मंगलवार, 8 मार्च 2011

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

        
            सभी  महिला ब्लोगरों को 

                     अंतर्राष्ट्रीय

                महिला दिवस  की               

                       हार्दिक 

                   शुभकामनाएं 

 

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

असमय मृत्यु का प्रति फल - पुनर्जन्म या पुनर्जीवित होना

संसार परिवर्तन शील है यह एक ब्रह्म सत्य है जन्म मृत्यु के चक्र में प्राणी घूमता रहता  है . तरह तरह की व्याख्याएं  परिभाषित है, प्राणी जीवन के वृत्त चित्र की .धर्म भी अलग अलग मान्यताएं प्रदान करते हैं . उस एकाकार  नियंता की निर्माण कार्यदायिनी में  निर्माण, उत्पादन, विपणन और निष्पादन  सभी कुछ  अबाध गति से चलता रहता है बिना कुछ समय बिताये   और बाधित हुए .  धर्म ग्रंथो  की गणना, परिकल्पना  को मैं नकार तो नहीं सकता, क्योंकि उनकी भी कुछ अपनी सार्वभौमिकता तो अवश्य होगी . उसकी इस निर्माण कार्यदायिनी में जन्म पूर्व ही मृत्यु का दिनांक  भी अंकित हो जाता है .
असमय मृत्यु वाले प्राणी को तो यमराज के कार्यालय  में प्रवेश भी वर्जित होता है . उसके असमय आने का कारण तथा उसके जीवन की पूरी पड़ताल कर दी जाती है  और तुरंत ही उसे वापस भेज दिया जाता है , किन्तु इन सब बातों से बेखबर हम लोग मृतक शरीर को, अपनी मान्यताओं के अनकूल,   अधिक देर  न रख कर, दाह संस्कार कर देते हैं , लौटते  हुए क्षणिक विलम्ब  या हमारी अति  शीघ्रता उस आत्मा को संवाहक विहीन कर देती है , और उसे अधोगति प्राप्त होती है .
कई बार मृत्यु  को प्राप्त  व्यक्ति को पुनः जीवित होते हुए भी सुना गया  ऐसा  तभी हो पाता है जब असमय मृत्यु आत्मा के लौटने तक संवाहक शरीर का दाह संस्कार नहीं हुआ होता है  और आत्मा पुनः उसी शरीर में संचारित हो जाती है . अभी कुछ दिन पूर्व ब्लॉग में  आत्मा और पुनर्जन्म के बारे में बहस हो रही थी  संयोगवश आज मुझे अपने एक सहयोगी से ऐसी ही जानकारी प्राप्त हुई . जिसमे आत्मा का पुनः संचार  भी हुआ, और पुर्जन्म भी . सत्यता तो प्रभु ही जाने . 
किसी सन्दर्भ में वे बताने लगे मेरी दादी  को, जब उनके पिताजी, हाथो में मालिश कर रहे थे तो दादी की मृत्यु हो गयी बात सायंकालीन थी , इसलिए दाह संस्कार  प्रातः ही संभव था, दादी की आयु  १०५  वर्ष थी, किन्तु कुछ समय बाद उनमें पुनः जीवन का संचार हो गया. होश में आने पर दादी ने जो अनुभव सुनाया  और उसका प्रतिफल प्रत्यक्ष दर्शनीय था वे बताती है कि उन्हें असमय आने पर गर्म चिमटों से मारा गया और तत्पश्चात देखने पर उनके शरीर में घाव स्पष्ट नजर आने लगे, किन्तु तीन दिन बाद उनकी पुनः मृत्यु हो गयी .
इसी तरह वे एक किस्सा और सुनाते है कि उन्ही की रिश्तेदारी में एक व्यक्ति की खेत जोतते समय दुर्घटना वश अकारण  असमय  मृत्यु हो गयी. दिन का वक्त था तो दाह संस्कार समय पर कर दिया गया. परन्तु इन्हें लौटा दिया गया था यमराज के दरबार से . इन्ही दिनों पास के ही गाँव में एक बालक का जन्म हुआ  जब यह बालक चार वर्ष का था तो उसने सारा वृतांत सुनाया और अपने मूल गाँव आया . वहां  पर उसने उसी तरह बात की जैसे पहले से करता था. मेंरा  सस्कार करने में आप लोगों ने जल्दी क्यों की ? ऐसे ही कई लोगों से उन्हें रूपये वापस  लेने थे  तो उस बालक के  बताने पर सभी रुपयों की वसूली हो सकी.  इस प्रकार कई सारी प्रमाणिकता देते हुए व अब वहीँ  पर अपने पूर्व लोगो के साथ ही रह रहा है .
 उसे जब यमराज के पास ले जाया गया  तो बताता है कि उन्होंने असमय आने  के कारण वापस भेज दिया था किन्तु दाह संस्कार हो जाने के कारण संवाहक न मिल पाने के कारण उसे वापस लेकर गए , यमराज ने उसे दूत के साथ विष्णु के पास भेजा परन्तु विष्णु ने निदान के लिए पुनः  ब्रह्मा जी  के पास भेजा. चूँकि उसकी आयु लगभग १५ वर्ष शेष थी इसलिए नए संवाहक को जन्म देकर उसे वापस भेज दिया . इस तरह पुर्जन्म ही नहीं बल्कि वह तो पुरानी आयु को ही भोगने के लिए भी जन्मित हुआ .
इस तरह मनुष्य व् प्राणी  सभी अपने कृत्य, अकृत्य एवं कुकृत्य  का प्रत्यक्ष फल प्राप्त करता है इस व्यक्ति को तो तीन  देवताओं के साकार दर्शन हुए , वहां सभी का लेखा जोखा पलभर में प्रस्तुत हो जाता है  यह एक सत्य है  

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

हिमगिरी के सम्मुख यह निर्मम नाटक कैसा !

निस्तब्ध शून्य के नीचे यह कोलाहल सा कैसा !
अधिकार विकृत जीवन का स्वार्थ कैसा !
निरा  सा धुंवा  कर्तब्य का कैसा !
माँ  भारती !  अपहृता- अनादि योद्धा, हिमगिरी मौन साधे कैसा!
तिरोहित  मनः स्थिति  में, निर्निमेष अवलोक रहा  कैसा !
विक्षिप्त जीवन की व्यथा है, यह प्रलय का द्वार है कैसा!
छा रहा  हिमगिरी  के नेत्र पटल पर, अन्धकार सा कैसा!
शांत ! नीरव! पवन तपोभूमि थी यह ,
कुरुक्षेत्र सी रणभूमि, यहाँ कोलाहल सा कैसा!
हिंसा के गौरव कुंडली कुरुक्षेत्र के कौरव,
नवजात अभिमन्यु के लिए, धर्मव्यूह रचाया है कैसा!
सभी बन कर योद्धा, एक दूसरे की परछाई,
द्वेष, द्वंद्व, अनीति, घृणा पर सहज उतर आयी!
परन्तु ! न कर्ण वीर शेष हैं, दानव पन अभिशेष  है!
धर्मभीरु ! धर्मयुद्ध ! के लिए  यह कौरव नृत्य कैसा है!
निरपराध जन द्रोपदी ! चीर हरण अपमान को झेल रही है !
मौन खड़ी साधना में, सहायतार्थ कृष्ण को पुकार रही है!
या फिर स्तब्ध  खड़े हिमगिरी को, ढह जाने को कोस रही है !
पापंकी बना  दिया इस देश को कैसा !
अराजकता का आधुनिक दुर्योधन कैसा !
माँ भारती ! अश्रुपूरित नयनो का यह माणिक हार कैसा !
रुदित कंठ से भीरु  बने, धर्म पुजारी !
यह खंडित खेल, मौन निहारते मधु विहारी !
क्यों ?
अरे ! आदि पुरुष हिमगिरी के सम्मुख  यह निर्मम नाटक कैसा ! 


(कविता २१ फरवरी १९८४ को लुधियाना में लिखी  थी कितु प्रकाशित न करवा सका. संभतः मेरे तब का आशय और की आज  स्थिति  में समानता है )

आजा बचपन एक बार फिर

 सुभद्रा कुमारी चौहान  पंक्तियाँ  सार्थक  हैं - आजा बचपन  एक बार फिर .................


सोमवार, 24 जनवरी 2011

क्या छायावाद वापस आ रहा है ?

वैज्ञानिक विकास की   सघन छाया में पलता पोषता आधुनिक जीवन  और जीवन की विचारधारा  अतीव तीव्र है गति भी और सञ्चालन भी . इस खोजी युग में ना जाने कितने वैज्ञानिक जन्म ले रहे है प्रश्न का उत्तर कठिन है . ऐसे युग में  वैज्ञानिक दृष्टिकोण  से  अवलोकन करने पर  प्रतीत  होता है कि प्रायः नीरस साहित्य का  सृजन होगा .  यही एक क्रम प्रारंभ हुआ था जब छायाबाद   के उतरोत्तर कवि सभी प्रगतिवादी विचारधारा की कविताये व् अन्य साहित्य का सृजन करने लगे . स्वयं  सुमित्रानंदन पन्त उत्तर काल में   प्रगति वाद और मार्क्सवाद  से अछूते नहीं रहे . अर्थात धीरे धीरे छायावाद का पराभव हो गया.
   

कविता ने नए रूप में जन्म लिया . छंद मुक्त हुई, बंधन मुक्त हुई . गद्यात्मक पद्य की रचना  अपने यौवन पर इठलाने लगी . फली फूली और  एक रसदार कविता का पराभव भी हुआ . तत्पश्चात गद्य युक्त, छंद मुक्त, बंधनमुक्त, कवियों और कविताओं की बाढ़ सी आने लगी.  यही पता न लग  सके की कौन किस पद का स्वामी है. लगभग अलंकारो की बलि चढ़ा ही दी गयी.

पुस्तके छपती रही, पत्र पत्रिकाए  भी, साहित्य में  भी निरंतरता  बनी  रही,  परन्तु निरंतरता यदि भंग हुई तो  मेरी स्वयं की . पढ़ने की रूचि, काम  की बोझिल आद्रता, कार्य क्षेत्र  का  अरुचिकर  परिवेश .  सब कुछ से बाधित होता रहा . आर्थिकी भी एक कारण रहा . किन्तु यदा कदा समय मिलने पर कुछ संयोजन करते ही चले गए.
           पिछले एक डेढ़ वर्ष से ही सीधी तरह से इन्टरनेट का उपयोग कर रहा हूँ  इस उपयोग के माध्यम से ब्लॉग तक पंहुच बनायीं . यहाँ आकर अनेक विद्वानों की रचनाओं का रसास्वादन करने लगा . कल्पनातीत  है कि जिन व्यवसायिक कार्य क्षेत्र को साहित्य के लिए  मैं नीरस  समझता रहा  उसी क्षेत्र के लोग साहित्य सृजन में अनुपम योग दान कर रहे हैं.  जैसे  डॉक्टर , इंजिनियर  वैज्ञानिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति , ये सभी उच्च कोटि से , तल्लीन होकर अपने  इन कार्य क्षेत्रों के बाहर साहित्य में, कवितायेँ , लेख (सामाजिक, राजीनीतिक , और अध्यात्मिक जैसे विषयों ) कहानियां  आदि का निरंतर सृजन कर रहे हैं
         कवियों की तो बाढ़  सी आयी हुई है,  ब्लॉगजगत कवितामय हो गया है,   और इन कविताओं में भी प्रेम गीत गए जा रहे है.  अधिकांश कवि या कवियत्रियाँ पुरुष और नारी को ही माध्यम बनाकर, या मानवीयकरण कर छायावादी विचार धारा से ओतप्रोत  हैं. कोई झील , कोई गुलाब और कोई नारी कि जुल्फों को ही माध्यम बना  रहे है

कभी कुछ अधिकारिता के कारण पुरुष और नारी के विषय को संवेदन शील बना दिया जाता रहा परन्तु जब कविता उमड़ती  है तो  कलम ( कीबोर्ड  ) पर आधिपत्य  नहीं रह जाता और वह अनवरत अनायास ही प्रेम, प्यार ,  पारस्परिक संबंधों के विस्तार को कंठ मुक्त होकर  सोछोवास लिखने लगती है छंद रहित, बंधन रहित, छायावादी कविताओं  को, बिना ही अलंकारों के भी,  तो भी  अच्छी लगती है .
क्या हम पुनः छायावाद की   ओर मुड रहे हैं या  छायावाद वापस आ रहा है ?

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

हिमालय के अंतराल में छिपे कुछ दर्शनीय एवं पौराणिक स्थल

यों तो गढ़वाल ही नहीं अपितु सारे उत्तराखंड में तीर्थ स्थलों, मंदिरों एवं सुरम्य पर्यटक स्थलों की भरमार है । इस धरोहर के लिए भारत ही नहीं पूरे विश्व में प्रसिद्द है इसी कारण हजारों तीर्थ यात्री एवं पर्यटक उत्तराखंड पहुँचते हैं।
प्रायः लोग मुख्य स्थानों , बदरीनाथ केदारनाथ , नैनीताल, कौसानी, मसूरी, हरिद्वार, ऋषिकेश, एवं गंगोत्री यामोत्री धाम की ओर रुख करते हैं। जो हमेशा के लिए अपने दर्शकों का मन मोह लेते हैं। परन्तु कई छोटे छोटे व् दुर्गम तीर्थ एवं पौराणिक , पर्यटक स्थल हैं जिनसे स्थानीय लोगों के सिवाय बाहर की दुनिया अभी भी अनभिज्ञ हैं।
आइये ऐसे ही कुछ स्थलों से आपका परिचय कराता हूँ :-

त्रिकुटी सरोवर ( तारा कुण्ड) - उत्तराखंड में कमलेश्वर ( पौड़ी गढ़वाल ) से लेकर बागेश्वर (कुमांऊ) तक फैला हुआ राष्ट्रकूट नामक पर्वत श्रृखला है । इस पर त्रिकुट नामक श्रेणी है । इस श्रेणी पर अकल्पनीय एक सुन्दर जलाशय एवं शिव मंदिर है जिसे तारकुंड या त्रिकुटी सरोवर भी कहते हैं। विरानेश्वर( विन्देश्वर या बिनसर ) भी इसी पर्वत श्रृखला पर स्थित है। इसका वर्णन स्कन्द पुराण में भी उपलब्ध है। लोगों के मतानुसार इस क्षेत्र का नाम राठ भी इसी पर्वत के नाम का विकृत रूप है।

तारा कुण्ड पौड़ी से लगभग ६० से ७० किलो मीटर की दूरी समुद्र ताल से १६०० मीटर की उचाई पर पट्टी धैज्युली ग्राम बडेथ के ठीक ऊपर चोटी पर स्थित है। यहाँ तक पहुचने के लिए पौड़ी से पैठाणी-चाकिसैन तक मोटर मार्ग तथा चकिसैन से पैदल सीधी खड़ी चढ़ाई लगभग ७- ८ किलोमीटर । चाकिसैन समुद्र तल से लगभग १५३० मी की उचाई पर स्थित है । दूसरा मार्ग पैठाणी से मोटर मार्ग होता हुआ सिर्तोली , पल्ली होते हुए ठीक बडेथ गाँव तक पहुंचा जा सकता है।
इस शिखर पर एक शिव मंदिर एवं सुन्दर जलाशय व् एक कुंवा है जिसकी गहराई १०-१२। मी बताई जाती है इस शिखर से दोनों ओर के सभी गाँव दृष्टिगोचर होते हैं। इतनी ऊँचाई पर होने के बावजूद पानी की उपलब्धता , एक तालाब और कुण्ड के रूप में अकल्पनीय लगती है। परन्तु यहाँ हर मौषम में पूरे साल पानी उपलब्ध रहता है।
भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी एवं phalgun शिवरात्रि पर मेले के आयोजन भी होता है। कृष्ण जन्माष्टमी पर इस सरोवर में प्रायः नील कमल खिले रहते हैं मन भावनी बरसात की हरियाली और वसंत पर खिलते लाल बुरांश इन मेलों की शोभा पर चार चाँद लगा देते हैं प्रकृति का यह मनोरम दृश्य बरबस मन को मोह लेता है।
मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक छोटी से गुफा नुमा सुरंग सी है कुछ वर्ष पहले यहं एक योगिनी रहा करती थी जब श्रद्धालु गुफा के आगे चावल या भेट स्वरूप पैसे रखते थे तो तो चूहे आकर वस्तुओं को उठाकर योगिनी तक ले जाते थे ऐसा योगिनी स्वयं बताती थी
किंवदंतियों के अनुसार भागीरथ जब आकाश मार्ग से गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास कर रहे थे कुछ छोटी सी जल धारा यहाँ पर पदार्पित हुई और और पानी का बहाव इतना तेज था किआज भी नीचे के गांवों ( ऐन्गार , कुटकांडई,) में स्पष्ट दिखाई देता है कि कभी यहाँ बढ़ जैसी आपदा आयी होगी बड़े बड़े शिलाखंड इस बात कि ओर कुछ तो इशारा करते हैं ।
कुटकांडई महदेव के ठीक ऊपर एक बहुत बड़ा शिलाखंड है जो दूर से देखने पर शीघ्र गिर जाने कि संभावना प्रतीत होती है कई वर्षोंसे यह एक छोटे पत्थर की ओट पर टिका हुआ है।
तारा कुण्ड की विशेषता तालाब और कुण्ड के पानी की है । बरसात में प्रायः तालाब का पानी गन्दा हो जाता है किन्तु साथ में ही कुण्ड का पानी बिलकुल स्वच्छ रहता है। कुण्ड के पानी को लोग गंगा जल की तरह घरों को लेकर जाते हैं निकासी के रूप में कुण्ड का पानी दो श्रोतो से कोटेश्वर( कुट कांडई ) महादेव तथा राहू के मंदिर पैठाणी में निकलता है।

राहू का मंदिर - त्रिकुट पर्वत की घाटी में , श्योलिगड़( रथ वाहिनी) एवं पश्चिमी नयार ( नवालिका ) के पुनीत संगम पर पैठाणी गाँव स्थित है। यहाँ पर राहू का मंदिर है । कुछ लोगों के मतानुसार यह मंदिर पांडवों तथा कुछ शंकराचार्य द्वारा निर्मित बताते है। इस मंदिर की उपरी शिखा कुछ झुकी हुई प्रतीत होती है। इस स्थान का नाम पैठाणी राहू के गोत्र पैठानासी के कारण पड़ा । "राठेनापुरादेभव पैठानासी गोत्र राहो इहागच्छेदनिष्ठ " और राहू के मंदिर के कारण संभवतः इस समूचे क्षेत्र का नाम राठ पड़ा । यहाँ के लोग पहले काले वस्त्र पहना करते थे चूँकि राहू को काले वस्तुए एवं वस्त्र पसंद है इसीलिए संभवतः काले वस्त्र प्रचलन में आये हों ।

पौड़ी से पैठाणी की दूरी लगभग ५०की मी है यहाँ तक सीधे मोटर मार्ग उपलब्ध है। मंदिर का निर्माण काल तथा बनावट के निश्चय हेतु पुरातत्वा वेताओं का अध्यन आवश्यक है। फिलहाल यह मदिर भारतीय पुरातत्वा विभाग के संरक्षण में है। सरकार को चाहिए ऐसे स्थलों की ओर ध्यान देकर उनका पुनरुधार तथा संदार्यी करण एवं विकास करना चाहिए।


शिन्गोड़-इसी राष्ट्रकूट पर्वत श्रृखला पर दूधातोली वन प्रखंड में शिन्गोड़ नामक स्थान है। जिसे रिस्ती की भरवाडी भी कहते है रिस्ती रथ क्षेत्र का आखिरी गाँव है। चाकी सैन से रिस्ती की दूरी लगभर ३५-४० कि मी
है। यहं के लिए माना जाता है कि रामायण कालीन महर्षि श्रृंग का आश्रम है यह क्षेत्र प्राकृतिक सम्पदा एवं सुन्दरता के लिए अलोकिक रूप से धनी है।

स्कन्द पुराण के अनुसार इस आश्रम के पास से ही वहां की तीन प्रमुख नदियों का उदगम स्थल है।ये नदियाँ रथवाहिनी , नावालिका , तथा व्यास गंगा कहलाती हैं । रथ वाहिनी ( स्योलिगड़ ) तथा नावालिका ( पश्चिमी नयार ) दोनों पैठाणी में संगम करती हैं तथा ये दोनों मिलकर व्यास गंगा( पूर्वी नयार) के साथ सतपुली संगम करते हैं ।
इस क्षेत्र में अन्न और दूध, घी तथा शहद कि प्रचुरता पाई जाती है।

इतने पौराणिक स्थलों एवं प्राकृतिक सुन्दरता की अनुपम छटा लिए हुए होने पर भी ये सभी स्थान विकास की गति से दूर हैं यदि यहाँ पर सुविधाएं एवं संरक्षण सरकार द्वारा प्रदान किया जाय तो ये सभी स्थल पर्यटन और तीर्थ के रूप में उभर सकते हैं। इन स्थानों पर पर्याप्त शोध की आवश्यकता है। जिससे पर्यटन में नया अध्याय जुड़ सके ।

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नव वर्ष की शुभकामनाये


सभी ब्लागरों , पाठकों,  लेखकों  व् नागरिकों,  को  सहृदय, नव आगंतुक वर्ष के लिए,  हार्दिक  शुभ कामनाएं ,

.आशा करता हूँ कि सभी के लिए नव वर्ष में अपार हर्ष और खुशियाँ  आयें  आपका लेखन दिनोदिन मर्म और जीवंत हो उठे जिससे समाज और देश का  गौरव बढ़ सके .
 इस सन्देश को पढने तक संभवतः नव वर्ष आपकी दहलीज पार करचुका होगा !

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

शिक्षा सभी के लिए , सभी के द्वारा ,सामान्य रूप से पोषित हो

भारत सरकार ने बुनियादी रूप से शिक्षा के लिए कानून तो बना लिया किन्तु इस कानून का हस्र इस तरह भयावह हो जायेगा शायद कल्पना  नहीं की होगी . आजकल दिल्ली  के स्कूलों में  भारी गहमागहमी बनी हुई है दिल्ली की सरकार  ने प्रवेश की छूट तो उन्हें  दे दी किन्तु मनमानी के लिए पूरी लगाम हाथ में रखी हुई है या यों कहे की मिल बाँट की बंदर बाँट होने जा रही  है. सभी समाचार पत्र इन दिनों  नर्सरी प्रवेश की सुर्खियाँ बनाने में लगे हुये हैं.

इन नौ निहालों को स्कूल भेजना , पढाना,  टेढ़ी खीर होती जा रही है कभी तो जमाना था लोगो को पढ़ने से लाभ नहीं दिखाई देता  था  और अब लोगो की जरूरत बनी , जागरूकता के कारण , तो शिक्षा दो कदम दूर होती जा रही  है. माध्यम वर्गीय लोगों के लिए तो  आज शिक्षा  दूभर बन गयी है  शिक्षा एक अभिशाप्प की तरह पनप रही है  जब कि कभी  अशिक्षा अभिशाप का पर्याय  हुआ करती थी .
प्राइवेट स्कूलों में फ़ीस की मात्रा इतनी  अधिक है  कि हर व्यक्ति इसे  वहन करने में  समर्थ नहीं है सरकारी स्कूलों  की हालत बदतर बनी हुई है  यहाँ तो माद्यम  और धनाड्य वर्ग के बीच एक बड़ी लाइन खींचती  हुई  दृष्टिगोचर होती है  पूंजीवादी वर्ग अपने हितों के आगे सभी का शोषण इस तरह कर देना चाहता है कि पुनः कोई भी शिक्षा के लिए किसी स्कूल को खोजना बंद कर दे . सरकारें   इन लोगों कि बंधक बनती जा रही हैं.  और ये स्कूल सरकार  को ब्लाक्मैल करने पर तुले हुए है.
प्रवेश की इतनी जटिल प्रक्रिया  बन गयी है  कि विश्वविद्यालयों व् M B A 's की CAT ,MAT  XAT आदि  प्रवेश परीक्षाएं भी कमतर लग रही हैं  कितने  ही वर्ग उसमे बने है एक नया वर्ग पैदा हुआ है अलुमिनी . ना जाने इन सब के पीछे लूट का मकसद है या फिर  कानून को विफल करने की  सफल कोशिश . नर्सरी  की फीस  प्रति वर्ष ३००००/ से लेकर १०००००/ और इससे भी ज्यादा हो सकती है
गरीब के बच्चों के कोटे में प्रवेश पर समर्थ व्यक्ति से फ़ीस वसूलने  का फार्मूला  भी गजब ढा रहा है.  गरीब की परिभाषा भी परिभाषित  नहीं है   अर्थात गरीब के नाम पर अमीर के बच्चों को ही  प्रवेश की चाल स्पष्ट दिखाई दे रही है, पोईन्ट्स, और लाटरी के शिष्टम, दोनों में अंतर  किया जा रहा है हर स्कूल अपने मन मफिग पॉइंट्स  या लाटरी शिष्टम अपना  रहा है हित स्कूल का ही साधा  जा रहा है
इतनी जटिलताये  उन बच्चों के लिए जिन्होंने अभी पूरी तरह से आंख भी ना खोली है जिनके प्रकृति के साथ अठखेलियाँ करने के दिन है क्यों उन्ही के लिए इस तरह की जटिलताएं पनप रही है. समाज और सरकार,इन बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करके,  .   क्या प्राप्त करना चाहती है ?
इतनी जटिलताओं में घिरने के बजाय तो इन्हें सीधी MBA प्रवेश की पात्रता क्यों ना दी जाय  ताकि बड़े होने पर पुनः M B A के लिए पात्रता ना हाशिल करनी पढ़े ?  शिक्षा मूल अधिकार है उसे हर व्यक्ति और बच्चे के लिए उपलब्ध होना  चाहिए  उसके दरवाजे तक .  धन की कीमत पर शिक्षा  की दुकानदारी ने सभी मूल्यों को चौपट कर दिया है. समाज की विकृतियाँ , बेरोजगारी . इस अवमूल्यन की प्रमुख देन हैं .  शिक्षा सभी के लिए , सभी के द्वारा ,सामान्य रूप से पोषित हो .  तभी समाज का समुचित विकास संभव है 

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

बुन्खाल में काली की पूजा और पशु संहार

          सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके , शरण्यं त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते .
उत्तराखंड देव भूमि कहलाती है  तमाम देवी देवताओं का निवास स्थल है उत्तराखंड . मान्यताएं  और आस्था का अनुपमन संगम .
प्राकृतिक सुन्दरता और वैभव से सुसज्जित .  किन्तु इसके साथ हैं कुछ अभिशप्त करने वाली आस्थाएं  जैसे विभिन्न  देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए की गयी पशु बलि मनोतियां .
पशु बलि वंहा पर अक्षर सभी देवी देवताओं को चढ़ाई जाती है किन्तु  माँ काली  के सम्मुख तो असंख्य पशुओं को एक साथ निर्मम संहार होता है  माँ काली का प्रभाव तो सबसे अधिक  पशिचिमी बंगाल में  था  परन्तु आज वहां  पर बलि प्रथा समाप्त हो चुकी है.  प्रतीकात्मक बलि तो आज भी  दी जाती है पशु हत्या पर रोक लग चुकी है. . उत्तराखंड ने  अभी भी इस प्रथा को कायम रखा   है.
गढ़वाल क्षेत्र में,   बुन्खाल  में  काली माँ  का  थाल है  यहाँ पर हर वर्ष मार्गशीर्ष  के महीने में  भव्य मेला लगता है   दूर दूर  तक  के लोग यहं मेला देखने,  अपनी मनोती मनाने और पूर्ण हुई   मनोती की पूर्णाहुति देने पहुँचते  हैं .
घटना कुछ सत्य बातों पर आधारित है,  उनिस्व्वी शताब्दी के  उतरार्ध में  किसी  समय कुछ  गाँव के बच्चे   इन खेतों के पास गाय बछियों  के साथ खेलते रहे  किसी विवाद या खेल के कारण  इन बच्चों ने किसी  लड़की  को  गढ़े में   गाढ़ दिया  और सारे बच्चे घर चले गए किन्तु उस लड़की को बाहर निकालना भूल गए फलस्वरूप उसकी म्रत्यु  हो गयी  जब घर में खोज की गयी    तो उसका कही पता नहीं चला . कहते है उस  लड़की ने अपनी माँ को सपने में अपने मरने की व्यथा  सुनाई और ये भी कहा की मुझे वहां से मत निकालना  मैं  देवी के रूप में परवर्तित हो चुकी हूँ .  कहते है  कभी देर  रात्रि तक जो लोग घर नहीं पहुँच पाते थे  या किसी प्रकार का खतरा होता था तो वह आवाज देकर उन्हें सचेत करती थी  जंगली जानवरों से , लुटेरों डाकुओं  आदि खतरों से स्थानीय लोगो को सचेत करती रहती थी . सचेत ही नहीं सुरक्षा भी करती थी
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गढ़वाल में गोरखे आततायी बन कर आये  इसी समय  गढ़वाल की सुरक्षा के लिए गढ़वाल नरेश ने ब्रिटिश शासन  से मदद मांगी थी .  उस समय भी काली  ने  लोगों  को सुरक्षा के लिए  सचेत किया था  उसकी आवाज गोरखों  के कानो में पड़ी और उन्होंने उसे गढ़े  से निकालकर उसी गढ़े में उल्टा गाढ़ दिया  तब से उसकी आवाजे लगनी बंद हो गयी .
इसी महत्व  के कारण यहाँ  पर प्रारंभ से ही मेला लगता रहा  और  पशु बलिया होती चली आ रही हैं. सैकणों निरीह भैसा ( बागी) और मेढ़ो (खाडू) की बालियाँ दी  जारही हैं.
कुछ समय से प्रशासन यहाँ  लोगों को चेतावनियाँ  देता आ रहा था  कई बार पुलिस बल तैनात भी किये गए कितुं आस्था का सैलाब पुलिस और प्रशासन को बौना कर देता और वे सिर्फ मेले के दर्शक बन कर रह जाते . सुना  है इस बार प्रशासन  ने पहले ही इसके लिए कुछ व्यवस्था बनाई  और किसी सीमा  तक  सफलता भी प्राप्त की  अर्थात कुछ लोगो ने प्रशासन के रुख को देखते हुए अपने कार्यकर्म या   रद्द कर दिए   या उन में परिवर्तन  किया  जो लोग  पशुओं को लेकर वहां पहुचे  उन्हें रोका तो  नहीं  कितु उन्हें परंपरागत  तरीके से बलि देने में परेशानी हुई क्योंकि मुख्य हन्ता ( जो सबसे पहले पशु पर तलवार आंशिक रूप से चलाता  है)  भी अनुपस्थित  रहे .
खबर है की  अब प्रशासन उन पर मुकदमें चलाने की फिराक में है.  अन्ततोगत्वा अब लोग भी धीरे  धीरे  जागरूक होते जा रहे हैं . इस सारी सफलता  के लिए स्थानीय  गाँव के लोग ही स्वयं आगे आये  आशा है भविष्य में इस पर पूरी तरह से रोक लग सके  कानूनी रोक जरूरी नहीं है लोगो की जागृत भावना इस दिशा में काम करे त्तभी सफलता  मिलेगी . बुन्खाल का तो मात्र जिक्र है ऐसी कई जगहे है जहा पर सामूहिक रूप से  इस तरह की  पशु  बलि का आयोजन होता है. और लोग अपने स्वार्थ को सिद्ध करते पाए जाते हैं.
मां काली उन्हें सद बुद्धि प्रदान  करे   और इन पशुओं की अभिवृद्धि  हो सके  जो अब इन बालियों के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं.