शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

प्रकाश पर्व दीपावली

आज दीपावली है  मैंने  आज सवेरे हिंदी के प्रख्यात लेखक  श्री लीलाधर जुगुड़ी का हिंदुस्तान में एक लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने श्री राम द्वारा अमावश्य को घर लोटने पर कुछ रौशनी डाली है वे कहते हैं कि जब अँधेरा होता है तो लोग प्रकाश की खोज करते है . अँधेरा यदि प्रज्वलित होता है तो प्रकाश जगमग करने लगता है वास्तव में उन्होंने बहुत ही दार्शनिक एवं वैज्ञानिक  ढंग से दीपावली के त्यौहार  पर सुन्दर मार्मिक वर्णन  किया है राम ने वन से लौटने पर अँधेरे का चुनाव किया  कि अँधेरे में उनके प्रकाश से वे अपनी प्रजा को भली भांति देख सकेंगे अथवा प्रजा उनको श्री राम की कांति में अच्छी तरह पहचान सकेंगे । अँधेरा उजाले से प्राचीन है  और प्रकाश अँधेरे कि आवश्यकता बन गयी है ।
आज जब मै बाजार  में था तो लगभग ४-५ बजे का समय था कुछ  सामान खरीदना  था,  एक दुकान से दूसरी  देखते हुए काफी समय व्यतीत हो गया  दुकानों में रौशनी जगमगा रही थी रात का एहसास  सा हो रहा था,  जब बाजार से निवृत  हुए और बाहर सड़क पर पहुंचे  तो सड़क सुनसान सी नजर आई । मुझे कुछ पल के लिए ऐसा भ्रम बना कि लगभग रात कि ९ बज चुके है  मेरे मुह  से अनायास ही निकल पड़ा कि हमें बस नहीं मिलेगी क्योंकि आज दीपावली  है  सभी बसे अपने गंतब्य तक पँहुच कर छुट्टी कर चुके होंगे  किन्तु ऐसा था नहीं चूँकि सडको पर ट्रैफिक कम हो चूका था और दीवाली मानाने  की सभी को जल्दी थी तो लोग घरों को लौट रहे  थे,  इतने में  बस आ गयी,  हम बस में चढ़ गए पुनः  जब बस से उतरे तो  तब मैंने समय देखा तो अभी ६.५० बज रहे थे। तो मुझे यकायक सबेरे   ही माननीय जुगुड़ी  जी का लेख का ध्यान आ गया
मेरे अपने घर में दीपावली का पर्व इस वर्ष वर्जित है क्योंकि  अभी हमारे एक जेष्ठ भ्राता  का २८ सितम्बर को देहावसान हुआ मेरी  बड़ी दीदी  यही रहती है उनके घर चले आये  तब आकाश में अधेरा अपना साम्राज्य कायम कर चुका था,  और पूरा भारत दीप जला कर , बिजली की लडियां लगा कर , पटाखों  से आतिश बाजी से आकाश जगमग होने लगा था, जैसे सभी अँधेरे को तोड़ कर प्रकाश का  साम्राज्य कायम कर रहे हों ।
.बस यही था उनके लेख का  भी सारांश। सभी लोग मानो बुराईयाँ  छोड़ कर एक सुगम, सुंदर और प्रकाशित  मार्ग पर गमन करना चाहते हों, सभी बच्चे और बड़े प्रसन्न है। खुशिया  ही खुशिया चारो ओर दिखाए दे रही थी।


अंत में आप सभी को दीपावली प्रकाश  पर्व की  शुभ कामनाएं .   

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

kashmir aur arundhati roy

बुकर पुरूस्कार  से समान्नित  लेखिका अरुंधती रॉय अचानक समाचारों की सुर्खियाँ बन गयी हैं. अभी कुछ ही दिन पूर्व  सैद गिलानी के साथ  उन्होंने  कश्मीर मुद्दे पर एक कटु सत्य को पुरजोर तरीके से कह दिया . सच तो वही जो उन्होंने कहा  किन्तु कहने के तरीके से थोडा चूक गयी  और यही अब उनके लिए गले की phaans  बन गयी . उन्होंने कहा था " कश्मीर का विलय भारत में कभी नहीं हुआ " इस बयां ने tool  पकड लिया और  राजनितिक दलों ने उनके  राष्ट्रविरोधी होने का फतुआ jaari  कर दिया  और गिरफ्तार करने की मांग करने लगे.
अब प्रश्न उठता  है कि रॉय ने सार्वजानिक मंच से एक संवेदन शील मुद्दे पर गिलानी जैसे अलगाववादी के साथ क्यों  कही ?  क्या अरुंधती जी इसकी संवेदन शीलता से  परिचित नहीं थी  या  उन्हें सुखियाँ बटोरनी थी ?  क्या यह एक कटु सत्य  है जो उन्होंने कहा / यदि ऐसा है तो फिर राजनितिक दल क्यों परेशान है. अथवा  श्रीमती रॉय ने जानबूझ कर ऐसा बयां दिया .
अब बात आती है अभिव्यक्ति कि स्वंत्रता की. आप के कहने मात्र से किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा  तो नहीं पड़ती है यदि खlal  पदता है तो इसे स्वतंत्रत का हनन  कहा जायेगा  शायद संवेदन शील mudde  पर बोल कर उन्होंने ऐसा ही किया है.  कितु उन्होंने तो सिर्फ सच कह दिया है  तो उस पर इतना  बवाल कि उन्हें जेल  भेजने की तैयारी गृहमंत्रालय  कर रहा है.  परन्तु आज तक जिन्होंने हम्मारी संसद पर हमला किया , कई पुलिस , सेना  के जवानों को maar  गिराया , निर्दोषों की हत्या कर दी  , कनिष्क विमान को समुद्र में मार गिराया, उन्हें तो अभी तक सजा भी नहीं हुई  और वे लगातार aisi  हरकते करते जा रहे हैं. उन्हें देश द्रोह  के बजाय मुख्यधारा का अंग बनाने के प्रयास किये जाते रहे हैं.  तो  रॉय ने कौन सा पहाड़ इस देश में तोड़ डाला है.  अभी इससे पहले कश्मीर की विधान सभा में तो यही बयान umar  अब्दुल्लाह ने भी  दिया  जबकि वह तो राजनितिक प्रदेश का मुखिया है  तो unhe  क्यों नहीं देश द्रोही कहा गया .
 यदि कश्मीर  विवादस्पद  राज्य नहीं है तो फिर बार बार सरकार को  इसे  " भारत का अभिन्न अंग" क्यों कहा जाता है  ऐसा अन्य प्रदेशों के मामले में नहीं होता है.   तो क्या  अब रॉय के बयान के बाद बर्ताकारों का विषय भी बदल जायेगा  और इस मुद्दे के  वास्तव में हल करने के गंभीर प्रयास किये जायंगे ?  या रॉय को जेल में daal  दिया जायेगा और मुद्दे को फिर से दबा दिया  jayega  .?  या फिर कश्मीर हमेशा की तरह सुलगता रहेगा ?   ये बहुत सरे प्रश्न खड़े है जिनका उत्तर अब कश्मीर की जनता और भारत सरकार  निकालने होंगे .
  apne  vichaar bhi rakhe  ek mahaan lekhak ko kaisi saja milni chahiye

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

गंगे कुछ पल रुको !

गंगे कुछ पल रुको !
आक्रोश को रोको
क्रोध को थामो
पीड़ा का क्रंदन , स्पंदन ,
व्यथा ,निश्वास , आह  और कराह
समेट लो सिसकियों  में
गंगे कुछ पल रुको !
तुम्हारे क्रोध से, आक्रोश से
मैती आकुलित हैं
व्यथित, व्याकुल , निस्तब्ध हैं
प्रलयंकारी गर्जन से
माँ कैलाशी प्रार्थना बद्ध  है
बद्री केदार भी नत मस्तक हैं
हिम गिरी  भी व्याकुल है
पुकार रहे हैं
गंगे कुछ पल रुको !
 सदियों से दे रही हो शीतल निर्मल अमृतमयी जल
पाप कष्टों का कर रही हो हरण - प्रबल !
निर्विकार निर्निमेष धरा का पग पग करती हो प्रक्षालन !
तो तुम्हे क्या दे रहे हैं ये मानव जन
मैला ! विष प्रदूषण  !
और  विषमयी बना अमृतमयी जल !
तो यह गर्जन , आक्रोश क्यों न हो !
दमनीय हो चुकी है हिम्पुत्री
कुछ पुत्रियाँ तो सहती हैं 
कुछ प्राण निछावर करती हैं
कितु कुछ  सीमा तोड़ आक्रोशित , क्रोधित  होती है
जीवन सबका है जीवन के लिए !
तुम भी तो आक्रोश में हो
क्रोध में हो
प्रलयंकारी  विनाशकारी रूप लिए हो
सब डरे हुए  है  भयभीत हैं !
गंगे कुछ पल रुको
आक्रोश सहज है
कितु मैती पुकार रहे हैं
नतमस्तक है,
शांत और मौन की प्रार्थना कर रहे है
और पूछ रहे हैं,
ऐसा प्रलय क्यों
ऐसा हाहाकार क्यों
थोडा शांत
थोडा मौन
गंगे कुछ पल रुको !



( वर्ष २०१० अतिवृष्टि के रूप में जाना जायेगा उत्तराखंड में अति वृष्टि ने प्रलय  की स्थिति पैदा कर दी है  यह भी मानव निर्मित विपतियाँ है  गंगा और यमुना  अपने उफान पर है न जाने कितना उबाल आयेगा इन जीवन दायिनी  नदियों में . बाढ़ का प्रकोप ने सभी को भयभीत कर दिया है )
गिरधारी खंकरियाल    

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

हिंदी दिवस और राज भाषा

आज हिंदी दिवस है  सभी हिंदी लेखकों, लेखिकाओं  एवं ब्लोगरों  को हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं . हिंदी ने विज्ञापनों और फिल्मों के माध्यम से  आज संपर्क भाषा बनने में कामयाबी हासिल  की है . किन्तु बावजूद इसके  यह पूर्णतया ग्राह्य भाषा नहीं बन सकी. फिल्मों में ही देखिये  बहुत सारे  अभिनेता , अभिनेत्रियाँ  हैं जिन्हें हिंदी के नाम से ही परहेज है . जबकि वे सभी हिंदी के ही बलबूते अपना परचम लहरा  रही हैं . उन्हें संवाद रोमन अंग्रेजी में लिख दिया जाता है और फिर वे इसे धारा प्रवाह से बोल दिया कर देते है.  कमोवेश यही स्थिति  विज्ञापनों की भी है  क्योंकि यंहां भी काम करने वाले लोग  इसी श्रेणी के होते हैं.
इतना ही नहीं संविधान में  राजभाषा  का दर्जा प्राप्त भाषा सरकारी कामकाज की भाषा आज तक नहीं बन पाई .यह एक मात्र उत्तर भारत की भाषा बन कर रह गयी है . केंद्रीय सरकारी कार्यालयों में सारा काम अंग्रेजी में होता आ रहा है .  सरकारी अधिकारी और मंत्रिगन तो अंग्रेजी से ही अपना स्तर ऊँचा बनाने पर लगे है  हिंदी बोलने और सुनने वाले की कोई कीमत यहाँ नहीं है. राज्यों ने तो अपने अपने स्थानीय भाषा को राजकीय कार्यों के लिए  प्रयोग किया है  सिर्फ उत्तर भारत के कुछ हिंदी भाषी  राज्य ही सरकारी काम हिंदी में करते हैं
हमारी संसद तक में लगभग सभी चर्चाये  एवें अन्य विधिक  कार्य अंग्रेजी में होते है अधिकांश सदस्य  अंग्रेजी में बोलना पसंद करते हैं. दक्षिण एवं पूर्वोत्तर के सांसद तो हिंदी से गुरेज ही करते हैं  इतना ही नहीं हमारे उत्तर भारतीय प्रधान मंत्री तक हिंदी बोलने से परहेज करते हैं.सभी विधायी  दस्तावेज अंग्रेजी में तैयार  होते हैं  कब समाप्त होगी  ये अंग्रेजी  की गुलामी ?  अधिकारी अग्रेजी बोलते हैं अंग्रेजी लिखते हैं हिंदी में बतियाना उनके कद को नीचे कर देता है .
हाँ श्रीमती सोनिया  गाँधी की दाद देनी पड़ेगी विदेशी महिला होकर भी राजनीति की पारी शुरू करते हुए रोमन हिंदी लिख कर पढना प्रारंभ किया था किन्तु यह महिला आज धारा प्रवाह  हिंदी बोलने लगी है  लगभग सभी भाषणों में चाहे संसद के अन्दर हों या बाहरउन्होंने हिंदी का प्रयोग किया है . हमारे सांसदों को इससे शिक्षा  ग्रहण करनी चाहिए विशेष कर दक्षिण भारतीयों को . जब एक विदेशी व्यक्ति हिंदी बोले सकता है तो अन्य क्यों नहीं .
हमारे देश की माननीय अदालतें भी हिंदी  से गुरेज ही करती हैं . अभी एक दो दिन पूर्व एक अखबार की खबर थी कि माननीय न्यामूर्ति ने किसी याचिका करता को शालीनता का पाठ पढ़ने के लिए  फटकार लगाई क्योंकि वह  व्यक्ति बार बार जबाव "या  या " यानि एस  एस  चलताऊ अंग्रेजी  में दे रहा था . उसे बताया गया कि अदालत में या या के बजाय  मी लोर्ड शिप , माय लोर्ड शिप आदि  सम्मान जनक शब्दों का प्रयोग सिखाया  गया  यह भी बताया गया कि कौन सा शब्द कब और कैसे प्रयोग किया जाता है  हैरानी  कि बात है हमारी आजाद अदालते अंग्रेजी के आगे नतमस्तक हैं . क्या हिंदी में इतने सम्मान  जनक शब्दों का आभाव है की उनसे अदालत की शालीनता में खलल पड़ता हो . क्यों  नहीं माननीय, परम आदरणीय , पञ्च परमेश्वर, न्याय पिता आदि अलंकरण  क्या कम हैं अदालत की शालीनता को बरकरार रखने के लिए !.
हिंदी के लेखक वर्ग से अनुरोध है हिंदी को इतनी रोचक बनायें की दूर देश से भी लोग इसे पढने और सीखने के लिए स्वयम लालायित हो उठे . इसे सिर्फ संवैधानिक  राजभाषा  ही नहीं,  संपर्क और कार्य की राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा  के साथ साथ विश्व भाषा बनाना  होगा   अंग्रेजी के किले में सेंध तो लगानी ही होगी

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

जीवन पूर्ति का मर्म



Please read complete mail.
रोजानजो खाना खाते हो वो पसंद नहीं आता ? उकता गये
............ ... ........... .....थोड़ा पिज्जा कैसा रहेगा ? 
www.kute-group.blogspot.com
नहीं ??? ओके ......... पास्ता ?
नहीं ?? .. इसके बारे में क्या सोचते हैं ?
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आज ये खाने का भी मन नहीं ? ... ओके .. क्या इस मेक्सिकन खाने को आजमायें ? 
www.kute-group.blogspot.com
दुबारा नहीं ? कोई समस्या नहीं .... हमारे पास कुछ और भी विकल्प हैं........     
ह्म्म्मम्म्म्म ... चाइनीज ????? ?? 
www.kute-group.blogspot.com
बर्गर्सस्स्स्सस्स्स्स ? ??????? 
www.kute-group.blogspot.com
ओके .. हमें भारतीय खाना देखना चाहिए ....... J   दक्षिण भारतीय व्यंजन ना ??? उत्तर भारतीय ? 
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जंक फ़ूड का मन है ? 
www.kute-group.blogspot.com

हमारे  पास अनगिनत विकल्प हैं ..... ..   टिफिन  ? 
www.kute-group..blogspot.com
मांसाहार  ? 
www.kute-group.blogspot.com
ज्यादा मात्रा ? 
www.kute-group.blogspot.com
या केवल पके हुए मुर्गे के कुछ  टुकड़े ?
आप इनमें से कुछ भी ले सकते हैं ... या इन सब में से थोड़ा- थोड़ा  ले सकते हैं  ...

अब शेष  बची मेल के लिए  परेशान मत होओ....
 

मगर .. इन लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है ...
 
www.kute-group.blogspot.comwww.kute-group.blogspot.comwww.kute-group.blogspot..com   www.kute-group..blogspot.com
इन्हें तो बस थोड़ा सा खाना चाहिए ताकि ये जिन्दा रह सकें .......... 


इनके बारे में  अगली बार तब सोचना जब आप किसी केफेटेरिया या होटल में यह कह कर खाना फैंक रहे होंगे कि यह स्वाद नहीं है !! 
www.kute-group.blogspot.com
 

इनके बारे में अगली बार सोचना जब आप यह कह रहे हों  ... यहाँ की रोटी इतनी सख्त है कि खायी ही नहीं जाती.........
www.kute-group.blogspot.com
कृपया खाने के अपव्यय को रोकिये  
अगर आगे से कभी आपके घर में पार्टी / समारोह हो और खाना बच जाये या बेकार जा रहा हो तो बिना झिझके आप  1098 (केवल भारत में )पर फ़ोन करें  - यह एक मजाक नहीं है - यह चाइल्ड हेल्पलाइन है । वे आयेंगे और भोजन एकत्रित करके ले जायेंगे।
कृप्या इस सन्देश को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित करें इससे उन बच्चों का पेट भर सकता है 

कृप्या इस श्रृंखला को तोड़े नहीं ..... 
हम चुटकुले और स्पाम मेल अपने दोस्तों और अपने नेटवर्क में करते हैं ,क्यों नहीं इस बार इस अच्छे सन्देश को आगे से आगे मेल करें ताकि हम भारत को रहने के लिए दुनिया की सबसे अच्छी जगह बनाने में सहयोग कर सकें -   
'
मदद करने वाले हाथ प्रार्थना करने वाले होंठो से अच्छे होते हैं ' - हमें अपना मददगार हाथ देंवे 
 
भगवान की तसवीरें फॉरवर्ड करने से किसी को गुड लक मिला या नहीं मालूम नहीं पर एक मेल अगर भूखे बच्चे तक खाना फॉरवर्ड कर सके  तो यह ज्यादा बेहतर है. कृपया क्रम जारी रखें....  


--
Thanks & Regards,
surjeet
(¨`·.·´¨)
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep
(¨`·.·´¨)¸.·´ Smiling!!!
`·.¸.·

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अगर आगे से कभी आपके घर में पार्टी / समारोह हो और खाना बच जाये या बेकार जा रहा हो तो बिना झिझके आप  1098 (केवल भारत में )पर फ़ोन करें  - यह एक मजाक नहीं है - यह चाइल्ड हेल्पलाइन है । वे आयेंगे और भोजन एकत्रित करके ले जायेंगे।
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कृप्या इस श्रृंखला को तोड़े नहीं ..... 
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--
Thanks & Regards,
surjeet
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`·.¸(¨`·.·´¨) Keep
(¨`·.·´¨)¸.·´ Smiling!!!
`·.¸.·    मुझे यह मेल से मेरे मित्र द्वारा प्रेषित किया गया  जरा सोचिये और इस दिश में भी कदम उठायें  ताकि ब्लॉगर जगत के लोग भी इन गरीब, निरीह लोगो तक अपना योग दान कर सकें . कितनी बिडम्बना है की कहीं तो आपके पास बहुत से विकल्प हैं भोजन  के लिए वहीँ दूसरी तरफ एक ऐसी दुनिया भी है जिन्हे दो जून की रोटी भी नसीब  नहीं है.वहीँ हमारी सरकार १ करोड़ टन अन्नाज गोदामों और मंडियों में सडा देती है या फिर विदेशों में पशुओं के चारे के लिए बेच देती है. पर इन निर्हों को नहीं बाँटती  है सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ा कितु तब भी ये भूखे ही हैं . बिडम्बना की जय हो!  

सोमवार, 30 अगस्त 2010

घरेलू हिंसा

कल यानि २९.८.२०१० रविवार का दिन था  रविवार को मेरी छुटि हुआ करती है दिनभर से अपने कार्य कलापों को निपटाने के बाद मैं और मेरा एक दोस्त टेलीविज़न  का दीदार करने लगे . लगभग ४ बजे का समय था  अचानक मेरे सामने  के घर से जोर जोर से आवाजे आने लगी . मैंने चाय बनाने के लिए रखीथी, जब तक उनकीचीख  पुकारें और मार पिटाई कि आवाजे बाहर तक  पहुच गयी . एक व्यक्ति अपनी पत्नी को दे दनादन मार रहा था साथ में छोटे बच्चों को भी पीट रहा था .
जब हम लोग बाहर आये तो उस व्यक्ति कि हैवानियत चरम पर  थी वह कभी डंडे  तो कभी ईंट पत्थर मार रहा था . पड़ोस के लोग तमासा देख रहे थे  किसी कीया तो हिम्मत नहीं हो रही थी या कोई बीच में नहीं पड़ना चाहता था जो भी हो नज़ारा खतरनाक  था  उसका शरीर  भी तो  भीमकाय था  और उपर से पूरी तरह से शराब के नशे में चूर था . परन्तु किसी तरह बाहर आकार मैंने उसे रोकने कि कोशिश की तब जाकर कुछ बचाव हो सका.
हुआ यों था सबेरे सबेर उसने किसी जानने वाली महिला को जिसके साथ दो छोटे बच्चे  थे को पड़ोस के मकान में किराये पर कमरा दिलाया था , महिला अकेली रहती है  उसके पश्चात्  उसकी पत्नी सुबह  काम पर चली गयी थी  उसके काम पर जाने के बाद वह उस महिला के साथ मजुनिगिरी  करने लगा  लोगों की खुषर फुषर शुरू हो गयी किसी ने उसके बेटे को बताया तो वह उसे बहाने से लेकर घर में आया इसी बीच बेटे ने अपनी मा  को भी बुला लिया . बस यही से उनकी फसाद शुरू हो गयी. और इतने आगे बड़ गयी कि जान के लाले पड़ गए
  आगे यह भी बता दूँ  कि ये महाशय सिर्फ बीबी कि रोटियों पर खड़े हैं  ये  तो न काम के न काज के नो मन अनाज के वाली कहावत पर खरे उतरते हैं . बावजूद इसके पुरे रोब से रोटियां तोड़ते हैं और दिनभर बिस्तर तोड़ते है. यदि कोई काम करता हो तो थोड़ी बहुत उसकी धौंस को नयाचित भी ठहराएँ  किन्तु ऐसा व्यकित जो कुछ न करे ऊपर से मजुनी गिरी  वह भी बड़े बच्चो के साथ में रह कर .  सरासर  अन्याय  नहीं तो क्या है. जिस सबाब में में उसने बीबी को ढके मारे और  घर का सारा सामान बाहर फेंका उससे  तो देखने वाले को लगेगा कि बीबी निकम्मी है किन्तु यंहां  तो कहानी उलटी है.
किसी तरह से इन महाशय  को रोका और शांत किया इतने में उसकी पत्नी अपने बेटे और बेटी को लेकर बाहर चली गयी . फिर हम लोगों ने उसकी खूब क्लास ली जब जाकर उसने खुद वही सामन उठा कर रखा . पत्नी कि मजबूरी कहो या हिम्मत वह  दूसरी शिफ्ट काम पर चली गयी और फिर रात में  वापस वहीँ  आ गयी .
मैनी अखबारों में , रेडियो  टी वी  में घरेलू हिंसा के बारे में पढ़ा  और सुना किन्तु उसका भयानक , रोद्र रूप पहली बार  क़ल देखने को मिला.
ये लोग पढ़े लिखे नहीं है शयद अनपढ़ अज्ञानता भी इसका एक कारण हो सकती है  जिसके साथ यह व्यक्ति नशे में चूर होकर बीभत्स रूप धारण कर लेता है. जब आदमी के सर पर खून शरू हो जाता है तो वह कुछ नहीं देखता है  और यही एक बिंदु होता है जहाँ पर जहाँ पर किसी की जान भी चली जाती है .
इसके बाद शुरू हुआ लोगों का विचार विमर्श. अधितर की राय यही थी की बीह बचाव करने वाला या तो पित जाता है या फँस जाता है  नहीं जाना चैये लोगों को बीच बचाव करने . सिर्फ मैंने ही उस व्यक्ति को रोकने की कोशिस की थी इसलिए मेरी राय तो यही थी वचावकरना चाहिए  शयद किसी की जान बच जाय . हो सकता था की हम बीच बीच में अदने से पीछे हट जाते  तो कोई बड़ी दुर्घटना होने में देर नहीं थी परन्तु लोगों के विचार जान कर हैरानी भी हुई और दुख भी . कभी तो स्वयं को भी कोसने लगा था की मुझे चोट आ जाती  या कुछ  और .संभवतः लोग बचाव कार्यो में दिलचस्पी नहीं रखते इसीलिए देश में इतनी दुर्घनाये जन्म ले लेती हैं यदि वचाव  की  निति अपनाई जाय तो घरेलू हिंसा के शिकार में जान जाने मामले कम हो सकते हैं

शनिवार, 7 अगस्त 2010

तुम माँ हो ! !

माँ एक शब्द नहीं !
माँ ब्रम्हांड है !
माँ पृथ्वी   है!
माँ अनंत है, आकाश है !
माँ शील है, विराट है शक्ति है !

माँ एक शब्द नहीं!
माँ  केवल नारी नहीं !
वह तो छांव है 
वटवृक्ष है !
वह पत्नी है बेटी  है
बहिन है !
दादी है या नानी है
वह   तो माँ है !
माँ कि कोख में आने के लिए ,
उसे पूछना  नहीं पड़ता !
वह  तो धन्य मानती है  सौभाग्य समझती है !
जन्म लेने वाला तो धन्य हो ही जाता है !
कि उसे माँ मिल जाती है !
आशीर्वचन ग्रहण करती है जीवन भर
सौभाग्यवती, संततिवती  या चिरंजीवी!
वह  व्रती है ! दृढ है और क्षमाशील है!
निश्छल है , निर्विकार है !
नि:शब्द है !
यह तो प्रकृति का वरदान है !
माँ को शिकायत नहीं ,
सभी को बराबर देती
आंचल में प्यार और दुलार !
तुम तो समुद्र हो !
शांत हो गहराइयों तक !
तुम जननी हो !
तुम वन्दनीय हो !
तुम अतुलनीय हो !
तुम नमनीय हो !
तुम नारी ही नहीं !
तुम एक शब्द नहीं !
तुम माँ हो ! !

( मैंने लगभग बीस साल बाद इस कविता कि रचना कि है. इसकी परिणिति  घुगुती बासूती में "माँ" कविता है जिसने मुझे भी झक्जोर दिया है  यह उनकी कविता कि प्रतिक्रिया कहें या एक नया जागरण. मुझे उनकी कविता में यह महसूस हुआ है एक नारी कही दमनीय, दयनीय , कमजोर है  ऐसा उन्होंने माँ कविता में भाव दिया है किन्तु मैं माँ को दुनिया कि सबसे शक्तिशाली  भाग्यशाली  मानता हूँ  )- गिरधारी खंकरियाल

शनिवार, 31 जुलाई 2010

chitthi aayi hai

आज ३१ जुलाई है और इसे  चिट्ठी दिवस के रूप में मनाया जा रहा है . इस बात कि खबर आज के अखबार में छपी हुई थी . अर्थात आज के दिन भूले बिसरे  चिट्ठी को दुबारा लिखने का एक प्रयास .  क्या वास्तव में लोग एसा करेंगे . यदि एसा हुआ तो डाक विभाग कि चांदी  हो जायगी. क्योंकि  जब से इ मेल का जमाना आया तो लोगो नें  अपनों को हस लिखित ख़त  लिखना बंद कर दिए हैं. . मैंने स्वयं १९९३ के बाद शयद ही कोई पत्र लिखा हो , याद  नहीं आता . अब इसी तरह अन्य लोगों ने भी लिखना छोड़ दिया हो तो हजारों लाखो लोगों ने लिखना छोड़ा होगा . जबकि मेरा जैस आदमी आज भी अपनों के लिए ईमेल जैसा साधन का इस्तेमाल नहीं कर पाता.
हाँ अखबार में एक बात जो रोचक  लिखी थी वह पहली चिट्ठी का इतिहास .  अखबार के अनुसार  चिट्ठी पहली बार इंग्लैंड में ३१ जुलाई कोई ही पोस्ट कि गयी थी किन्तु दुःख इस बात का है कि इंग्लैंड का इतिहास रखने वालों को अपने देश का इतिहास नहीं मालूम . कि पहली चिट्ठी इस देश कब पोस्ट हुई  कहाँ पोस्ट हुई . इसका कुछ  भी पता नहीं मालूम . इंलैंड में जन्मी चिट्ठी का जन्म दिवस मानाने के लिए हम पलक  पांवड़े  बिछा के बैठे हुए हैं .
 इससे भी कोई अंतर नहीं आता है कम से कम चिट्ठी कि याद तो आई .  शयद कई लोगों ने आज इस खबर पढने के बाद चिट्ठी लिखी भी हो . यह एक अच्छी खबर हो सकती है. कुल मिलाकर हमें चिठ्ठी लिखना जारी रखना चाहिए इसके पीछे बहुत से कारण हैं. जैसे हस्त लिखित से भावना के आदान  प्रदान से गूढता बढती है संबधों में प्रगाढ़ता आती है , सुसुप्त  पड़ा  डाक विभाग के कर्चारियों के रोजगार बढ   सकेगा . चिट्ठियों के प्रचालन बंद होने कारण डाक विभाग के पास काम की  भारी कमी हो गयी है. और इसके चलते विभाग को अन्य कार्यों जैसे बैंकिंग , इंश्योरेंस  में लगना पड़ा और अपने कर्मचारियों के लिए वेतन का जुगाड़ करना पड़ा .

आशा है सभी लोग इस दिशा में पुन: थोड़ी दिलचस्पी लेकर पुरानी यादों को साकार करने का कष्ट करेगे  और  फिर गाने लगें डाकिया डाक लाया , डाकिया डाक लाया !!!!!!.

बुधवार, 14 जुलाई 2010

shiksha aur bharat

 पढ़ते सहस्रों शिष्य हैं, पर फीस ली जाती नहीं
उच्च शिक्षा तुच्छ धन पर बेच दी जाती नहीं .
ये शब्द हैं राष्ट्र कवि मैथलीशरण  गुप्त की.   भारत देश विश्व गुरु था . और अब विदेशी संस्थाएं  भारत को पढ़ने के लिए तैयार  बैठी हैं.   कल यह विश्व गुरु  विश्व शिष्य कहलायेगा .  कण्वाश्रम, तक्षशिला, और नालंदा विश्वविदालय  अब सिर्फ इतिहास बन कर भुला दिए जायेंगे.  याद करने के लिए आक्सफोर्ड , कम्ब्रिज़ आदि युनिवार्सित्यां  हमारे समक्ष पेश हो जायेंगे .
अब ऐसा  तो होगा ही . जब प्राथमिक विदालयों में पढाई का स्तर नगण्य हो चूका है. ग्रामीण क्षेत्र में  कक्षाओं में अध्यापक अपने घरेलु कार्यों में व्यस्त रहते  हैं . और जब वे उपलब्ध होते हैं तब सरकारी कम इतना अधिक हो जाता है कि पढ़ना उनके लिए टेढ़ी खीर  बन जाती है . आज कल  भी ऐसा ही हो रहा है. भारत में जनगणना का कर चल रहा है स्कूल खु चुके हैं किन्तु गुरूजी लोग जनगणना के कार्य  में व्यस्त हैं.  और जो समाया बचता है उसमे  भी अब चुनाव पहचान पत्र , एवं वोटर लिस्ट बनाने में  बीत रहा है. तो गुरु लोग भी करें तो करें क्या ?  इस तरह इनका पढ़ने का मुहूर्त ही नहीं निकल पता है. अब बच्चे  भी क्या करें स्कूल जाकर  इतिश्री कर आते हैं. किसी तरह साल बीत  जाता है और बच्चों को अगली कक्षा में प्रोनत कर दिया  जाता है.
विभिन्न  राज्य सरकारें  कन्या शिक्षा पर भी धन खर्च कर रही हैं फिर भी  उत्साह जनक परिणाम नहीं देखने को मिलते हैं.  यद्यपि विद्यालयों में संख्या तो बढ़ी है  परन्तु गुणवता शुन्य स्तर पर चली गयी है.  इसी कारण लोग पुलिस स्कूलों में महगी शिक्षा देने के लिए मजबूर हैं. और सरकारी हील हवाली   के कारण   ही शिक्षा का व्यवासयिकी करण हो चूका है. और इस परिपाटी आम आदमी  इन स्कूलों पढ़ा भी नहीं सकता . क्योंकि इनके खर्चे अत्यधिक हैं. एवं धिकल परिक्रिया में बच्चे और साथ में माँ बाप का इंटरव्यू  लिया जाता  है . और फिर अनपढ़ माँ बाप के बच्चे  पढने से बंचित रह जाते है.  इन पब्लिक स्कूलों कि परिक्रिया मूल अधिकारों के विपरीत है.
आज केंद्र सरकार शिक्षा का नया अधिनियम घोप्षित कर चुकी है परन्तु इन खामियों को क्या इस अधिनियम के तहेत चाक चोबंद कर दिया गया है. सरकार तो नियम और कानून बनाती है  किन्तु नौकरशाही  इसका दुरुप्युओग कर व्यवस्था को चोपट कर देते है.  हमरे देश कि नौकर शाही देश के लिए दीमक बन गयी है. इसे सुधरने कि आवश्यकता है.
शयद इन सब कारणों को देखते हुए उच्च शिक्षा के लिए सरकार ने विदेशी शिक्षा स्संस्थानों को देश में बुलाने इरादा बनाया हो .
प्रतिष्ठाओं कि इस देश में कमी नहीं रही, न है , किन्तु उपयोग नहीं हो पता है. विदेशो में जा कर हमारी प्रतिष्ठाएं अपना लोहा मनवा चुकी है.
इसलिए इसतरह कि व्यवस्था होनी चाहिए जिस में हर गरीब परिवार को आसानी से शिक्षा गुन्वातापरक मिल सके. अध्यापकों को सिर्फ शिक्षा के कार्यों में ही लगाना चाहिए . जनगणना मतगणना मतदान , आदि सरकारी सर्वे  में प्रायमरी अध्यापकों को बिलकुल  नहीं लगाना चाहिए . सबसे पहले प्रायमरी शिक्षा के स्तर को ही ठीक करना पड़ेगा.  तभी उच्च  शिक्षा कि बारी आती है.