गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
kashmir aur arundhati roy
अब प्रश्न उठता है कि रॉय ने सार्वजानिक मंच से एक संवेदन शील मुद्दे पर गिलानी जैसे अलगाववादी के साथ क्यों कही ? क्या अरुंधती जी इसकी संवेदन शीलता से परिचित नहीं थी या उन्हें सुखियाँ बटोरनी थी ? क्या यह एक कटु सत्य है जो उन्होंने कहा / यदि ऐसा है तो फिर राजनितिक दल क्यों परेशान है. अथवा श्रीमती रॉय ने जानबूझ कर ऐसा बयां दिया .
अब बात आती है अभिव्यक्ति कि स्वंत्रता की. आप के कहने मात्र से किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा तो नहीं पड़ती है यदि खlal पदता है तो इसे स्वतंत्रत का हनन कहा जायेगा शायद संवेदन शील mudde पर बोल कर उन्होंने ऐसा ही किया है. कितु उन्होंने तो सिर्फ सच कह दिया है तो उस पर इतना बवाल कि उन्हें जेल भेजने की तैयारी गृहमंत्रालय कर रहा है. परन्तु आज तक जिन्होंने हम्मारी संसद पर हमला किया , कई पुलिस , सेना के जवानों को maar गिराया , निर्दोषों की हत्या कर दी , कनिष्क विमान को समुद्र में मार गिराया, उन्हें तो अभी तक सजा भी नहीं हुई और वे लगातार aisi हरकते करते जा रहे हैं. उन्हें देश द्रोह के बजाय मुख्यधारा का अंग बनाने के प्रयास किये जाते रहे हैं. तो रॉय ने कौन सा पहाड़ इस देश में तोड़ डाला है. अभी इससे पहले कश्मीर की विधान सभा में तो यही बयान umar अब्दुल्लाह ने भी दिया जबकि वह तो राजनितिक प्रदेश का मुखिया है तो unhe क्यों नहीं देश द्रोही कहा गया .
यदि कश्मीर विवादस्पद राज्य नहीं है तो फिर बार बार सरकार को इसे " भारत का अभिन्न अंग" क्यों कहा जाता है ऐसा अन्य प्रदेशों के मामले में नहीं होता है. तो क्या अब रॉय के बयान के बाद बर्ताकारों का विषय भी बदल जायेगा और इस मुद्दे के वास्तव में हल करने के गंभीर प्रयास किये जायंगे ? या रॉय को जेल में daal दिया जायेगा और मुद्दे को फिर से दबा दिया jayega .? या फिर कश्मीर हमेशा की तरह सुलगता रहेगा ? ये बहुत सरे प्रश्न खड़े है जिनका उत्तर अब कश्मीर की जनता और भारत सरकार निकालने होंगे .
apne vichaar bhi rakhe ek mahaan lekhak ko kaisi saja milni chahiye
मंगलवार, 21 सितंबर 2010
गंगे कुछ पल रुको !
आक्रोश को रोको
क्रोध को थामो
पीड़ा का क्रंदन , स्पंदन ,
व्यथा ,निश्वास , आह और कराह
समेट लो सिसकियों में
गंगे कुछ पल रुको !
तुम्हारे क्रोध से, आक्रोश से
मैती आकुलित हैं
व्यथित, व्याकुल , निस्तब्ध हैं
प्रलयंकारी गर्जन से
माँ कैलाशी प्रार्थना बद्ध है
बद्री केदार भी नत मस्तक हैं
हिम गिरी भी व्याकुल है
पुकार रहे हैं
गंगे कुछ पल रुको !
सदियों से दे रही हो शीतल निर्मल अमृतमयी जल
पाप कष्टों का कर रही हो हरण - प्रबल !
निर्विकार निर्निमेष धरा का पग पग करती हो प्रक्षालन !
तो तुम्हे क्या दे रहे हैं ये मानव जन
मैला ! विष प्रदूषण !
और विषमयी बना अमृतमयी जल !
तो यह गर्जन , आक्रोश क्यों न हो !
दमनीय हो चुकी है हिम्पुत्री
कुछ पुत्रियाँ तो सहती हैं
कुछ प्राण निछावर करती हैं
कितु कुछ सीमा तोड़ आक्रोशित , क्रोधित होती है
जीवन सबका है जीवन के लिए !
तुम भी तो आक्रोश में हो
क्रोध में हो
प्रलयंकारी विनाशकारी रूप लिए हो
सब डरे हुए है भयभीत हैं !
गंगे कुछ पल रुको
आक्रोश सहज है
कितु मैती पुकार रहे हैं
नतमस्तक है,
शांत और मौन की प्रार्थना कर रहे है
और पूछ रहे हैं,
ऐसा प्रलय क्यों
ऐसा हाहाकार क्यों
थोडा शांत
थोडा मौन
गंगे कुछ पल रुको !
( वर्ष २०१० अतिवृष्टि के रूप में जाना जायेगा उत्तराखंड में अति वृष्टि ने प्रलय की स्थिति पैदा कर दी है यह भी मानव निर्मित विपतियाँ है गंगा और यमुना अपने उफान पर है न जाने कितना उबाल आयेगा इन जीवन दायिनी नदियों में . बाढ़ का प्रकोप ने सभी को भयभीत कर दिया है )
गिरधारी खंकरियाल
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
हिंदी दिवस और राज भाषा
इतना ही नहीं संविधान में राजभाषा का दर्जा प्राप्त भाषा सरकारी कामकाज की भाषा आज तक नहीं बन पाई .यह एक मात्र उत्तर भारत की भाषा बन कर रह गयी है . केंद्रीय सरकारी कार्यालयों में सारा काम अंग्रेजी में होता आ रहा है . सरकारी अधिकारी और मंत्रिगन तो अंग्रेजी से ही अपना स्तर ऊँचा बनाने पर लगे है हिंदी बोलने और सुनने वाले की कोई कीमत यहाँ नहीं है. राज्यों ने तो अपने अपने स्थानीय भाषा को राजकीय कार्यों के लिए प्रयोग किया है सिर्फ उत्तर भारत के कुछ हिंदी भाषी राज्य ही सरकारी काम हिंदी में करते हैं
हमारी संसद तक में लगभग सभी चर्चाये एवें अन्य विधिक कार्य अंग्रेजी में होते है अधिकांश सदस्य अंग्रेजी में बोलना पसंद करते हैं. दक्षिण एवं पूर्वोत्तर के सांसद तो हिंदी से गुरेज ही करते हैं इतना ही नहीं हमारे उत्तर भारतीय प्रधान मंत्री तक हिंदी बोलने से परहेज करते हैं.सभी विधायी दस्तावेज अंग्रेजी में तैयार होते हैं कब समाप्त होगी ये अंग्रेजी की गुलामी ? अधिकारी अग्रेजी बोलते हैं अंग्रेजी लिखते हैं हिंदी में बतियाना उनके कद को नीचे कर देता है .
हाँ श्रीमती सोनिया गाँधी की दाद देनी पड़ेगी विदेशी महिला होकर भी राजनीति की पारी शुरू करते हुए रोमन हिंदी लिख कर पढना प्रारंभ किया था किन्तु यह महिला आज धारा प्रवाह हिंदी बोलने लगी है लगभग सभी भाषणों में चाहे संसद के अन्दर हों या बाहरउन्होंने हिंदी का प्रयोग किया है . हमारे सांसदों को इससे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए विशेष कर दक्षिण भारतीयों को . जब एक विदेशी व्यक्ति हिंदी बोले सकता है तो अन्य क्यों नहीं .
हमारे देश की माननीय अदालतें भी हिंदी से गुरेज ही करती हैं . अभी एक दो दिन पूर्व एक अखबार की खबर थी कि माननीय न्यामूर्ति ने किसी याचिका करता को शालीनता का पाठ पढ़ने के लिए फटकार लगाई क्योंकि वह व्यक्ति बार बार जबाव "या या " यानि एस एस चलताऊ अंग्रेजी में दे रहा था . उसे बताया गया कि अदालत में या या के बजाय मी लोर्ड शिप , माय लोर्ड शिप आदि सम्मान जनक शब्दों का प्रयोग सिखाया गया यह भी बताया गया कि कौन सा शब्द कब और कैसे प्रयोग किया जाता है हैरानी कि बात है हमारी आजाद अदालते अंग्रेजी के आगे नतमस्तक हैं . क्या हिंदी में इतने सम्मान जनक शब्दों का आभाव है की उनसे अदालत की शालीनता में खलल पड़ता हो . क्यों नहीं माननीय, परम आदरणीय , पञ्च परमेश्वर, न्याय पिता आदि अलंकरण क्या कम हैं अदालत की शालीनता को बरकरार रखने के लिए !.
हिंदी के लेखक वर्ग से अनुरोध है हिंदी को इतनी रोचक बनायें की दूर देश से भी लोग इसे पढने और सीखने के लिए स्वयम लालायित हो उठे . इसे सिर्फ संवैधानिक राजभाषा ही नहीं, संपर्क और कार्य की राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के साथ साथ विश्व भाषा बनाना होगा अंग्रेजी के किले में सेंध तो लगानी ही होगी
शुक्रवार, 3 सितंबर 2010
जीवन पूर्ति का मर्म
Please read complete mail.
नहीं ??? ओके ......... पास्ता ?
नहीं ?? .. इसके बारे में क्या सोचते हैं ?
आज ये खाने का भी मन नहीं ? ... ओके .. क्या इस मेक्सिकन खाने को आजमायें ?
दुबारा नहीं ? कोई समस्या नहीं .... हमारे पास कुछ और भी विकल्प हैं........
ह्म्म्मम्म्म्म ... चाइनीज ????? ??
बर्गर्सस्स्स्सस्स्स्स ? ???????
ओके .. हमें भारतीय खाना देखना चाहिए ....... J ? दक्षिण भारतीय व्यंजन ना ??? उत्तर भारतीय ?
जंक फ़ूड का मन है ?
हमारे पास अनगिनत विकल्प हैं ..... .. टिफिन ?
मांसाहार ?
ज्यादा मात्रा ?
या केवल पके हुए मुर्गे के कुछ टुकड़े ?
आप इनमें से कुछ भी ले सकते हैं ... या इन सब में से थोड़ा- थोड़ा ले सकते हैं ...
अब शेष बची मेल के लिए परेशान मत होओ....
मगर .. इन लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है ...
इन्हें तो बस थोड़ा सा खाना चाहिए ताकि ये जिन्दा रह सकें ..........
इनके बारे में अगली बार तब सोचना जब आप किसी केफेटेरिया या होटल में यह कह कर खाना फैंक रहे होंगे कि यह स्वाद नहीं है !!
इनके बारे में अगली बार सोचना जब आप यह कह रहे हों ... यहाँ की रोटी इतनी सख्त है कि खायी ही नहीं जाती.........
कृपया खाने के अपव्यय को रोकिये
अगर आगे से कभी आपके घर में पार्टी / समारोह हो और खाना बच जाये या बेकार जा रहा हो तो बिना झिझके आप 1098 (केवल भारत में )पर फ़ोन करें - यह एक मजाक नहीं है - यह चाइल्ड हेल्पलाइन है । वे आयेंगे और भोजन एकत्रित करके ले जायेंगे।
कृप्या इस सन्देश को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित करें इससे उन बच्चों का पेट भर सकता है
कृप्या इस श्रृंखला को तोड़े नहीं .....
हम चुटकुले और स्पाम मेल अपने दोस्तों और अपने नेटवर्क में करते हैं ,क्यों नहीं इस बार इस अच्छे सन्देश को आगे से आगे मेल करें ताकि हम भारत को रहने के लिए दुनिया की सबसे अच्छी जगह बनाने में सहयोग कर सकें -
'मदद करने वाले हाथ प्रार्थना करने वाले होंठो से अच्छे होते हैं ' - हमें अपना मददगार हाथ देंवे ।
--
Thanks & Regards,
surjeet
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep
(¨`·.·´¨)¸.·´ Smiling!!!
`·.¸.·
नहीं ??? ओके ......... पास्ता ?
नहीं ?? .. इसके बारे में क्या सोचते हैं ?
आज ये खाने का भी मन नहीं ? ... ओके .. क्या इस मेक्सिकन खाने को आजमायें ?
दुबारा नहीं ? कोई समस्या नहीं .... हमारे पास कुछ और भी विकल्प हैं........
ह्म्म्मम्म्म्म ... चाइनीज ????? ??
बर्गर्सस्स्स्सस्स्स्स ? ???????
ओके .. हमें भारतीय खाना देखना चाहिए ....... J ? दक्षिण भारतीय व्यंजन ना ??? उत्तर भारतीय ?
जंक फ़ूड का मन है ?
हमारे पास अनगिनत विकल्प हैं ..... .. टिफिन ?
मांसाहार ?
ज्यादा मात्रा ?
या केवल पके हुए मुर्गे के कुछ टुकड़े ?
आप इनमें से कुछ भी ले सकते हैं ... या इन सब में से थोड़ा- थोड़ा ले सकते हैं ...
अब शेष बची मेल के लिए परेशान मत होओ....
मगर .. इन लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है ...
इन्हें तो बस थोड़ा सा खाना चाहिए ताकि ये जिन्दा रह सकें ..........
इनके बारे में अगली बार तब सोचना जब आप किसी केफेटेरिया या होटल में यह कह कर खाना फैंक रहे होंगे कि यह स्वाद नहीं है !!
इनके बारे में अगली बार सोचना जब आप यह कह रहे हों ... यहाँ की रोटी इतनी सख्त है कि खायी ही नहीं जाती.........
कृपया खाने के अपव्यय को रोकिये
अगर आगे से कभी आपके घर में पार्टी / समारोह हो और खाना बच जाये या बेकार जा रहा हो तो बिना झिझके आप 1098 (केवल भारत में )पर फ़ोन करें - यह एक मजाक नहीं है - यह चाइल्ड हेल्पलाइन है । वे आयेंगे और भोजन एकत्रित करके ले जायेंगे।
कृप्या इस सन्देश को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित करें इससे उन बच्चों का पेट भर सकता है
कृप्या इस श्रृंखला को तोड़े नहीं .....
हम चुटकुले और स्पाम मेल अपने दोस्तों और अपने नेटवर्क में करते हैं ,क्यों नहीं इस बार इस अच्छे सन्देश को आगे से आगे मेल करें ताकि हम भारत को रहने के लिए दुनिया की सबसे अच्छी जगह बनाने में सहयोग कर सकें -
'मदद करने वाले हाथ प्रार्थना करने वाले होंठो से अच्छे होते हैं ' - हमें अपना मददगार हाथ देंवे ।
--
Thanks & Regards,
surjeet
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep
(¨`·.·´¨)¸.·´ Smiling!!!
`·.¸.· मुझे यह मेल से मेरे मित्र द्वारा प्रेषित किया गया जरा सोचिये और इस दिश में भी कदम उठायें ताकि ब्लॉगर जगत के लोग भी इन गरीब, निरीह लोगो तक अपना योग दान कर सकें . कितनी बिडम्बना है की कहीं तो आपके पास बहुत से विकल्प हैं भोजन के लिए वहीँ दूसरी तरफ एक ऐसी दुनिया भी है जिन्हे दो जून की रोटी भी नसीब नहीं है.वहीँ हमारी सरकार १ करोड़ टन अन्नाज गोदामों और मंडियों में सडा देती है या फिर विदेशों में पशुओं के चारे के लिए बेच देती है. पर इन निर्हों को नहीं बाँटती है सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ा कितु तब भी ये भूखे ही हैं . बिडम्बना की जय हो!
सोमवार, 30 अगस्त 2010
घरेलू हिंसा
जब हम लोग बाहर आये तो उस व्यक्ति कि हैवानियत चरम पर थी वह कभी डंडे तो कभी ईंट पत्थर मार रहा था . पड़ोस के लोग तमासा देख रहे थे किसी कीया तो हिम्मत नहीं हो रही थी या कोई बीच में नहीं पड़ना चाहता था जो भी हो नज़ारा खतरनाक था उसका शरीर भी तो भीमकाय था और उपर से पूरी तरह से शराब के नशे में चूर था . परन्तु किसी तरह बाहर आकार मैंने उसे रोकने कि कोशिश की तब जाकर कुछ बचाव हो सका.
हुआ यों था सबेरे सबेर उसने किसी जानने वाली महिला को जिसके साथ दो छोटे बच्चे थे को पड़ोस के मकान में किराये पर कमरा दिलाया था , महिला अकेली रहती है उसके पश्चात् उसकी पत्नी सुबह काम पर चली गयी थी उसके काम पर जाने के बाद वह उस महिला के साथ मजुनिगिरी करने लगा लोगों की खुषर फुषर शुरू हो गयी किसी ने उसके बेटे को बताया तो वह उसे बहाने से लेकर घर में आया इसी बीच बेटे ने अपनी मा को भी बुला लिया . बस यही से उनकी फसाद शुरू हो गयी. और इतने आगे बड़ गयी कि जान के लाले पड़ गए
आगे यह भी बता दूँ कि ये महाशय सिर्फ बीबी कि रोटियों पर खड़े हैं ये तो न काम के न काज के नो मन अनाज के वाली कहावत पर खरे उतरते हैं . बावजूद इसके पुरे रोब से रोटियां तोड़ते हैं और दिनभर बिस्तर तोड़ते है. यदि कोई काम करता हो तो थोड़ी बहुत उसकी धौंस को नयाचित भी ठहराएँ किन्तु ऐसा व्यकित जो कुछ न करे ऊपर से मजुनी गिरी वह भी बड़े बच्चो के साथ में रह कर . सरासर अन्याय नहीं तो क्या है. जिस सबाब में में उसने बीबी को ढके मारे और घर का सारा सामान बाहर फेंका उससे तो देखने वाले को लगेगा कि बीबी निकम्मी है किन्तु यंहां तो कहानी उलटी है.
किसी तरह से इन महाशय को रोका और शांत किया इतने में उसकी पत्नी अपने बेटे और बेटी को लेकर बाहर चली गयी . फिर हम लोगों ने उसकी खूब क्लास ली जब जाकर उसने खुद वही सामन उठा कर रखा . पत्नी कि मजबूरी कहो या हिम्मत वह दूसरी शिफ्ट काम पर चली गयी और फिर रात में वापस वहीँ आ गयी .
मैनी अखबारों में , रेडियो टी वी में घरेलू हिंसा के बारे में पढ़ा और सुना किन्तु उसका भयानक , रोद्र रूप पहली बार क़ल देखने को मिला.
ये लोग पढ़े लिखे नहीं है शयद अनपढ़ अज्ञानता भी इसका एक कारण हो सकती है जिसके साथ यह व्यक्ति नशे में चूर होकर बीभत्स रूप धारण कर लेता है. जब आदमी के सर पर खून शरू हो जाता है तो वह कुछ नहीं देखता है और यही एक बिंदु होता है जहाँ पर जहाँ पर किसी की जान भी चली जाती है .
इसके बाद शुरू हुआ लोगों का विचार विमर्श. अधितर की राय यही थी की बीह बचाव करने वाला या तो पित जाता है या फँस जाता है नहीं जाना चैये लोगों को बीच बचाव करने . सिर्फ मैंने ही उस व्यक्ति को रोकने की कोशिस की थी इसलिए मेरी राय तो यही थी वचावकरना चाहिए शयद किसी की जान बच जाय . हो सकता था की हम बीच बीच में अदने से पीछे हट जाते तो कोई बड़ी दुर्घटना होने में देर नहीं थी परन्तु लोगों के विचार जान कर हैरानी भी हुई और दुख भी . कभी तो स्वयं को भी कोसने लगा था की मुझे चोट आ जाती या कुछ और .संभवतः लोग बचाव कार्यो में दिलचस्पी नहीं रखते इसीलिए देश में इतनी दुर्घनाये जन्म ले लेती हैं यदि वचाव की निति अपनाई जाय तो घरेलू हिंसा के शिकार में जान जाने मामले कम हो सकते हैं
शनिवार, 7 अगस्त 2010
तुम माँ हो ! !
माँ ब्रम्हांड है !
माँ पृथ्वी है!
माँ अनंत है, आकाश है !
माँ शील है, विराट है शक्ति है !
माँ एक शब्द नहीं!
माँ केवल नारी नहीं !
वह तो छांव है
वटवृक्ष है !
वह पत्नी है बेटी है
बहिन है !
दादी है या नानी है
वह तो माँ है !
माँ कि कोख में आने के लिए ,
उसे पूछना नहीं पड़ता !
वह तो धन्य मानती है सौभाग्य समझती है !
जन्म लेने वाला तो धन्य हो ही जाता है !
कि उसे माँ मिल जाती है !
आशीर्वचन ग्रहण करती है जीवन भर
सौभाग्यवती, संततिवती या चिरंजीवी!
वह व्रती है ! दृढ है और क्षमाशील है!
निश्छल है , निर्विकार है !
नि:शब्द है !
यह तो प्रकृति का वरदान है !
माँ को शिकायत नहीं ,
सभी को बराबर देती
आंचल में प्यार और दुलार !
तुम तो समुद्र हो !
शांत हो गहराइयों तक !
तुम जननी हो !
तुम वन्दनीय हो !
तुम अतुलनीय हो !
तुम नमनीय हो !
तुम नारी ही नहीं !
तुम एक शब्द नहीं !
तुम माँ हो ! !
( मैंने लगभग बीस साल बाद इस कविता कि रचना कि है. इसकी परिणिति घुगुती बासूती में "माँ" कविता है जिसने मुझे भी झक्जोर दिया है यह उनकी कविता कि प्रतिक्रिया कहें या एक नया जागरण. मुझे उनकी कविता में यह महसूस हुआ है एक नारी कही दमनीय, दयनीय , कमजोर है ऐसा उन्होंने माँ कविता में भाव दिया है किन्तु मैं माँ को दुनिया कि सबसे शक्तिशाली भाग्यशाली मानता हूँ )- गिरधारी खंकरियाल
शनिवार, 31 जुलाई 2010
chitthi aayi hai
हाँ अखबार में एक बात जो रोचक लिखी थी वह पहली चिट्ठी का इतिहास . अखबार के अनुसार चिट्ठी पहली बार इंग्लैंड में ३१ जुलाई कोई ही पोस्ट कि गयी थी किन्तु दुःख इस बात का है कि इंग्लैंड का इतिहास रखने वालों को अपने देश का इतिहास नहीं मालूम . कि पहली चिट्ठी इस देश कब पोस्ट हुई कहाँ पोस्ट हुई . इसका कुछ भी पता नहीं मालूम . इंलैंड में जन्मी चिट्ठी का जन्म दिवस मानाने के लिए हम पलक पांवड़े बिछा के बैठे हुए हैं .
इससे भी कोई अंतर नहीं आता है कम से कम चिट्ठी कि याद तो आई . शयद कई लोगों ने आज इस खबर पढने के बाद चिट्ठी लिखी भी हो . यह एक अच्छी खबर हो सकती है. कुल मिलाकर हमें चिठ्ठी लिखना जारी रखना चाहिए इसके पीछे बहुत से कारण हैं. जैसे हस्त लिखित से भावना के आदान प्रदान से गूढता बढती है संबधों में प्रगाढ़ता आती है , सुसुप्त पड़ा डाक विभाग के कर्चारियों के रोजगार बढ सकेगा . चिट्ठियों के प्रचालन बंद होने कारण डाक विभाग के पास काम की भारी कमी हो गयी है. और इसके चलते विभाग को अन्य कार्यों जैसे बैंकिंग , इंश्योरेंस में लगना पड़ा और अपने कर्मचारियों के लिए वेतन का जुगाड़ करना पड़ा .
आशा है सभी लोग इस दिशा में पुन: थोड़ी दिलचस्पी लेकर पुरानी यादों को साकार करने का कष्ट करेगे और फिर गाने लगें डाकिया डाक लाया , डाकिया डाक लाया !!!!!!.
बुधवार, 14 जुलाई 2010
shiksha aur bharat
उच्च शिक्षा तुच्छ धन पर बेच दी जाती नहीं .
ये शब्द हैं राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त की. भारत देश विश्व गुरु था . और अब विदेशी संस्थाएं भारत को पढ़ने के लिए तैयार बैठी हैं. कल यह विश्व गुरु विश्व शिष्य कहलायेगा . कण्वाश्रम, तक्षशिला, और नालंदा विश्वविदालय अब सिर्फ इतिहास बन कर भुला दिए जायेंगे. याद करने के लिए आक्सफोर्ड , कम्ब्रिज़ आदि युनिवार्सित्यां हमारे समक्ष पेश हो जायेंगे .
अब ऐसा तो होगा ही . जब प्राथमिक विदालयों में पढाई का स्तर नगण्य हो चूका है. ग्रामीण क्षेत्र में कक्षाओं में अध्यापक अपने घरेलु कार्यों में व्यस्त रहते हैं . और जब वे उपलब्ध होते हैं तब सरकारी कम इतना अधिक हो जाता है कि पढ़ना उनके लिए टेढ़ी खीर बन जाती है . आज कल भी ऐसा ही हो रहा है. भारत में जनगणना का कर चल रहा है स्कूल खु चुके हैं किन्तु गुरूजी लोग जनगणना के कार्य में व्यस्त हैं. और जो समाया बचता है उसमे भी अब चुनाव पहचान पत्र , एवं वोटर लिस्ट बनाने में बीत रहा है. तो गुरु लोग भी करें तो करें क्या ? इस तरह इनका पढ़ने का मुहूर्त ही नहीं निकल पता है. अब बच्चे भी क्या करें स्कूल जाकर इतिश्री कर आते हैं. किसी तरह साल बीत जाता है और बच्चों को अगली कक्षा में प्रोनत कर दिया जाता है.
विभिन्न राज्य सरकारें कन्या शिक्षा पर भी धन खर्च कर रही हैं फिर भी उत्साह जनक परिणाम नहीं देखने को मिलते हैं. यद्यपि विद्यालयों में संख्या तो बढ़ी है परन्तु गुणवता शुन्य स्तर पर चली गयी है. इसी कारण लोग पुलिस स्कूलों में महगी शिक्षा देने के लिए मजबूर हैं. और सरकारी हील हवाली के कारण ही शिक्षा का व्यवासयिकी करण हो चूका है. और इस परिपाटी आम आदमी इन स्कूलों पढ़ा भी नहीं सकता . क्योंकि इनके खर्चे अत्यधिक हैं. एवं धिकल परिक्रिया में बच्चे और साथ में माँ बाप का इंटरव्यू लिया जाता है . और फिर अनपढ़ माँ बाप के बच्चे पढने से बंचित रह जाते है. इन पब्लिक स्कूलों कि परिक्रिया मूल अधिकारों के विपरीत है.
आज केंद्र सरकार शिक्षा का नया अधिनियम घोप्षित कर चुकी है परन्तु इन खामियों को क्या इस अधिनियम के तहेत चाक चोबंद कर दिया गया है. सरकार तो नियम और कानून बनाती है किन्तु नौकरशाही इसका दुरुप्युओग कर व्यवस्था को चोपट कर देते है. हमरे देश कि नौकर शाही देश के लिए दीमक बन गयी है. इसे सुधरने कि आवश्यकता है.
शयद इन सब कारणों को देखते हुए उच्च शिक्षा के लिए सरकार ने विदेशी शिक्षा स्संस्थानों को देश में बुलाने इरादा बनाया हो .
प्रतिष्ठाओं कि इस देश में कमी नहीं रही, न है , किन्तु उपयोग नहीं हो पता है. विदेशो में जा कर हमारी प्रतिष्ठाएं अपना लोहा मनवा चुकी है.
इसलिए इसतरह कि व्यवस्था होनी चाहिए जिस में हर गरीब परिवार को आसानी से शिक्षा गुन्वातापरक मिल सके. अध्यापकों को सिर्फ शिक्षा के कार्यों में ही लगाना चाहिए . जनगणना मतगणना मतदान , आदि सरकारी सर्वे में प्रायमरी अध्यापकों को बिलकुल नहीं लगाना चाहिए . सबसे पहले प्रायमरी शिक्षा के स्तर को ही ठीक करना पड़ेगा. तभी उच्च शिक्षा कि बारी आती है.
सोमवार, 12 जुलाई 2010
band ka prakop
बंद के कारण कई शहरों में स्थिति ख़राब थी इसी खबरें सुनाई दी . मैं बचपन में भी कुछ लिखने का शौक रखता था तब भी में एक लेख लिख था कि ७२ घंटे का बंद देश को ७२ वर्ष पीछे धकेल देता है. यद्यपि यह लेख प्रकशित न हो सका. किन्तु मेरा मानना आज भी यही है. देश में बंद करने का कोई औचित्य नहीं है . शक्ति प्रदर्शन का कोई भी उचित औजार नहीं है.
आखिर बंद के बाद आपको क्या क्या मिला ? लाखो करोड़ों का कारोबार संगठित और असंगठित क्षेत्र से नुकसान हुआ . बकिंग क्षेत्र में भी समाशोधन रुकने कारण अरबों का व्यापार ठप्प रहा . हजारों कर्मचारियो काम पर न जा सके धिहादी मजदूर, त्ठेली वाले रेहड़ी वाले पान वाले आदि इस प्रकार के कई वर्ग जो रोज कुंवा खोदते हैं और रोज पानी पीते हैं का क्या बुरा हाल हुआ होगा . इसका आकलन करना बहुत कठिन है.
संभतः तेल की कीमतें इतनी भी न बढ़ी हो जितना की बंद ने नुसान कर दिया है. अब आप यह मत कहें कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. बंद एक दिन का एक बर्ष तक उसकी भरपाई नहीं हो पाती है. महगाई को रोकने के बजाय आग में घी डालने वाला काम हो गया है.
आतंक बाद के समय पंजाब में भी aye दिन उग्र्बादी संगठन कोई न कोई बंद करके रखते थे किन्तु मैं उस समय भी बंद के दिन कभी छुटि नहीं करता था .
यदि राजनितिक पार्टियों को महगाई रोकने के समिलित उपाय करने हों तो सिर्फ मंत्रियों को ही क्यों न बंधक बना लेते हैं . इससे त्वरित कार्यवाही होगी. किन्तु इसका एक और दुष्परिणाम भी होगा कि कल आतंकवादी लोग भी इस तरह का काम राजनितिक पार्टियों के द्वारा करवाने लगेंगे . इस लिए सबसे अच्छा तो संसद ही है यहाँ पर आप पूरी शक्ति दिखा कर सरकार को झुका सकते हैं. प्रजातान्त्रिक तरीके ही इन बातों में कारगर सिद्ध होते है.
हड़ताल या बंद ( असहयोग आन्दोलन) इसकी उत्पति महात्मा गाँधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ कि थी. आज यही अपना स्वरुप बदल चूका है. पार्टियाँ अपना हित देख कर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं.
अंत में मैं तो इतना कहना चौंग कि देश को नुक्सान नहीं उसकी तरक्की में साथ देना चाहिए . बंद जैसा हथियार हर प्रकार से अवनति का रास्ता तैयार करता है .
सोमवार, 7 जून 2010
लेखक की संवेदन शीलता
मैंने अभी किसी ब्लॉग में एक महिला द्वारा लिखा हुआ लेख पढ़ा । इस लेख में लेखिका महोदया ने किसी टिपण्णी कार की टिपण्णी से रुष्ट होकर लिख डाला। कारणसिर्फ इतना था कि टिपण्णी कार नें उन्हें कलम की दिशा बदलने की सलाह दे डाली । क्यूंकि महिला लेखिका महिलोओं से सम्बंधित लिखती हैं। यों तो मैंने न तो टिपण्णी पढ़ी और न ही लेखिका का वह लेख जिस पर अमुक टिप्पणी आई ।
लेखिका महोदया नें इस बात पर एक लम्बा चौड़ा नया लेख लिह दिया है। इसमें उन्होंने महिलाओं के वस्त्र पहनने और न पहनने के कई उद्धरण दे डाले । यद्यपि उनकी ये सब बातें तथ्य परक हैं । किन्तु जितने भी उदहारण दिए गए है सभी १०० से लेकर १००० वर्ष पुराणी बातें हैं।
संसार परिवर्तन शील है और समय के साथ सभी धर्मं, जाती, देश , एवं संस्कृतियों नें परिवर्तन को अपनाया और मानव विकास इसी क्रम विकसित हुआ । पुरुष क्या पहनता ,क्या खाता, क्या पसंद करता है यह विचारिन्य नहीं है किन्तु एक महिला क्या करती है क्या पहेनती है के पसंद करती है तो एह क्यों विचारनीय है। इसलिए की एक महिला इन सवालों को उठा रही है। नहीं!
आज के सन्दर्भ में वे सभी तर्क लगभग तार्किक नहीं है की कोई महिला किसी क्षेत्र में बिना ब्लाउज, या बिना पेटीकोट पहने रहती हैं या रहनाचाहती हैं इसी कल्पना करना आज अपने को १००० साल पीछे धकेलना है। महोदया ये भूल गयी हैं कीइस देश में महिलाओं को सबसे अधिक सम्मान भी दिया जाता है । विश्व में एसा कही नहीं मिलता है । यहाँ नारियो की पूजा भी की जाती है आज ही नहीं सदियों से । तभी अर्ध नगन जीवन यापन कर भी नारियां सुरशित रही हैं । अब अगर आप इस युग में भी अर्ध नग्न या निर्वस्त्र रहना चाहें तो आपकी मर्जी । वैसे क्या आप किसी शादी मेंआज के युग में अर्धनग्न , बिना ब्लाउज, या बिना पेटीकोट पहने जा सकती है? नहीं । तो फिर किसी पाठक पर गुस्सा उतरना कहाँ तक जायज है।
मैं अब ये कहना चाहूँगा की एक लेखक के लिए उसके पाठक gan devtulya हैं।
aur apne pathkon ke prati is tarah ka gussa nikalna uchit nahin hai । लेखक वेहद संवेदन शील होता है टिप्पणी छोटी हो या बड़ी सलाह अछि हो या बुरी कित्नु अभद्र नहीं होनी चाहिए । अभद्रता कहीं भी कभी भी सराहनीय नहीं है । लेखक को अपने पाठकों के विचारों को उचित स्थान तो देना ही पड़ेगा न की गुस्सा हो कर एक नया लेख लिख डालो । tark apne sthaan par hote hain kintu unka kutark na banayen. sirf purush aur mahila ki ladaai ek naya sigufa banane se bachen .