मंगलवार, 28 जुलाई 2026

क्वी कोटद्वार, क्वी दिल्ली, क्वी दून

 


 

क्वी कोटद्वार, क्वी दिल्ली, क्वी दून बसी गिन, सौ मौवसु का ये गौं मा पांच ही रै गिन।

 

सोशल मिडिया पर भ्रमण करते हुये, मुझे उपरोक्त पंक्तियाँ सुनने को मिली। जिसमे पहाड़ों का दुख, दर्द, और वास्तविकता का मर्म का सजीव चित्रण है।

हिमालय की गोद में बसा उत्तराखण्ड अपने प्राकृतिक वैभव और सौन्दर्य के लिए सुप्रसिद्ध है। समस्त भारत को जलासिक्त करने वाली गंगा और यमुना के मैती, आज पलायन की विभीषिका से अभिशप्त है। सीढ़ीनुमा खेती जहाँ हरी भरी दिखाई देती थी, आज बेकार और बंजर पड़ी है। दिन प्रतिदिन अनुपयोगी होती जा रही है। सड़को से गुजरते हुये दूर तक नजर दौड़ायें तो साफ दिखाई देता है कि हरियाली के लिये जूझते खेत। बाजारीकरण सब कुछ लील गया है।

इस गीत का पहला पक्ष तो यही है कि पलायन इतने जोर शोर से हुआ कि जिस गाँव में सौ परिवार मौजूद थे, आज मात्र पांच ही रह गये हैं। धीरे -धीरे पूरा गाँव पलायन कर गया। कुछ तो पढ़ लिख कर रोजगार की तलाश मे अन्यत्र चले गये। कुछ लोग स्थानीय स्तर पर काम तो करते रहे किन्तु अपने परिवारों को निकटतम मैदानी क्षेत्रो मे, जैसे देहरादून, कोटद्वार, हल्दवानी आदि स्थानो में पलायन करते चले गये। गीत में चित्रित गाँव की बिडम्बना देखिये कि जहां घरो मे रहने की जगह कम पड़ती थी, आज आदमी देखने को नही मिल रहे हैं। अखण्ड रिक्तता बनी हुयी है। और महत्वपूर्ण बात जिस घर मे ये कलाकार मौजूद है उसकी देहलीज तक विकास सड़क साफ साफ दिखाई दे रही है।

ये विकास की सड़क पलायन के लिए बनी या गाँव की समृद्धि के लिए? पुरखों की संजोई विरासत आज खण्डहरों मे परिवर्तित हो गयी है। जहाँ मनुष्यों की गूँज होती थी, वहाँ आज दिन मे ही बाघ की दहाड़ सुनायी दे रही है।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भी परिस्थितियां सामान्य नहीं हुयी, किन्तु और भी जटिल हुयी। देहरादून, कोटद्वार व हलद्वानी का भूत तो लोगो को उसके बाद ही चढ़ा। विकास का कार्य तो कुछ हद तक हुआ है, स्कूलो की संख्या बढ़ी, सड़के अपनी लम्बाई बढ़ाने में सक्षम हुयी, मैदानी शहरो में औद्यौगिकी करण भी हुआ, किन्तु गाँवो की स्थितियों में आमूल चूक परिवर्तन नहीं हुआ। कई छोटे अस्पताल भी खुले किन्तु साधन विहीन। आकस्मिक परिस्थितियो में  वहां के अस्पताल सिर्फ हाथी के दांत जैसे है।

 

एक समय था जब उत्तराखण्ड अपने पशुधन के कारण समृद्ध था, किन्तु आज परिस्थितियां बदल गयी है। कभी दूध, घी, शहद की कोई कमी नही होती थी, वहीं आज इन सब चीजो के लिए बाजारों पर निर्भर हो गये है। बकरियों और भेड़ो से चलने वाली आर्थिकी मृत प्रायः हो गयी है। जहां कभी अन्न के भंडार भरे होते थे अब राशन का दुकानो की निर्भरता बढ़ गयी है। इसका प्रमुख कारण तो लोगो का पलायन ही है। पहले संयुक्त परिवारों मे श्रमबल की कमी नही होती थी, वही आज एकल परिवारो के कारण लोगो ने वृहद रूप से खेती, व पशुपालन छोड़ दिया है।

जो लोग रोजगार के लिेए बाहर निकले हैं और स्थानीय आवश्यकता के अनुकूल वहीं बस गये है, कुछ हद तक बात समझ आती है, महानगरो की परिस्थितियों के अनुकूल वे तो विवश है, किन्तु ऐसे लोगो की संख्या कम नही है जिनका रोजगार तो स्थानीय स्तर पर है, किन्तु इन लोगों ने अपने परिवारो को देहरादून, हलद्वानी और कोटद्वार मे बसा दिया है।

मैं व्यक्तिगत तौर से, एक ऐसे गाँव को जानता हूँ जो 40- 50 परिवारो का गाँव है, यहां पर कम से कम 10-15 से अधिक लोग अध्यापन का कार्य स्थानीय रूप मे करते हैं, किन्तु उन मे से अधिकांश ने अपने परिवारों को देहरादून मे शिफ्ट कर दिया है। शहरीकरण की संस्कृति के कारण पलायन का दंश झेलने के लिेए लोग अभिशप्त हैं।

 

एक नया चलन और देखने मे आया कि दूल्हे के परिवार वाले जब दुल्हन की खोज करते है, तब दुल्हन के पक्ष वाले लोगों के समक्ष, देहरादून व अन्य मैदानी क्षेत्रों मे होने वाले दूल्हे के पास कोई प्लाट या मकान उनके खुद के नाम पर हो, ताकि विवाहोपरान्त उनकी बेटी, सुखपूर्वक देहरादून मे रह सके। उन्हे गाँव मे रहना अपनी बेटी के भविष्य के साथ खिलवाड़ लगता है। इससे पता चलता है कि पलायन की गति किस तरह से भयावह रूप से गतिमान है।

 

अब तो उत्तराखण्ड केवल एक पिकनिक स्थल बन कर रह गया है। लोग वहां का रुख तभी करते है, जब कोई शादी-ब्याह का निमन्त्रण, या कोई देव पूजा का आयोजन हो रहा हो। या फिर गर्मियो की छुट्टियों मे अल्पकालिक बसेरे के चले जाते है। लोगो के वापस आते ही पुनः सन्नाटा पसर जाता है।

 

गीत के बोलः-

 https://youtu.be/KRIJHBmwbaw?si=ltlgV3mLXFCnJpKx

नौयडा

दिनाँक - 04-06-2026

 

 

 

रविवार, 18 जनवरी 2026

नववर्ष26 पर मतवाली यात्रा- उत्तराखंड कोटाबाग।

  2 जनवरी 2026 हमारे संस्थान के लोगों का समूह नव वर्ष के उपलक्ष‌ मे  उत्तराखंड के कोटाबाग भ्रमण करने के चलने को तैयार था। कुछ ने जाने से व्यक्तिगत कारणों से परहेज किया। 

1 जनवरी की सांय को ‌सभी व्वस्थाए पूर्ण कर ली गयी। साथ ही सभी को प्रातः 6बजे नोएडा सेक्टर 18 पर पहुंच कर गंतव्य के लिए बस पकड़नें का निर्देश  दिया गया। अब प्रतीक्षा थी प्रातः छ बजे की। सभी ने अपनी सम्भावित व्यवस्थाए गंतव्य‌  तक पहुंचनें ‌कर ली। मेरा घर सबसे नजदीक था और पैदल ही पहुंचने में मै सक्षम था। 

आवश्यकतानुसार मैने सभी ‌व्यवस्थाए रात मे ही कर ली थी। प्रातः पांच बजे का अलार्म लगा कर सो गए। किन्तु नींद खुलने मे विलम्ब और अलार्म का सुनायी‌ नही देना तथा सवा छ बजे का समय‌ को सवा चार बजे का भ्रम, सोने पर सुहागा। किन्तु उठ गया और नित्यकर्म से निवृत होने लगा। इस बीच पुनः मोबाइल पर समय देखा तो 6.45, आश्चर्य‌चकित‌ हुआ साथ मे अनेक पुकारें। एक पल लगा कि मै अब रह गया। इन पुकारों से पुनः ‌समपर्क‌ करने पर पता चला कि अभी चलने कुछ समय‌ बाकी‌ है। जल्दी मेैने बेटे‌ को‌ उठा कर बस तक, छोड़ने ‌के‌लिए कहा, ठीक सात बजे मै समूह के साथ सम्मिलित ‌हो‌ सका।

लगभग सवा सात बजे बस रवाना हुयी। तत्पश्चात इंदिरापुरम के पास कुछ अन्य साथियों को भी सम्मिलित किया और गंतव्य की ओर बस गतिमान हुयी। गनीमत थी उस दिन कोहरे से कुछ राहत के कारण दृश्यता अच्छी थीं।  प्रातः कालीन खेतो के हरे भरे दृश्य मन मोह रहे थे।

इस बीच विनीत‌ जैन जी‌ ने, समय‌ को सुगम करने के लिए  अन्ताक्षरी की उद्घोषणा कर दी । फिर ‌क्या‌ लडके और लड़कियों की टोलियां अपनी-अपनी जीत पक्की करने के लिए संघर्षरत रही। और कब हम गजरौला पहुंच गए, अहसास ही नहीं हुआ।

गजरौला मे मोगा रिसोर्ट मे अल्पाहार की व्यवस्था थी। इस अल्पाहार के हाल मे किसी ‌विवाहोत्सव का अहसास हो रहा था, तो अल्पाहार भी विवाह जन्य था।  नव्य व भव्य था।‌ खाऊ प्रकृति वालों ने तो वह खूब उंडेल दिया उदर मे।



अल्पाहार के पश्चात हमे पुनः अपने गंतव्य के लिए चलना तय था। नियति के अनुकूल हम लगभग दस बजे यहां से कोटा वाग की ओर निकल पड़े। बस ने धीरे -धीरे गति पकडी, और गतिमान हो चली। फिर बीच में एक दो जगहों पर, लघुशंका हेतु अल्पविराम ‌ले लिया गया।

दिन मे लगभग ढाई बजे हम लोग कोटा बाग अपने नियत गंतव्य स्थल रिसोर्ट मे पंहुच चुके थे। दोपहर के भोजनोपरान्त तय हुआ कि कुछ दर्शनीय स्थलों की ओर रुख किया जाय। 
 
तत्पश्चात कई गाड़ियों में हम लोग सीतावनी मन्दिर की ओर रवाना हुए। करीब दस पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर निर्जन वन के बीच मे यह मन्दिर ए एस आई की निगरानी मे स्थित है। रास्ता कच्चा, और नितान्त जंगल व सूखी, जंगली नदियों से होते हुए जाता है। अकेले व्यक्ति के या पैदल व खुली गाड़ियों जैसे बाइक आदि से जाने पर , जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है।



पांच बजे के लगभग हमार जत्था धीरे -धीरे मंदिर के पास पंहुचने लगा। मंदिर यद्यपि ‌छोटा सा ही है किन्तु पौराणिक ‌मान्यताए बडी है
सबसे आखिर मे पंहुचने वाला समूह,महभिष, मुस्कान और चांदनी थे। महभिष तो काफी डरी हुई थी, मुझे देखते ही उन्होंने एक आक्रमण किया, कहने लगी, भई आपको अपने सहयोगी कनिष्ठ मुस्कान की चिंता नहीं थी, अब भला कौन समझाए कि मेले खेले मे बड़े बच्चों ‌का‌, कौन ऊंगली पकड़ ‌कर रखता है। खैर अपनी वरिष्ठता का मान रखते हुए माफी मांगने मे ही भलाई समझी। फिर वापसी मे तो तीनो को साथ गाड़ी मे बिठा लिया।
इस मन्दिर के बारे में हमें बताया गया कि यह त्रेता युगीन स्थल है,‌ यहीं पर सीतामाता ने अपने दोनो पुत्रो, लव व कुश को जन्म दिया है। मन्दिर मे सीता माता की,‌ दोनो पुत्रो को गोद बिठाकर, मूर्ति स्थापित की गई है। यहां की खास विशेषता, पानी की तीन धाराएं है, हमें बताया गया कि पहले यहां पर तीन के स्थान पर चार धाराए थी, जिन से, एक से दूध, गरम पानी, दो धाराओं से सामान्य‌ पानी निकलता था, कि कालान्तर मे भौगोलिक संरचनात्मक बदलाव व अन्य‌ कारणों से तीन ही धाराएं शेष है, ये सभी सामान्य‌ जल का उत्पादन करती है। इस निर्जन प्रदेश के इस मन्दिर मे एक नागा साधु धुनी जमाए बैठे मिले।
यही आस पास ही बाल्मीकि आश्रम भी बताया गया। लगभग एक‌ घंटे का समय बिताने के पश्चात हम सभी लोग पुनः अपने रिसोर्ट वापस‌ चले गए।
रात्रिकालीन पार्टी ‌का‌ दौर नौ बजे से प्रारम्भ हुआ। कुछ जाम छलकते रहे। कड़ाकेदार ठंड मे लड़कियों ने अल्प वस्त्रो की पोशाक पहन डाली।  शराब और नृत्य‌, दोनो ने ठंड‌ पर कडा प्रहार किया, फिर क्या था रात‌ की बारह बजे लोग भोजन की मेज तक पंहुच‌ सके। कुछ लोग ‌तो बिना खाए ही बादशाहत तक पंहुच गए। कुछ को तो अगले दिन भी अहसास नहीं हुआ कि उन्होने रात‌ को‌ खाना खाया या नहीं।
नृत्य‌करते सहकर्मी 

खैर, रात को ही तय‌ हुआ कि प्रातः छ बजे जंगल सफारी के‌ लिए जिम कार्बेट पार्क चला‌ जाय। रात‌ जिस‌ कमरे मे मै था वहां मेरे साथी थे सुधीर ‌जी और अनीश। बस एक‌ ओर से बजाज चेतक चल रहा था तो दूसरी ओर से हीरो होंडा। फिर ‌नीद‌ का‌ हुआ कबाड़ा। फिर क्या था, प्रातः ‌पांच‌ बजे ही नित्य कर्म से निवृत्त हो बाहर निकला तो आसमान बिलकुल साफ और ठंड का अहसास नही। रिसोर्ट ‌के अन्दर दो तीन काली बतखे दिखाई ‌दी, मेरी आहट पाकर चौकन्नी तो हुयी किन्तु डरी नही।

किन्तु सहयात्रियों मे सन्नाटा। कोई भी नही जागा। साढ़े ‌छ बजे के आस पास कुछ लोग जागे और फिर सभी ‌एकत्रित‌ होने शुरू हुए। और फिर ‌सभी‌ लोग‌ बस‌ मे बैठ कर काली ढूंगी वाले गेट की ओर रवाना हुए।  वहां पर हमारे साथ चलने वाले गाइड व गाडियां प्रतीक्षा मे थे। 
आवश्यक निर्देश।

पार्क का नक्शा।

समूह का कारवां 

यह लगभग 25किमी‌ का सफर है जहां लोग इस आशा से जाते है कि उन्हें वन्य जीवों ‌से आमने-सामने साक्षात्कार हो सके, किन्तु ऐसा कभी कभी ही होता है। मानवीय‌ गतिविधियों से  जीव भी सजग रह कर दूरी बना लेते है। एक जगह पर मुश्किल से हिरन व नील गाये दिखाई दी, शेष कुछ नही। किन्तु प्रातः कालीन वन भ्रमण अपने आप मे एक संस्मरणीय है। कोलाहल से दूर शान्त व निर्जन वन। जहां सिर्फ शेष स्मृतियां थी तो जिम कार्बेट की। एक‌ शिकारी अंग्रेज की। जिसने उत्तराखंड मे कई नरभक्षी बाघ और बाघिन ‌का‌ शिकार किया।
लगभग ग्यारह बजे प्रातः  समूह वापस रिसोर्ट आ पंहुचा। नाश्ता व अन्य कार्यों ‌से‌ निवृत‌ होकर पुनः वापस नौएडा के लिए चल पडे।
अब सब थके हुए थे, इसलिए ‌बस‌ मे कुछ नींद ‌की आगोश मे थे और कु‌छ मोबाइल के आगोश में। शाम को पांच बजे पुनः मोगा रिसोर्ट पर लंच के लिए रुके। तत्पश्चात यात्रा का अंतिम ‌पडाव प्रारम्भ होता है।
गाजियाबाद से सहयात्री उतरने लगे और अपने‌घरो‌को जाने लगे।  अंत मे श्री मधुसूदन जी का परिवार,जतिन, विजय खुराना जी के साथ मै, आखिरी पड़ाव सेक्टर 18, से रात्री नौ बजे अपने घरों को लौट गए।