शनिवार, 7 अगस्त 2010
तुम माँ हो ! !
माँ ब्रम्हांड है !
माँ पृथ्वी है!
माँ अनंत है, आकाश है !
माँ शील है, विराट है शक्ति है !
माँ एक शब्द नहीं!
माँ केवल नारी नहीं !
वह तो छांव है
वटवृक्ष है !
वह पत्नी है बेटी है
बहिन है !
दादी है या नानी है
वह तो माँ है !
माँ कि कोख में आने के लिए ,
उसे पूछना नहीं पड़ता !
वह तो धन्य मानती है सौभाग्य समझती है !
जन्म लेने वाला तो धन्य हो ही जाता है !
कि उसे माँ मिल जाती है !
आशीर्वचन ग्रहण करती है जीवन भर
सौभाग्यवती, संततिवती या चिरंजीवी!
वह व्रती है ! दृढ है और क्षमाशील है!
निश्छल है , निर्विकार है !
नि:शब्द है !
यह तो प्रकृति का वरदान है !
माँ को शिकायत नहीं ,
सभी को बराबर देती
आंचल में प्यार और दुलार !
तुम तो समुद्र हो !
शांत हो गहराइयों तक !
तुम जननी हो !
तुम वन्दनीय हो !
तुम अतुलनीय हो !
तुम नमनीय हो !
तुम नारी ही नहीं !
तुम एक शब्द नहीं !
तुम माँ हो ! !
( मैंने लगभग बीस साल बाद इस कविता कि रचना कि है. इसकी परिणिति घुगुती बासूती में "माँ" कविता है जिसने मुझे भी झक्जोर दिया है यह उनकी कविता कि प्रतिक्रिया कहें या एक नया जागरण. मुझे उनकी कविता में यह महसूस हुआ है एक नारी कही दमनीय, दयनीय , कमजोर है ऐसा उन्होंने माँ कविता में भाव दिया है किन्तु मैं माँ को दुनिया कि सबसे शक्तिशाली भाग्यशाली मानता हूँ )- गिरधारी खंकरियाल
शनिवार, 31 जुलाई 2010
chitthi aayi hai
हाँ अखबार में एक बात जो रोचक लिखी थी वह पहली चिट्ठी का इतिहास . अखबार के अनुसार चिट्ठी पहली बार इंग्लैंड में ३१ जुलाई कोई ही पोस्ट कि गयी थी किन्तु दुःख इस बात का है कि इंग्लैंड का इतिहास रखने वालों को अपने देश का इतिहास नहीं मालूम . कि पहली चिट्ठी इस देश कब पोस्ट हुई कहाँ पोस्ट हुई . इसका कुछ भी पता नहीं मालूम . इंलैंड में जन्मी चिट्ठी का जन्म दिवस मानाने के लिए हम पलक पांवड़े बिछा के बैठे हुए हैं .
इससे भी कोई अंतर नहीं आता है कम से कम चिट्ठी कि याद तो आई . शयद कई लोगों ने आज इस खबर पढने के बाद चिट्ठी लिखी भी हो . यह एक अच्छी खबर हो सकती है. कुल मिलाकर हमें चिठ्ठी लिखना जारी रखना चाहिए इसके पीछे बहुत से कारण हैं. जैसे हस्त लिखित से भावना के आदान प्रदान से गूढता बढती है संबधों में प्रगाढ़ता आती है , सुसुप्त पड़ा डाक विभाग के कर्चारियों के रोजगार बढ सकेगा . चिट्ठियों के प्रचालन बंद होने कारण डाक विभाग के पास काम की भारी कमी हो गयी है. और इसके चलते विभाग को अन्य कार्यों जैसे बैंकिंग , इंश्योरेंस में लगना पड़ा और अपने कर्मचारियों के लिए वेतन का जुगाड़ करना पड़ा .
आशा है सभी लोग इस दिशा में पुन: थोड़ी दिलचस्पी लेकर पुरानी यादों को साकार करने का कष्ट करेगे और फिर गाने लगें डाकिया डाक लाया , डाकिया डाक लाया !!!!!!.
बुधवार, 14 जुलाई 2010
shiksha aur bharat
उच्च शिक्षा तुच्छ धन पर बेच दी जाती नहीं .
ये शब्द हैं राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त की. भारत देश विश्व गुरु था . और अब विदेशी संस्थाएं भारत को पढ़ने के लिए तैयार बैठी हैं. कल यह विश्व गुरु विश्व शिष्य कहलायेगा . कण्वाश्रम, तक्षशिला, और नालंदा विश्वविदालय अब सिर्फ इतिहास बन कर भुला दिए जायेंगे. याद करने के लिए आक्सफोर्ड , कम्ब्रिज़ आदि युनिवार्सित्यां हमारे समक्ष पेश हो जायेंगे .
अब ऐसा तो होगा ही . जब प्राथमिक विदालयों में पढाई का स्तर नगण्य हो चूका है. ग्रामीण क्षेत्र में कक्षाओं में अध्यापक अपने घरेलु कार्यों में व्यस्त रहते हैं . और जब वे उपलब्ध होते हैं तब सरकारी कम इतना अधिक हो जाता है कि पढ़ना उनके लिए टेढ़ी खीर बन जाती है . आज कल भी ऐसा ही हो रहा है. भारत में जनगणना का कर चल रहा है स्कूल खु चुके हैं किन्तु गुरूजी लोग जनगणना के कार्य में व्यस्त हैं. और जो समाया बचता है उसमे भी अब चुनाव पहचान पत्र , एवं वोटर लिस्ट बनाने में बीत रहा है. तो गुरु लोग भी करें तो करें क्या ? इस तरह इनका पढ़ने का मुहूर्त ही नहीं निकल पता है. अब बच्चे भी क्या करें स्कूल जाकर इतिश्री कर आते हैं. किसी तरह साल बीत जाता है और बच्चों को अगली कक्षा में प्रोनत कर दिया जाता है.
विभिन्न राज्य सरकारें कन्या शिक्षा पर भी धन खर्च कर रही हैं फिर भी उत्साह जनक परिणाम नहीं देखने को मिलते हैं. यद्यपि विद्यालयों में संख्या तो बढ़ी है परन्तु गुणवता शुन्य स्तर पर चली गयी है. इसी कारण लोग पुलिस स्कूलों में महगी शिक्षा देने के लिए मजबूर हैं. और सरकारी हील हवाली के कारण ही शिक्षा का व्यवासयिकी करण हो चूका है. और इस परिपाटी आम आदमी इन स्कूलों पढ़ा भी नहीं सकता . क्योंकि इनके खर्चे अत्यधिक हैं. एवं धिकल परिक्रिया में बच्चे और साथ में माँ बाप का इंटरव्यू लिया जाता है . और फिर अनपढ़ माँ बाप के बच्चे पढने से बंचित रह जाते है. इन पब्लिक स्कूलों कि परिक्रिया मूल अधिकारों के विपरीत है.
आज केंद्र सरकार शिक्षा का नया अधिनियम घोप्षित कर चुकी है परन्तु इन खामियों को क्या इस अधिनियम के तहेत चाक चोबंद कर दिया गया है. सरकार तो नियम और कानून बनाती है किन्तु नौकरशाही इसका दुरुप्युओग कर व्यवस्था को चोपट कर देते है. हमरे देश कि नौकर शाही देश के लिए दीमक बन गयी है. इसे सुधरने कि आवश्यकता है.
शयद इन सब कारणों को देखते हुए उच्च शिक्षा के लिए सरकार ने विदेशी शिक्षा स्संस्थानों को देश में बुलाने इरादा बनाया हो .
प्रतिष्ठाओं कि इस देश में कमी नहीं रही, न है , किन्तु उपयोग नहीं हो पता है. विदेशो में जा कर हमारी प्रतिष्ठाएं अपना लोहा मनवा चुकी है.
इसलिए इसतरह कि व्यवस्था होनी चाहिए जिस में हर गरीब परिवार को आसानी से शिक्षा गुन्वातापरक मिल सके. अध्यापकों को सिर्फ शिक्षा के कार्यों में ही लगाना चाहिए . जनगणना मतगणना मतदान , आदि सरकारी सर्वे में प्रायमरी अध्यापकों को बिलकुल नहीं लगाना चाहिए . सबसे पहले प्रायमरी शिक्षा के स्तर को ही ठीक करना पड़ेगा. तभी उच्च शिक्षा कि बारी आती है.
सोमवार, 12 जुलाई 2010
band ka prakop
बंद के कारण कई शहरों में स्थिति ख़राब थी इसी खबरें सुनाई दी . मैं बचपन में भी कुछ लिखने का शौक रखता था तब भी में एक लेख लिख था कि ७२ घंटे का बंद देश को ७२ वर्ष पीछे धकेल देता है. यद्यपि यह लेख प्रकशित न हो सका. किन्तु मेरा मानना आज भी यही है. देश में बंद करने का कोई औचित्य नहीं है . शक्ति प्रदर्शन का कोई भी उचित औजार नहीं है.
आखिर बंद के बाद आपको क्या क्या मिला ? लाखो करोड़ों का कारोबार संगठित और असंगठित क्षेत्र से नुकसान हुआ . बकिंग क्षेत्र में भी समाशोधन रुकने कारण अरबों का व्यापार ठप्प रहा . हजारों कर्मचारियो काम पर न जा सके धिहादी मजदूर, त्ठेली वाले रेहड़ी वाले पान वाले आदि इस प्रकार के कई वर्ग जो रोज कुंवा खोदते हैं और रोज पानी पीते हैं का क्या बुरा हाल हुआ होगा . इसका आकलन करना बहुत कठिन है.
संभतः तेल की कीमतें इतनी भी न बढ़ी हो जितना की बंद ने नुसान कर दिया है. अब आप यह मत कहें कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. बंद एक दिन का एक बर्ष तक उसकी भरपाई नहीं हो पाती है. महगाई को रोकने के बजाय आग में घी डालने वाला काम हो गया है.
आतंक बाद के समय पंजाब में भी aye दिन उग्र्बादी संगठन कोई न कोई बंद करके रखते थे किन्तु मैं उस समय भी बंद के दिन कभी छुटि नहीं करता था .
यदि राजनितिक पार्टियों को महगाई रोकने के समिलित उपाय करने हों तो सिर्फ मंत्रियों को ही क्यों न बंधक बना लेते हैं . इससे त्वरित कार्यवाही होगी. किन्तु इसका एक और दुष्परिणाम भी होगा कि कल आतंकवादी लोग भी इस तरह का काम राजनितिक पार्टियों के द्वारा करवाने लगेंगे . इस लिए सबसे अच्छा तो संसद ही है यहाँ पर आप पूरी शक्ति दिखा कर सरकार को झुका सकते हैं. प्रजातान्त्रिक तरीके ही इन बातों में कारगर सिद्ध होते है.
हड़ताल या बंद ( असहयोग आन्दोलन) इसकी उत्पति महात्मा गाँधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ कि थी. आज यही अपना स्वरुप बदल चूका है. पार्टियाँ अपना हित देख कर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं.
अंत में मैं तो इतना कहना चौंग कि देश को नुक्सान नहीं उसकी तरक्की में साथ देना चाहिए . बंद जैसा हथियार हर प्रकार से अवनति का रास्ता तैयार करता है .
सोमवार, 7 जून 2010
लेखक की संवेदन शीलता
मैंने अभी किसी ब्लॉग में एक महिला द्वारा लिखा हुआ लेख पढ़ा । इस लेख में लेखिका महोदया ने किसी टिपण्णी कार की टिपण्णी से रुष्ट होकर लिख डाला। कारणसिर्फ इतना था कि टिपण्णी कार नें उन्हें कलम की दिशा बदलने की सलाह दे डाली । क्यूंकि महिला लेखिका महिलोओं से सम्बंधित लिखती हैं। यों तो मैंने न तो टिपण्णी पढ़ी और न ही लेखिका का वह लेख जिस पर अमुक टिप्पणी आई ।
लेखिका महोदया नें इस बात पर एक लम्बा चौड़ा नया लेख लिह दिया है। इसमें उन्होंने महिलाओं के वस्त्र पहनने और न पहनने के कई उद्धरण दे डाले । यद्यपि उनकी ये सब बातें तथ्य परक हैं । किन्तु जितने भी उदहारण दिए गए है सभी १०० से लेकर १००० वर्ष पुराणी बातें हैं।
संसार परिवर्तन शील है और समय के साथ सभी धर्मं, जाती, देश , एवं संस्कृतियों नें परिवर्तन को अपनाया और मानव विकास इसी क्रम विकसित हुआ । पुरुष क्या पहनता ,क्या खाता, क्या पसंद करता है यह विचारिन्य नहीं है किन्तु एक महिला क्या करती है क्या पहेनती है के पसंद करती है तो एह क्यों विचारनीय है। इसलिए की एक महिला इन सवालों को उठा रही है। नहीं!
आज के सन्दर्भ में वे सभी तर्क लगभग तार्किक नहीं है की कोई महिला किसी क्षेत्र में बिना ब्लाउज, या बिना पेटीकोट पहने रहती हैं या रहनाचाहती हैं इसी कल्पना करना आज अपने को १००० साल पीछे धकेलना है। महोदया ये भूल गयी हैं कीइस देश में महिलाओं को सबसे अधिक सम्मान भी दिया जाता है । विश्व में एसा कही नहीं मिलता है । यहाँ नारियो की पूजा भी की जाती है आज ही नहीं सदियों से । तभी अर्ध नगन जीवन यापन कर भी नारियां सुरशित रही हैं । अब अगर आप इस युग में भी अर्ध नग्न या निर्वस्त्र रहना चाहें तो आपकी मर्जी । वैसे क्या आप किसी शादी मेंआज के युग में अर्धनग्न , बिना ब्लाउज, या बिना पेटीकोट पहने जा सकती है? नहीं । तो फिर किसी पाठक पर गुस्सा उतरना कहाँ तक जायज है।
मैं अब ये कहना चाहूँगा की एक लेखक के लिए उसके पाठक gan devtulya हैं।
aur apne pathkon ke prati is tarah ka gussa nikalna uchit nahin hai । लेखक वेहद संवेदन शील होता है टिप्पणी छोटी हो या बड़ी सलाह अछि हो या बुरी कित्नु अभद्र नहीं होनी चाहिए । अभद्रता कहीं भी कभी भी सराहनीय नहीं है । लेखक को अपने पाठकों के विचारों को उचित स्थान तो देना ही पड़ेगा न की गुस्सा हो कर एक नया लेख लिख डालो । tark apne sthaan par hote hain kintu unka kutark na banayen. sirf purush aur mahila ki ladaai ek naya sigufa banane se bachen .
शनिवार, 29 मई 2010
साहित्य की नयी विधा -ब्लोग्स
यह करिश्मा कर दिखाया ब्लोग्स ने । ब्लोग्स अपने आप में एक साहित्य की विधा बन कर सामने आया । जब हम पड़ते थे तो हमें छापाखाना से लेकर प्रकाशन तक का इतिहास पढाया जाता रहा । विधाओं में नाटक, कविता, लेख आदि विधाए पढाई जाती रही हैं । शायद बहुत कम ने ऐसा सोचा होगा की कंप्यूटर भी प्रकाशान का काम करेगा ।
मुझे तो बिलकुल भी अभी तक मालूम नहीं था की ब्लोग्स पर इतना बड़ा भारी साहित्य लिखा जा रहा है । मैनें अखबार में ब्लोग्वार्ता पर कमेंट्री रविश जी द्वारा पढ़ी तब मेरी भी जिज्ञाषा ब्लोग्स बनाने को हुई । इसके पश्चात मैं भी ब्लॉग जैसे साहित्य के अन्दर झाँकने लगा । और दिखाई देता है एक विशाल साहित्य कोष । शब्द कर्मियों की विशाल संख्या देख कर मैं अचंभित रह गया । साहित्य के लिए हिंदी पत्रिका हिन्दीयुग्म में उत्कृष्ट लिखा जाने वाला साहित्य दिखाई दिया । ब्लॉग वाणी पर असंख्य लेखकों की भीड़ । मेरा दिल भी उमड़ने लगा ।
प्रोद्य्गिकी ने आज हमारे लिए विशाल द्वार खोल दिए है । इसीके बल पर इतने लोंग, शायद अख़बारों, पत्रिकाओं , या प्रकशन घरों से प्रकाशित न हो सकते, आज अपनी प्रतिभाओं का प्रकाशन कर रहे हैं। कई ब्लॉगर तो उत्कृष्टता से शब्द रचना कर रहे हैं।
सूचनाये एक के बाद एक आने लगी और पठन सामग्री में होने वाला खर्च भी लगभग समाप्त हो गया , जो व्यक्ति प्रकशन और पठन खर्च वहन न कर पाने के कारन लिख नहीं पा रहे थे उनके लिए अपनी अभिव्यक्ति का अच्छा माध्यम बन गया है।
मैं स्वयम, लिखने का बड़ा शौक रखता था किन्तु इन्ही कारणों से सब कुछ बीच में ही छूट गया था , किन्तु अब मुझे एसा लगता है की मैं भी अपने लिखने के शौक को शायद पूरा कर सकूंगा । एक अच्छा प्लेट फॉर्म मिल गया है।
मैं भविष्य में इसके विस्तार और नयी तकनीकों की समभावना की आशा करता हूँ ।
बुधवार, 26 मई 2010
शनिवार, 15 मई 2010
मैं दिल्ली में राम मनोहर अस्पताल के पास था मेरे पहुचनें में समय लगता । मैंने उन्हें डॉक्टर लाने कि सलाह दी । मेरा मन किसी भयानक अनहोनी के लिए काँप उठा । नास्ते को छोड़ कर जाने लगा । तो मेरे साथ मेरे साडू भी साथ हो लिया । इस बीच हम मेट्रो ट्रेन में ही थे कि फ़ोन आया हम इन्हें इ एस आई हॉस्पिटल ले जा रहे हैं, आप वहीँ आयें । हम दोनों इ एस आई हॉस्पिटल जैसे ही पहुंचे तो परों के नीचे से जमीन खिसक गयी। डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था । उनके साथ आये हुए लोगों ने मेरी बहन को किसी तरह घर भेज दिया था । डॉक्टर कुछ भी लिख कर देने को तैयार नहीं था , किसी तरह डॉक्टर से मृतक के लिए एक सर्टिफिकेट तैयार करवाया ताकि म्रत्यु प्रमाण पत्र में परेशानी न हो।
फ़ोन से अन्य रिश्तेदारों को सूचित किया सभी लोगों के आ जाने पर अंतिम यात्रा का आखिरी पड़ाव का बंदोवस्त किया । पंचतत्व में विलीन हो जाने के बाद , अगले दिन से लोगों का घर पर यों आना जाना हो गया दो दिन छुट्टी पर रहा किन्तु उबर नहीं पाए। मेरे बड़े भाई साहब भी आ चुके थे । मैंने कार्यकर्म का जिम्मा उन्हे सौंप दिया और मैं ऑफिस ड्यूटी पर चला आया सिर्फ इसलिए की मैं वहां पर बिलकुल भी मानसिक रूप से परेशान सा था ।
उथल पुथल के बीच हमने वह सब किया जो करना होता है पूरा कर्मकांड भी । और तेरहवीं भी ।
उन्हें क्या हुआ था , जो व्यक्ति ५ बजे सुबह उठकर फिर दुबारा सो गया और ऐसा सोया की फिर कभी न उठ सका। अपने पीछे एक बेटा और दो बेटियों को छोड़ कर जिनकी अभी न तो पढाई पूरी हुई न ही किसी को जॉब , अलविदा हो गया . मैं अब इसी मानसिक द्वन्द में रहा की क्या मुष्य की जिन्दगी इतनी ही है.
कभी भी कुछ भी हो सकता है . अलबता वे एल आई सी के एजेंट थे संभवत कुछ पालिसी हो सकती है जो सायद पीछे परिवार के काम अ सकता है । इस सब में एक अछि बात एह रही की उनकी कंपनी ने उनके बेटे को उनके स्थान पर जॉब देने की घोषणा की । क्योंकि सभी लोग उनके व्यवहार से प्रभवित थे । अत: उनकी श्रधान्जली सची साबित हो सकती है।
मेरी बहिन के जीवन में एक सूना पण आ गया । हमनी जबरदस्ती हंस कर उनको बालने की कोशिश भी की । किन्तु जब हम ही इतने दुखी हैं तो उसके मन मस्तिष्क पर क्या बीत रही होगी । मुझे बहुत आघात लगा । मैं किसी तरह से अपनी बहिन की जिंदगी के सूने पण के लिए कुछ कर सकूं एय्ही मेरा प्रयास होगा और एही मेरी श्रधांजलि hogi
बुधवार, 5 मई 2010
सैर सपाटे और प्रकृति का साथ
इससे भी अच्छा तो छोटे गाँव की तरफ जाया जाये । यद्यपि ये सुदूरवर्ती होंगे किन्तु रमणीक भी। एक नया एहसास भी होगा । वंहा पर सुकून भरी जिंदगी देखने को मिलेगी। यह जरूर है की वहां जाकर आप कुछ भी गड़बड़ न करिएँ । जैसे की महिलाओं को छेड़ना, मार पिटाई करना आदि । यदि ऐसा हुआ तो शांति प्रिय लोग उतने ही कठोर भी होते हैं । ये लोग जब आपसेघुलमिल जाये तो तब आपको एक नै जिन्दगी का अनुभव होगा।
आपको वहां न तो होटलों की भरमार मिलेगी किन्तु रहने के लिएएक अछि मेहमान नाबाजी भी मिलेगी। जो शायद आपको बड़े बड़े होटों में भी नहीं मिलेगी।
आजकल जंगलों में काफल ( फल का नाम) पके होंगे । आप जंगल की सैर करें और इसका स्वाद लें । यह पाचनके साथ स्वाद में भी उत्तम है । छोटी नदियाँ हैं आप उनमें जाकर के नहाइए , प्रकृति का लुत्फ़ जी भर के उठाइए । हाँ यहाँ कुछ परेशानियाँ भी मिलेंगी, जैसे परिवहन की। आरामदायक होटल की। किन्तु प्रकृति आपको जितना देगी वह कभी नहीं मिलेगा।
इसलिए छोटे सुदूरवर्ती गाँव में जाएँ और अपनी जिंदगी को खुशनुमा बनायें । खर्च भी कम और पाए अधिक ।
बुधवार, 21 अप्रैल 2010
समलैंगिकों का अधिकार- प्रकृति के खिलाफ
पूरे ब्रह्माण्ड में प्रकृति की सत्ता सबसे सम्पूर्ण और ताकतवर है। मनुष्य हमेशा से इसका दोहन एवेम शोषण करने पर लगा हुआ है । व्यक्ति अपनी सत्ता को उंच उठाने की कोशिश के चलते दुनिया को विनाश के कगार पर ले जा रहा है । व्यज्ञानिक युग की धरा ने तो मनुष्य एवेम प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर दिया है ।
जब जब प्रकृति के खिलाफ मनुष्य ने आन्दोलन चलाये है तब तब नुक्सान उठाना पड़ा है । प्रकृति के विपरीत जाकर उसके स्वरुप को बदलना महँगा पड़ता है।
आज ग्लेशियरों का पिघलना जलवायु का बदलना आदि सभी मनुष्य की दें है ।
अभी देखें तो सेक्स पर बी दुनिया के लोग अप्राकृतिक अधिकार की मांग ही नहीं बल्कि उसके कानूनी मान्यता भी मान रहे हैं। सम्लागिको को दुनियाभर में ये बहस चिद गयी है की इन्हें भी उसी तरह शादियाँ करने का अधिकार दिया जाना चाहिए । किन्तु अभी तक भारत जैसे देश में बिना किसी मान्यता के भी समलैंगिक अपना काम करते रहे हैं और अभी तक किसी को एस कार्य के इए सजा भी नहीं हुई है। तो फी कानूनइ मान्यता की क्या आवशयकता है?
जो भी समलैंगिक बना, वह जनम से नै था , उसने या तो निराशा जनक स्थिति में यह काम शुरू किया, या मौज मस्ती के लिए! जन्मजात कोई भी समलैंगिक नहीं होता है । तत्पश्चात उसे यही दुनिया मजबूरी में अछि लगाने लगती है। यह भी अप्राकृतिक काम है । और विनाश की ही और ले जाता है ।
इसकी परिणति तो आइसलैंड में ज्वालामुखी फुटकर होती है। या गंगा का पानी पत्थरो के नीचे जा रहा है।
यह तो एक छोट उदाहरण है विनाश की गाथा लम्बी है। प्रकृति के विपरीत चलने का भुगतान कारन ही पड़ता है।
मैं बात कर रहा हों समलैंगिको की । उन्हें क़ानूनी रूप में अयाशी का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।