता दिगी ता धिग ता दिशा शब्दम प्रक्रित्रित्ता . पूरब दिसा को सुन्दरिका  I बार सुंदरी नाम ढोल बजायिते  I  उत्तर दिसा दिगनी ता ता ता नन्ता झे झे नन्ता उत्तर दिसा को सूत्रिका बीर उत्तर दिसा नमस्तुत्ये I इति उत्तर दिसा शब्द बजायिते I "।

मेरी जानकारी के अनुसार संभवतः किसी भी वाद्य यन्त्र के लिए इतना बड़ा साहित्य न होगा  किन्तु आज इस लोक कला की मृत्यु होती जा रही है जिस ढोल की थाप पर  देवता  और अप्सराएं  थिरकती हों उसी ढोल की  एक गलत ताल या सबद पर आसुरी शक्तियां जाग उठती हैं  जिसे स्थानीय भाषा में वयाल फैलना  कहा जाता है। इसे रोक पाने के लिए अच्छे जानकर ढोली की आवश्यकता होती है नहीं तो अनिष्ट ही सन्निकट होता है। ढोली एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर बजते ढोल - ढोली के साथ भी अपना संवाद स्थापित  करता है.   
आज इस परम्परा  से जुड़े लोग, इस लोक कला से विमुख होते चले गए, कारण कुछ सरकारी नीतियाँ  और पढ़ लिख जाना  रहा  है. क्योंकि इस व्यवसाय से  अनुसूचित जाति के लोग जुड़े हुए थे. जो थोड़े  बहुत बचे हैं  उनमे जानकारियों  की भारी कमियां  हैं ।
  हेमवती ननद बहुगुणा  गढ़वाल विश्व विद्यालय श्रीनगर   के  लोक संस्कृति विभाग  के डारेक्टर श्री डी आर पुरोहित इस कला को बचाने के लिए सक्रिय  हैं। इन्ही के सौजन्य से अमेरिका के सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के प्रो स्टीफन सियोल की मुलाकात टिहरी के  एक ढोल वादक सोहन लाल सैनी से हुई. उसकी बाजीगरी को देखते ही स्टीफन स्वयम उनसे प्रेरित हो ढोल बजाना सीखने लगे। परिणाम तह स्टीफन ने सोहन लाल को सिनसिनाटी  में ढोल सिखाने के लिए विजिटिंग  प्रोफ़ेसर के तौर पर अमेरिका आमंत्रित  किया। मुश्किल से छठी क्लास पढ़े हुए सोहन लाल के लिए तो गौरव की बात थी। किन्तु उत्तराखंड और भारत के लिए भी गर्व का विषय है,  और अब उत्तराखंड का ढोल अमेरिका में भी गूंज उठा .




सौजन्य (सामग्री संग्रह)- भीष्म कुकरेती   ( सेक्रेट्स ऑफ़ ढोल सागर )
चित्र - गूगल से साभार
( लम्बे समय से नेट से अनुपस्थित  रहने  के कारण न तो ब्लागरों से संपर्क रहा और न ही कोई नयी पोस्ट )

बुधवार, 15 जून 2011

एक और घर पर ताला लगा ही दिया है!

  "अस्त्युत्तरस्याम दिशी देवतात्मा .हिमालयो नाम नगाधिराज :,
   पूर्वापरो तोयनिधि वगाह्या ,स्थित :पृथिव्याम एव मानदंड : ||  "
कुमारसंभव का प्रारंभ  करते हुए महा कवि कालिदास ने जिस हिमालय पर्वत को नगाधिराज की उपाधि प्रदान की उस नगाधि राज की प्राकृतिक सम्पदा, सुन्दरता  और वैभव  की असीम  ख्याति पूरे विश्व में फैली हुई है . यह  कालिदास की मात्र कल्पना नहीं थी बल्कि सजीव  और वास्तविक जीवन को धारण करने वाले पर्वत की स्तुति थी. जिस तरह पूरा विश्व आज इस नगपति के जीवन से कुछ न कुछ प्राप्त कर लेना चाहता है अपनी पताकाओं से हर व्यक्ति अपने को इस ऊँचे हिमालय की तरह ऊँचा प्रदर्शित करने की होड़ में लगा हुआ है  तो निसंदेह यह नगपति वैभवशाली  ही है .

पर्यटकों को  आकर्षित करने वाला हिमालय और हिमालयी क्षेत्र  तो पर्यटन  और घुमक्कड़ी के लिए स्वर्ग  है .
अभी जहाँ फरवरी  और मार्च में उत्तराखंड के जंगल  बुरांस के लाल फूलों की  रक्ताभ चादर सी ओढ़े हुआ था  वही आजकल ( मई और जून) में काफल , हिसोरा  और किन्गोड़े  से  लद पद है .  जंगलों में घुमक्कड़ी  करने और इन फलों को पेड़ो से तोड़ कर खाने का  आनंद ही स्वर्गिक  है.  
 हिमालयी क्षेत्र  उत्तराखंड  देव भूमि कहलाता है  यहाँ देवताओं के निवास के लिए  तो सभी सुख उपलब्ध  है . किन्तु मानवीय जीवन  अत्यंत  विकट है .  इस क्षेत्र की बड़ी विडम्बनाएं  है . यहाँ से निकलती हुई गंगा यमुना  पूरे देश को सींचती हुई, प्यास को तृप्त करती हुई, अरब सागर में जा मिलती है शेष जल के निष्पादन  के लिए . यह क्षेत्र इन इठलाती नदियों  पर गर्व भी महसूस  करता है  मैती  होने का. परन्तु पानी तलहटी से बहता चला जाता है  और खेत इन  गाँव के सूखे के सूखे .  वनस्पतीय, एवं औषधीय  सम्पदा का दोहन  का लाभ भी इस क्षेत्र  को  नहीं मिल पाता है. क्योंकि इन पर सरकारी नियंत्रण है .

  जब तक शिक्षा का प्रसार  नहीं था तब से ही क्षेत्र के लोग आजीविका  के लिए मैदानी  शहरो की ओर जाते रहे . यद्यपि खेती से होने वाले उत्पादन से साल भर का अनाज तो उपलब्ध होता था दूध , घी, शहद  की भी प्रचुरता  रही  है   जनसँख्या कम  थी . अब परिस्थितियां बदली हुई है शिक्षा में तो उत्तराखंड देश के सबसे अधिक शिक्षित राज्यों में से एक है किन्तु  बढती जनसँख्या के हिसाब से खेती का उत्पादन,  जो आसमानी बरसात पर निर्भर रहती है,   कम होता चला गया  और शिक्षा के कारण पारंपरिक खेती से युवाओं  की   रूचि और ध्यान हटता चला गया .  और वे रोजगार की खोज में पलायन करते चले गए और शहरों की  अंधी गलियों में गुमनाम  होते चले गए

पलायन से  कई लोग तो इन शहरों में पूर्णतया रच बस गए और कुछ दो नावो में पैर रख कर अपने को संभाले हुए हैं . उतराखंड को राज्य बने हुए लगभग दस वर्ष पूरे हो चुके है कितु  पलायन  को अभी भी रोका न जा सका. समस्या इतनी गंभीर है की गाँव के आस पास  सरकारी नौकरी करने वाले लोग भी गाँव छोड़ कर राज्य की राजधानी  देहरादून में जाकर बस जाना चाहते हैं . गाँव के गाँव खाली होते चले जा रहे हैं.  कई गाँव तो ऐसे मिलेगे जहाँ पुरुष  नाम की  चीज नहीं  है  शव दाह तक का कार्य महिलाओं को करना पड़ता है .  जब कोई व्यक्ति शहर में नौकरी  करता है तो उसका वहां पर मकान खरीदना, बच्चों की परवरिश हेतु धीरे धीरे बस जाना  तो कुछ समझ आता है किन्तु जो लोग गाँव से जायदाद बेच कर, पास के स्कूल में नौकरी करते हुए शहर में बसने की चाहत लिए हुए हैं या बस गए है मेरी समझ से परे है . यद्यपि जीवन वहां पर अति विकट है परन्तु ये कैसी समझदारी ?
अब कुछ इसी तरह के शिकार मेरे परिवार  के लोग भी होते जा रहे है  पांच चाचा ताउओं के हम पंद्रह भाई है  दो तीन को छोड़ कर  सभी नौकरी  पेशा है  कुछ उत्तराखंड से बाहर है तो कुछ घरेलु जनपद में ही . सभी में पूज्य बड़े भाई  सभी पारिवारिक कार्यों  जैसे विवाह समारोहों, पूजा  आदि सभी  में अग्रणी रहा करते हैं सभी उन्हें समादर  भी करते है. उन्होंने पूरा जीवन डाक विभाग में  E D A कर्मचारी की तरह  वही के लिए समर्पित कर दिया  पढ़े लिखे थे  उस समय पर विभागीय परीक्षाओं के द्वारा वे भी बाहर जा सकते थे किन्तु    नहीं  गए  . उनके दो पुत्र है बड़े वाले गाँव में ही आजीविका  का जुगाड़ करता है किन्तु  छोटा मुंबई में रहता है . बड़े बेटे  से सम्बन्ध भी थोडा ढीले  हैं भाभी जी का भी देहांत हो गया है . अब  वे छोटे बेटे के बच्चों की देखभाल में व्यस्त थे  किन्तु उसने भी अपनी समस्याओं  के मद्देनजर बच्चों  को मुंबई ले जाने की ठान ली.  अब समस्या  थी बड़े भाई साहब की खान पान की  व्यवस्था   का, तो वे साथ  में जाने को तैयार हुए चाहे वेमन  से ही .
इस बात की मुझे पहले खबर मिली  किन्तु एकाएक विश्वास सा नहीं हुआ  किन्तु अभी दो दिन पूर्व देहरादून में  जाकर पाता चला की वे सचमुच  चले  गए है  भाई  साहब की उम्र  लगभग ७६ वर्ष की होगी  अर्थात अब वे हर पारिवारिक  कार्य से भी वंचित रह जायेंगे  एक तो वृद्ध  शरीर और दूसरा आर्थिक  पहलु . दोनों ही भारी पड़ेगें.
 और आखिर कर इस विभीषिका ने एक और घर पर ताला लगा ही  दिया है.  हम लोग भी न जाने कब मिल पाएंगे  यह पता नहीं है .  

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

हिमालय के अंतराल में छिपे कुछ दर्शनीय एवं पौराणिक स्थल

यों तो गढ़वाल ही नहीं अपितु सारे उत्तराखंड में तीर्थ स्थलों, मंदिरों एवं सुरम्य पर्यटक स्थलों की भरमार है । इस धरोहर के लिए भारत ही नहीं पूरे विश्व में प्रसिद्द है इसी कारण हजारों तीर्थ यात्री एवं पर्यटक उत्तराखंड पहुँचते हैं।
प्रायः लोग मुख्य स्थानों , बदरीनाथ केदारनाथ , नैनीताल, कौसानी, मसूरी, हरिद्वार, ऋषिकेश, एवं गंगोत्री यामोत्री धाम की ओर रुख करते हैं। जो हमेशा के लिए अपने दर्शकों का मन मोह लेते हैं। परन्तु कई छोटे छोटे व् दुर्गम तीर्थ एवं पौराणिक , पर्यटक स्थल हैं जिनसे स्थानीय लोगों के सिवाय बाहर की दुनिया अभी भी अनभिज्ञ हैं।
आइये ऐसे ही कुछ स्थलों से आपका परिचय कराता हूँ :-

त्रिकुटी सरोवर ( तारा कुण्ड) - उत्तराखंड में कमलेश्वर ( पौड़ी गढ़वाल ) से लेकर बागेश्वर (कुमांऊ) तक फैला हुआ राष्ट्रकूट नामक पर्वत श्रृखला है । इस पर त्रिकुट नामक श्रेणी है । इस श्रेणी पर अकल्पनीय एक सुन्दर जलाशय एवं शिव मंदिर है जिसे तारकुंड या त्रिकुटी सरोवर भी कहते हैं। विरानेश्वर( विन्देश्वर या बिनसर ) भी इसी पर्वत श्रृखला पर स्थित है। इसका वर्णन स्कन्द पुराण में भी उपलब्ध है। लोगों के मतानुसार इस क्षेत्र का नाम राठ भी इसी पर्वत के नाम का विकृत रूप है।

तारा कुण्ड पौड़ी से लगभग ६० से ७० किलो मीटर की दूरी समुद्र ताल से १६०० मीटर की उचाई पर पट्टी धैज्युली ग्राम बडेथ के ठीक ऊपर चोटी पर स्थित है। यहाँ तक पहुचने के लिए पौड़ी से पैठाणी-चाकिसैन तक मोटर मार्ग तथा चकिसैन से पैदल सीधी खड़ी चढ़ाई लगभग ७- ८ किलोमीटर । चाकिसैन समुद्र तल से लगभग १५३० मी की उचाई पर स्थित है । दूसरा मार्ग पैठाणी से मोटर मार्ग होता हुआ सिर्तोली , पल्ली होते हुए ठीक बडेथ गाँव तक पहुंचा जा सकता है।
इस शिखर पर एक शिव मंदिर एवं सुन्दर जलाशय व् एक कुंवा है जिसकी गहराई १०-१२। मी बताई जाती है इस शिखर से दोनों ओर के सभी गाँव दृष्टिगोचर होते हैं। इतनी ऊँचाई पर होने के बावजूद पानी की उपलब्धता , एक तालाब और कुण्ड के रूप में अकल्पनीय लगती है। परन्तु यहाँ हर मौषम में पूरे साल पानी उपलब्ध रहता है।
भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी एवं phalgun शिवरात्रि पर मेले के आयोजन भी होता है। कृष्ण जन्माष्टमी पर इस सरोवर में प्रायः नील कमल खिले रहते हैं मन भावनी बरसात की हरियाली और वसंत पर खिलते लाल बुरांश इन मेलों की शोभा पर चार चाँद लगा देते हैं प्रकृति का यह मनोरम दृश्य बरबस मन को मोह लेता है।
मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक छोटी से गुफा नुमा सुरंग सी है कुछ वर्ष पहले यहं एक योगिनी रहा करती थी जब श्रद्धालु गुफा के आगे चावल या भेट स्वरूप पैसे रखते थे तो तो चूहे आकर वस्तुओं को उठाकर योगिनी तक ले जाते थे ऐसा योगिनी स्वयं बताती थी
किंवदंतियों के अनुसार भागीरथ जब आकाश मार्ग से गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास कर रहे थे कुछ छोटी सी जल धारा यहाँ पर पदार्पित हुई और और पानी का बहाव इतना तेज था किआज भी नीचे के गांवों ( ऐन्गार , कुटकांडई,) में स्पष्ट दिखाई देता है कि कभी यहाँ बढ़ जैसी आपदा आयी होगी बड़े बड़े शिलाखंड इस बात कि ओर कुछ तो इशारा करते हैं ।
कुटकांडई महदेव के ठीक ऊपर एक बहुत बड़ा शिलाखंड है जो दूर से देखने पर शीघ्र गिर जाने कि संभावना प्रतीत होती है कई वर्षोंसे यह एक छोटे पत्थर की ओट पर टिका हुआ है।
तारा कुण्ड की विशेषता तालाब और कुण्ड के पानी की है । बरसात में प्रायः तालाब का पानी गन्दा हो जाता है किन्तु साथ में ही कुण्ड का पानी बिलकुल स्वच्छ रहता है। कुण्ड के पानी को लोग गंगा जल की तरह घरों को लेकर जाते हैं निकासी के रूप में कुण्ड का पानी दो श्रोतो से कोटेश्वर( कुट कांडई ) महादेव तथा राहू के मंदिर पैठाणी में निकलता है।

राहू का मंदिर - त्रिकुट पर्वत की घाटी में , श्योलिगड़( रथ वाहिनी) एवं पश्चिमी नयार ( नवालिका ) के पुनीत संगम पर पैठाणी गाँव स्थित है। यहाँ पर राहू का मंदिर है । कुछ लोगों के मतानुसार यह मंदिर पांडवों तथा कुछ शंकराचार्य द्वारा निर्मित बताते है। इस मंदिर की उपरी शिखा कुछ झुकी हुई प्रतीत होती है। इस स्थान का नाम पैठाणी राहू के गोत्र पैठानासी के कारण पड़ा । "राठेनापुरादेभव पैठानासी गोत्र राहो इहागच्छेदनिष्ठ " और राहू के मंदिर के कारण संभवतः इस समूचे क्षेत्र का नाम राठ पड़ा । यहाँ के लोग पहले काले वस्त्र पहना करते थे चूँकि राहू को काले वस्तुए एवं वस्त्र पसंद है इसीलिए संभवतः काले वस्त्र प्रचलन में आये हों ।

पौड़ी से पैठाणी की दूरी लगभग ५०की मी है यहाँ तक सीधे मोटर मार्ग उपलब्ध है। मंदिर का निर्माण काल तथा बनावट के निश्चय हेतु पुरातत्वा वेताओं का अध्यन आवश्यक है। फिलहाल यह मदिर भारतीय पुरातत्वा विभाग के संरक्षण में है। सरकार को चाहिए ऐसे स्थलों की ओर ध्यान देकर उनका पुनरुधार तथा संदार्यी करण एवं विकास करना चाहिए।


शिन्गोड़-इसी राष्ट्रकूट पर्वत श्रृखला पर दूधातोली वन प्रखंड में शिन्गोड़ नामक स्थान है। जिसे रिस्ती की भरवाडी भी कहते है रिस्ती रथ क्षेत्र का आखिरी गाँव है। चाकी सैन से रिस्ती की दूरी लगभर ३५-४० कि मी
है। यहं के लिए माना जाता है कि रामायण कालीन महर्षि श्रृंग का आश्रम है यह क्षेत्र प्राकृतिक सम्पदा एवं सुन्दरता के लिए अलोकिक रूप से धनी है।

स्कन्द पुराण के अनुसार इस आश्रम के पास से ही वहां की तीन प्रमुख नदियों का उदगम स्थल है।ये नदियाँ रथवाहिनी , नावालिका , तथा व्यास गंगा कहलाती हैं । रथ वाहिनी ( स्योलिगड़ ) तथा नावालिका ( पश्चिमी नयार ) दोनों पैठाणी में संगम करती हैं तथा ये दोनों मिलकर व्यास गंगा( पूर्वी नयार) के साथ सतपुली संगम करते हैं ।
इस क्षेत्र में अन्न और दूध, घी तथा शहद कि प्रचुरता पाई जाती है।

इतने पौराणिक स्थलों एवं प्राकृतिक सुन्दरता की अनुपम छटा लिए हुए होने पर भी ये सभी स्थान विकास की गति से दूर हैं यदि यहाँ पर सुविधाएं एवं संरक्षण सरकार द्वारा प्रदान किया जाय तो ये सभी स्थल पर्यटन और तीर्थ के रूप में उभर सकते हैं। इन स्थानों पर पर्याप्त शोध की आवश्यकता है। जिससे पर्यटन में नया अध्याय जुड़ सके ।

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

बुन्खाल में काली की पूजा और पशु संहार

          सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके , शरण्यं त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते .
उत्तराखंड देव भूमि कहलाती है  तमाम देवी देवताओं का निवास स्थल है उत्तराखंड . मान्यताएं  और आस्था का अनुपमन संगम .
प्राकृतिक सुन्दरता और वैभव से सुसज्जित .  किन्तु इसके साथ हैं कुछ अभिशप्त करने वाली आस्थाएं  जैसे विभिन्न  देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए की गयी पशु बलि मनोतियां .
पशु बलि वंहा पर अक्षर सभी देवी देवताओं को चढ़ाई जाती है किन्तु  माँ काली  के सम्मुख तो असंख्य पशुओं को एक साथ निर्मम संहार होता है  माँ काली का प्रभाव तो सबसे अधिक  पशिचिमी बंगाल में  था  परन्तु आज वहां  पर बलि प्रथा समाप्त हो चुकी है.  प्रतीकात्मक बलि तो आज भी  दी जाती है पशु हत्या पर रोक लग चुकी है. . उत्तराखंड ने  अभी भी इस प्रथा को कायम रखा   है.
गढ़वाल क्षेत्र में,   बुन्खाल  में  काली माँ  का  थाल है  यहाँ पर हर वर्ष मार्गशीर्ष  के महीने में  भव्य मेला लगता है   दूर दूर  तक  के लोग यहं मेला देखने,  अपनी मनोती मनाने और पूर्ण हुई   मनोती की पूर्णाहुति देने पहुँचते  हैं .
घटना कुछ सत्य बातों पर आधारित है,  उनिस्व्वी शताब्दी के  उतरार्ध में  किसी  समय कुछ  गाँव के बच्चे   इन खेतों के पास गाय बछियों  के साथ खेलते रहे  किसी विवाद या खेल के कारण  इन बच्चों ने किसी  लड़की  को  गढ़े में   गाढ़ दिया  और सारे बच्चे घर चले गए किन्तु उस लड़की को बाहर निकालना भूल गए फलस्वरूप उसकी म्रत्यु  हो गयी  जब घर में खोज की गयी    तो उसका कही पता नहीं चला . कहते है उस  लड़की ने अपनी माँ को सपने में अपने मरने की व्यथा  सुनाई और ये भी कहा की मुझे वहां से मत निकालना  मैं  देवी के रूप में परवर्तित हो चुकी हूँ .  कहते है  कभी देर  रात्रि तक जो लोग घर नहीं पहुँच पाते थे  या किसी प्रकार का खतरा होता था तो वह आवाज देकर उन्हें सचेत करती थी  जंगली जानवरों से , लुटेरों डाकुओं  आदि खतरों से स्थानीय लोगो को सचेत करती रहती थी . सचेत ही नहीं सुरक्षा भी करती थी
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गढ़वाल में गोरखे आततायी बन कर आये  इसी समय  गढ़वाल की सुरक्षा के लिए गढ़वाल नरेश ने ब्रिटिश शासन  से मदद मांगी थी .  उस समय भी काली  ने  लोगों  को सुरक्षा के लिए  सचेत किया था  उसकी आवाज गोरखों  के कानो में पड़ी और उन्होंने उसे गढ़े  से निकालकर उसी गढ़े में उल्टा गाढ़ दिया  तब से उसकी आवाजे लगनी बंद हो गयी .
इसी महत्व  के कारण यहाँ  पर प्रारंभ से ही मेला लगता रहा  और  पशु बलिया होती चली आ रही हैं. सैकणों निरीह भैसा ( बागी) और मेढ़ो (खाडू) की बालियाँ दी  जारही हैं.
कुछ समय से प्रशासन यहाँ  लोगों को चेतावनियाँ  देता आ रहा था  कई बार पुलिस बल तैनात भी किये गए कितुं आस्था का सैलाब पुलिस और प्रशासन को बौना कर देता और वे सिर्फ मेले के दर्शक बन कर रह जाते . सुना  है इस बार प्रशासन  ने पहले ही इसके लिए कुछ व्यवस्था बनाई  और किसी सीमा  तक  सफलता भी प्राप्त की  अर्थात कुछ लोगो ने प्रशासन के रुख को देखते हुए अपने कार्यकर्म या   रद्द कर दिए   या उन में परिवर्तन  किया  जो लोग  पशुओं को लेकर वहां पहुचे  उन्हें रोका तो  नहीं  कितु उन्हें परंपरागत  तरीके से बलि देने में परेशानी हुई क्योंकि मुख्य हन्ता ( जो सबसे पहले पशु पर तलवार आंशिक रूप से चलाता  है)  भी अनुपस्थित  रहे .
खबर है की  अब प्रशासन उन पर मुकदमें चलाने की फिराक में है.  अन्ततोगत्वा अब लोग भी धीरे  धीरे  जागरूक होते जा रहे हैं . इस सारी सफलता  के लिए स्थानीय  गाँव के लोग ही स्वयं आगे आये  आशा है भविष्य में इस पर पूरी तरह से रोक लग सके  कानूनी रोक जरूरी नहीं है लोगो की जागृत भावना इस दिशा में काम करे त्तभी सफलता  मिलेगी . बुन्खाल का तो मात्र जिक्र है ऐसी कई जगहे है जहा पर सामूहिक रूप से  इस तरह की  पशु  बलि का आयोजन होता है. और लोग अपने स्वार्थ को सिद्ध करते पाए जाते हैं.
मां काली उन्हें सद बुद्धि प्रदान  करे   और इन पशुओं की अभिवृद्धि  हो सके  जो अब इन बालियों के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं.