गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

तुम मौन क्यों !


गूगल से साभार


भारत जननी के गौरव हे पर्वत राज !
हे शत युग-युग के इतिहास,
तुम देख रहे हो स्वयं काल काल का राज !                                                
क्यों रो नहीं उठते, मौन क्यों खड़े तुम आज! 
जब प्रवाहित थी गंगा में पावनता,
थी राजश्री पर सुशोभित मानवता,
सद्य  लुप्त हुए सब राष्ट्र देवता,
मानवता लुप्त हुई, अब जागृत है दानवता .


तब देश सौख्य शांति, सम्प्रदाय से  भरपूर,
परहित परसेवा था लक्ष्य सबका अटूट .
वृद्धि सिद्धि होती थी तब पूर्ण,
पर आज यह पथ हो गए  हैं, खंडित भग्न चूर्ण !
अये शत पुरुष! भारत संरक्षक !
बढ़ रहे अत्याचार तेरे अंक पर,
खोकर सब अपनी समृद्धि महान !
बसते है अब यहाँ राष्ट्र भक्षक, करते तेरा अपमान 

पीढितहै असह्य वेदना से भारत जननी का जनजन .
भ्रष्टाचार राजसत्ता को कर रहा नष्ट,
स्वार्थ यों ही लड़ कर बने हैं तप्त,
दूषित बह रहा इसका रक्त !
करो ध्वनित अपने श्रृंगों से वेणु या शंख !
पथ भूल रहे हैं ये सब सत्ता के रंक .

करो आज इन्हीं का पथ प्रदर्शन !
इस देश काल काया में करो फिर से परिवर्तन !
अरे हिमगिरि विराट ! देख रहा  तू यह नृत्य नग्न 
फिर भी समाधि लगाये  मग्न !
क्या तेरे हृदय में ज्वाला अब शेष नहीं ?
या तेरे नयनो में दृष्टि का समावेश नहीं ?

चलाओ प्रगति का तुम अप्रतिम  अभियान 
करो फिर, अपना शिरसा बलिदान .
राजनीति   से बनी समस्या जटिल महान,
अब खोजो ! तुम इसका हल निदान !

हिमालय ! पुनः सुना अपनी अमर कहानी 
युग इतिहासों में जो कभी थी भारत की समृद्धि की निशानी 
स्मृति दिलाओ  तुम! फिर जन्म ले जैसे चन्द्रगुप्त  महान !
या फिर स्वयं अवतार बनो तुम हरने को जनमानस - त्राहि -त्राण!
अब  तो प्रगति का  अभियान चलाना है 
तम्हें मौन नहीं प्रवक्ता बनना है !
हे मेरे हिमगिरि विराट!




प्रकाशित  "हिलांश" मुंबई से  मार्च १९८१  
इस कविता को १९७८-७९ के समय लिखा था तब जनता पार्टी की सरकार थी शाह आयोग बैठा था कुछ ऐसी ही स्थितियां थी तब भ्रष्टाचार की . यही पहली कविता थी जो किसी संपादक ने स्वीकार  की थी,  किन्तु प्रकाशित १९८१ में मुंबई से हुई थी यह मेरी पहली प्रकाशित  रचना है

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

ढोल और ढोल सागर - लुप्त होती उतराखंड की लोक कला

ढोल और दमाओं
संगीत और नृत्य  दोनों के लिए वाद्य यंत्रों की आवश्यकता मनुष्य की सदा से बनी रही है. इसीलिए समयानुकूल तरह तरह  के वाद्य यंत्रों का अविष्कार  होता रहा। कुछ यंत्र तो सामयिक रूप से अवतरित होते रहे, किन्तु कुछ पारंपरिक रूप से दीर्घावधि में ज्यों के त्यों बने रहे। उनके स्वरूप और प्रयोग में विशेष परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ। उन्हीं में से एक यन्त्र है ढोल। जिसके स्वरुप और प्रयोग में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई दिया।

ढोल  की थाप पर मनुष्य के तो पैर थिरकते ही हैं, किन्तु स्वर्ग से सोते हुए देवी , देवता और अप्सराये  भी धरा पर थिरकने को मजबूर हो जाती हैं। एक थाप पर  अनेको लोग देव रूप धारण कर लेते हैं, और  एक गलत थाप पर न जाने कौन सी  आपदा आ पड़े  कोई नहीं जानता।

ढोल बजाने की  कई विधियां  हैं कई ताल हैं। इस पर पूरा ढोल सागर लिखा गया है, ढोल सागर का मूल संकलन पंडित ब्रह्मानंद थपलियाल ने १९१३ से आरंभ कर श्री बद्रिकेदारेश्वर प्रेस  पौड़ी गढ़वाल से १९३२ में प्रकाशित किया था। तत्पश्चात श्री अबोध बंधू बहुगुणा ने इसे आदि गद्य के नाम  से "गाड मेटी गंगा" में प्रकाशित  किया। तथा एक ढोल वादक शिल्पकार केशव अनुरागी ने महान संत  गोरख  नाथ के दार्शनिक सिद्धांतों  के आधार पर विस्तृत व्यख्या एवं संगीतमय लिपि का प्रचार प्रसार भी किया। केशव अनुरागी के विषय में मंगलेश डबराल लिखते हैं :-

  ढोल एक समुद्र है साहब केशव अनुरागी कहता था,
  इसके बीसियों  ताल  और सैकड़ों सबद , अरे कई तो मर खप गए पुरखों की तरह,
  फिर भी संसार में आने जाने  अलग अलग ताल साल,
  लोग कहते हैं केशव अनुरागी ढोल के भीतर रहता है.
,
स्व शिवा नन्द नौटियाल, उत्तर प्रदेश के पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री  जिन्होंने ढोल सागर के कई छंदों को गढ़वाल के नृत्य-गीत पुस्तक में सम्पूर्ण स्थान दिया, एवम   बरसुड़ी  के डा विष्णुदत्त कुकरेती एवम डा विजय दास ने भी ढोल सागर की समुचित  व्याख्या की है ।
प्रारंभिक जानकारियों के अनुसार ढोल की उत्पति और वाद्य  शैली पर शिव और पार्वती के बीच एक लम्बा संवाद होता है। प्राय उत्तराखंड में जब भी किसी शुभ या अशुभ अवसर पर ढोल वादन होता है तो ढोली (ढोल वादक) के मुख से इस सवांद का गायन मुखरित होता है।

ढोल सागर में पृथ्वी संरचना के नौ खंड सात द्वीप और नौ मंडल का वर्णन व्याप्त है। ढोल ताम्र जडित, चर्म पूड़ से मुडाया जाता है। ढोल की उत्पति के बारे में ढोल सागर कहता है " अरे आवजी ढोल किले ढोल्य़ा   किले बटोल्य़ा किले ढोल गड़ायो किने  ढोल मुडाया , कीने ढोल ऊपरी कंदोटी चढाया अरेगुनी जनं ढोलइश्वर ने ढोल्य़ा पारबती ने बटोल्या विष्णु नारायण जी गड़ाया चारेजुग ढोल मुडाया ब्रह्मा जी ढोलउपरी कंदोटी चढाया इ"आगे कहते है " श्री इश्वरोवाच I I अरे आवजी कहो ढोलीढोल  का मूलं कहाँ ढोली ढोल कको शाखा कहाँ ढोली ढोली का पेट कहाँ ढोली ढोल का आंखा II श्री पारबत्युवाच II  अरे आवजी उत्तर ढोलीढोल का मूलं पश्चिम ढोली ढोल का शाखा दक्षिण ढोल ढोली का पेट पूरब ढोल ढोली का आंखा I "।
ढोल सागर में  वर्णित है ढोल शिव पुत्र है, डोरीका ब्रह्मा पुत्र ,पूड़ विष्णु  पुत्र, कुण्डलिया नाग पुत्र, कन्दोतिका कुरु पुत्र, गुनिजन पुत्र कसणिका, शब्दध्वनि  आरंभ पुत्र, और भीम पुत्र गजाबल।  

ढोल की भाषा का आदि उत्पति अक्षर भी " अरे आवजी शारदा उतपति अक्षर प्रकाश I I  अ ई उ रि ल्रि ए औ ह य व त ल गं म ण न झ घ ढ ध  ज ब ग ड द क प श ष स इति अक्षर प्रकाशम I  इश्वरो वाच I I " ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार पाणिनि के व्याकरण  के आरंभ सूत्र जो कि शिव डमरू से उत्पन्न हुए ।   जब ढोली ढोल को कसता है  तो शब्द त्रिणि त्रिणि ता ता ता ठन ठन, तीसरी बार कसने पर त्रि ति तो कनाथच त्रिणि  ता ता धी धिग ल़ा धी जल धिग ल़ा ता ता के रूप में बज उठता है  इसी तरह बारह बार ढोल को कसने की प्रक्रिया होती है और भिन्न भिन्न ध्वनिया गूंज  उठती हैं।

ढोल सुख, दुःख और पूजा सभी कार्यों में  बजता है उतराई, चढाई, स्वागत प्रस्थान,  आरंभ और समापन सभी के लिए अलग अलग ताल और सबद हैं। ढोली की पांच अंगुलियाँ  और हथेली और दुसरे हाथ से डंडे, जब ढोल पर थाप देते हैं तो भगवन शंकर  कहते हैं "  अरे आवजी प्रथमे अंगुळी में ब्रण बाजती I  दूसरी अंगुली मूल बाजन्ती I तीसरी अंगुली अबदी बाजंती I चतुर्थ अंगुली ठन ठन ठन करती I झपटि झपटि बाजि अंगुसटिका  I  धूम धाम बजे गजाबलम I  पारबत्यु वाच I  अरे आवजी दस दिसा को ढोल बजाई तो I पूरब तो खूंटम . दसतो त्रि भुवनं . नामाम गता नवधम  तवतम ता ता तानम तो ता ता दिनी ता दिगी ता धिग ता दिशा शब्दम प्रक्रित्रित्ता . पूरब दिसा को सुन्दरिका  I बार सुंदरी नाम ढोल बजायिते  I  उत्तर दिसा दिगनी ता ता ता नन्ता झे झे नन्ता उत्तर दिसा को सूत्रिका बीर उत्तर दिसा नमस्तुत्ये I इति उत्तर दिसा शब्द बजायिते I "।

मेरी जानकारी के अनुसार संभवतः किसी भी वाद्य यन्त्र के लिए इतना बड़ा साहित्य न होगा  किन्तु आज इस लोक कला की मृत्यु होती जा रही है जिस ढोल की थाप पर  देवता  और अप्सराएं  थिरकती हों उसी ढोल की  एक गलत ताल या सबद पर आसुरी शक्तियां जाग उठती हैं  जिसे स्थानीय भाषा में वयाल फैलना  कहा जाता है। इसे रोक पाने के लिए अच्छे जानकर ढोली की आवश्यकता होती है नहीं तो अनिष्ट ही सन्निकट होता है। ढोली एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर बजते ढोल - ढोली के साथ भी अपना संवाद स्थापित  करता है.   
आज इस परम्परा  से जुड़े लोग, इस लोक कला से विमुख होते चले गए, कारण कुछ सरकारी नीतियाँ  और पढ़ लिख जाना  रहा  है. क्योंकि इस व्यवसाय से  अनुसूचित जाति के लोग जुड़े हुए थे. जो थोड़े  बहुत बचे हैं  उनमे जानकारियों  की भारी कमियां  हैं ।
  हेमवती ननद बहुगुणा  गढ़वाल विश्व विद्यालय श्रीनगर   के  लोक संस्कृति विभाग  के डारेक्टर श्री डी आर पुरोहित इस कला को बचाने के लिए सक्रिय  हैं। इन्ही के सौजन्य से अमेरिका के सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के प्रो स्टीफन सियोल की मुलाकात टिहरी के  एक ढोल वादक सोहन लाल सैनी से हुई. उसकी बाजीगरी को देखते ही स्टीफन स्वयम उनसे प्रेरित हो ढोल बजाना सीखने लगे। परिणाम तह स्टीफन ने सोहन लाल को सिनसिनाटी  में ढोल सिखाने के लिए विजिटिंग  प्रोफ़ेसर के तौर पर अमेरिका आमंत्रित  किया। मुश्किल से छठी क्लास पढ़े हुए सोहन लाल के लिए तो गौरव की बात थी। किन्तु उत्तराखंड और भारत के लिए भी गर्व का विषय है,  और अब उत्तराखंड का ढोल अमेरिका में भी गूंज उठा .




सौजन्य (सामग्री संग्रह)- भीष्म कुकरेती   ( सेक्रेट्स ऑफ़ ढोल सागर )
चित्र - गूगल से साभार
( लम्बे समय से नेट से अनुपस्थित  रहने  के कारण न तो ब्लागरों से संपर्क रहा और न ही कोई नयी पोस्ट )

सोमवार, 1 अगस्त 2011

" माँ भैषी पाप शंकी"

प्रायः देखने में आता है कि जब आप किसी प्रिय कि प्रतीक्षा करते है तो जैसे जैसे समय बीतता चला  जाता है, उसी गति से आपका हृदय भी धडकने लगता है .  प्रिय व्यक्ति आपका चेहेता बेटा, बेटी हो सकती है, पति, या पत्नी, भाई या बहिन, अथवा प्रेमी और प्रेमिका, इनमे कोई भी हो सकता है. प्रतीक्षा रत व्यक्ति के चेहरे के हाव भाव प्रतिक्षण बदलते रहते हैं. समय बीतता चला जाता है और आप उद्वेलित होते रहते है. मेरे प्रिय अभी तक क्यों नहीं पहुंचा, अनेको कारणों की सूची मन में बनती रहती है कि फलां कारण से  प्रिय बिलम्बित हो सकता है, नहीं नहीं  ऐसा   नहीं हो सकता, पहुँचाने ही वाला/ वाली होगा/ होगी. कई आशंकायें  घर करने लगती हैं . 
      अनिष्ट की शंकाए बढ़ने लगती हैं. व्यग्रता  पराकाष्ठा  को पहुँच जाती है . रक्त चाप भी घटने बढ़ने लगता है. और यही क्रम तब तक जारी रहता है  जब तक आपका प्रिय व्यक्ति आप तक नहीं पहुँच जाता. और यदि प्रिय की उपस्थिति अपरिहार्य हो गयी तो सन्देश तक न जाने कितने ही अनिष्टकारी, अमंगलकारी बातों को मन में समां लेते  हैं. 
जब आप किसी भी व्यक्ति से  अत्यधिक भावनात्मक  लगाव रखते हों तो उससे प्रेम की भी गहराई भी उतनी ही अधिक हो जाती है. जैसे पिता अपनी बेटी से असीम प्यार करते है यदि बेटी प्रेम संबंधो को सफल बनाने  के लिए प्रेमी के संग भाग जाने में सफल हो जाती है, तो पिता की व्यग्रता और चिंता, प्रतीक्षा रत आंखे, कई अमंगल की आशंकाओ  से घिर जाते हैं. यही पर कभी कभी व्यक्ति अप्रिय समाचारों का सामना ठीक से न कर पाने के बाद, धैर्य के टूटने पर,  हिंसक और उन्मादी भी बन जाते हैं. उन्हें अपने प्रिय का दूर होना  बिलकुल भी अच्छा  नहीं लगता.
 तो तब प्रेमिका की क्या स्थिति होती होगी, जब प्रेमी किन्ही अपरिहार्य कारणों से प्रेमिका तक नहीं पहुँच पाता है. या मुड कर ही उस ओर न जाय तो  प्रेमिका बिना किसी सन्देश के भी किन किन आशंकाओं  को जन्म देती होगी. बड़ा दुष्कर कार्य लगता है. या कोई बीमार हो जाता है तो उसके ठीक होने तक का समय दिल को अधीर कर देता है.
 अभिज्ञान शाकुंतलम में इसी तरह का वर्णन महा कवि काली दास ने भी  शकुंतला के बारे में किया जब राजा दुष्यंत लौट कर नहीं आते. तब कालिदास को लिखना पड़ा था " माँ भैषी  पाप शंकी" . यानि युगों युगों से  ही प्रेम की दूरी पर सभी के  मस्तिष्क में अमंगल के ज्वार आते रहते हैं. . बचपन में जब हम स्कूल से, या कभी जंगल से  देर से घर पहुँचते थे  तो मेरी माँ सायंकालीन समय पर  घर के  आंगन में बैठ प्रतीक्षा रत रहती और बाद में बताती मेरे दिमाग  में न जाने कितनी गालिया निकल रही थी  यानि अमंगल ही अमंगल  की आशंका.

   आखिर हम आशंकित रहते हुए इतना  प्यार    क्यों करते हैं . मानव स्वभाव मानव के प्रति  संवेदन शील तो है ही किन्तु  वह तो अपने पालतू जीव जंतु  के प्रति भी उतना ही संवेदन शील होता है.  और इसी संवेदन शीलता के कारण  मनुष्य प्रेम की पींगे बढाता है.      अपनी व्यग्रता को , अपने रक्त चाप को बढाता चला जाता है.  और अधिक संभव है कि यही  एक कारण हो मनुष्य के विश्व बधुत्व कि ओर बढ़ना. 


शुक्रवार, 24 जून 2011

अनुशासन की कीमत - अपराध बोध

अनुशासन  मनुष्य के जीवन के  लिए  महत्व पूर्ण   है  अनुशासन को बनाये  रखने के लिए व्यक्ति तरह तरह  के यत्न करता रहता है  कभी इसे बनाये  रखने के लिए अनुशासन तोड़ता भी है . और न जाने किस किस को कितनी सजा देता है  इसकी कोई मानक सीमा तय नहीं है,  कभी स्वयंम को , तो कभी  बच्चों को, कभी समाज के किसी वर्ग को, या अपने अधीनस्थ  व्यक्ति को, कही न कही अनुशासन का डंडा चलता रहता है. हमें ये भी न पता चलता की सजा किसे, क्यों और कितनी दी जा रही है, चाहे इसके आगे बच्चे ही क्यों न हों. परन्तु अनुशासन शब्द ही ऐसा है  झेलना पड़ता है. इस शब्द की परिधि में जो आता है बच नहीं पाता है. और कई बार तो सजा देने वाला इस सजा के नाम पर स्वयंम अपराध कर बैठता है . जब पता चलता तब तक देर हो चुकी होती है, तत्पश्चात स्वविवेकी मनुष्य के पास शेष रहता सिर्फ अपराध बोध .  

अभी अभी ब्लाग पर मोनिका शर्मा का एक लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने बच्चों पर होने वाले दंडात्मक कार्यवाहियों    का विश्लेषण किया है.  ये सारे काम लगभग सभी  अभिभावक,   अनुशासित होने के दंभ पर, यदा  कदा कर ही जाते है . पहले की पीढियां  भी करती आई  हैं, और आज की भी  जारी  रखे हुए है किन्तु आगे कुछ परिवर्तन की आशा बनी हुई दिखाई देती है.
 अरस्तु ने लिखा था बच्चे पर अपनी अभिलाषा मत थोपिए उसे छोड़  दीजिये और स्वयं ही उसके अंदर का मनुष्य विकसित  होकर बाहर निकलेगा. किन्तु हम है की पैदा होते ही उसे बड़ा देखने लगते है थोपने लगते है अपनी  आकांक्षाएं और फिर हो  शरू हो जाता है सजाओं का दौर, घर में, स्कूल में, खेलते पढ़ते,  और बोलते हुए अनुशासन के नाम पर.

इन सजाओं के बाद जो अपराध बोध होता है वह अति विकट होता है  बजाय कि सजा देने के बाद मिली ख़ुशी के.  मैं स्वयम इस अपराध बोध का शिकार हूँ . कई बार तो सोचने के बाद निराशा सी होने लगती है  आखिर मैंने ऐसा क्यों किया  परन्तु अब कुछ नहीं हो सकता भूत काल के विषय में . वर्तमान  में सुधार कि प्रक्रिया जारी है. आदमी समय के अनुसार अपनी अक्ल लगता रहता है  और अक्ल और उम्र का मिलन नहीं हो पाता जीवन भर.
मेरे भी दो बेटे है  बड़ा बेटा अभी १२ वी का छात्र है छोटा पांचवी  में. बड़ा बेटा बचपन से ही थोडा चुस्त था  उसके साथ मुझे  अधिक समय  नहीं लगाना पड़ा  पढने में भी ठीक ठाक था थोडा शरारती अवश्य था  थोड़ी बहुत कभी पढाई पर मारा होगा किन्तु याद नहीं है  परन्तु तीन घटनाये  अच्छी तरह याद है जब उसने साथ के बच्चो के साथ एक शब्द सीखा  था " कुटा"  परन्तु उसके मुंह से सुनाई   पड़ता था " कुता" कई बार समझाने का यत्न  किया किन्तु जारी रहा कुटा. मुझे तब तक समझ  नहीं आया  था  असल कहता क्या है  कई बार तो आने जाने वालो को  भी परोस दिया गया था  यह शब्द . फिर एक दिन मुझे गुस्सा आया और माचिस  जला कर उसके मुंह पर ले गया, बस  उस दिन के बाद इसकी पुनरावृति बंद हो गयी.  परन्तु मुझे बाद  में बताया गया कि ये तो बच्चे नाराज होने पर ऐसा शब्द प्रयोग कर लेते है  तब बड़ी आत्म ग्लानि हुई.  दूसरा मौका था  जब वह अपनी बुआ के घर से खिलौना उठा लाया  और बाद में पता चला कि उन्होंने नहीं दिया बल्कि महोदय स्वयं लेकर आ गए  तब  भी मार पड़ी थी  किन्तु परिणाम सकारात्मक  रहे. तीसरी बार पांचवी में था घर में कुछ मेहमान आये थे, उनके बच्चों के साथ दूर चौराहे  तक चले गया परन्तु जब मार पड़ी तो आज तक कहीं भी जाता है तो पूछ कर या बता कर जाता है .
नितीश  और सार्थक
छोटे बेटे की  अजब कहानी है पहले दो साल तो वह न बोलता था न चलता था  डर था कही अपंग  न हो जाय. जब स्कूल भेजा तो अगले दो साल तक तो स्कूल से लगातार शिकायत रही कि यह न तो बोलता है न ही काम  करता है  घर में भी इसी तरह का सिलसिला था  अब पढाना भी था, जब सारे थक जाते तो मुझे बुला लाते, मैं हाथ उठाने के कारण  थोडा दूर ही रहता था . उसके लिए थप्पड़ का प्रयोग नहीं क्या किन्तु एक रस्सी थी मैं उससे बाँधने  का प्रयास करता  कि वह काम पर जुट जाता और होम वर्क  समाप्त . उसके बाद धीरे धीरे सुधार भी हुआ परन्तु आज भी स्थिति लचर है कुछ दिन तक ही यह प्रक्रिया रही परन्तु उसके बाद से याद नहीं है कि कभी  हाथ उठाया हो बिना  वजह के . आज भी जब पढने बिठाते है तो कभी लेट जायेगा, बैठेगा  तो पेन्सिल खो जायेगी,  या प्यास लग  जाएगी, फिर रबड़, कुछ देर बाद कापी भी मिलनी मुश्किल जाती है. धीरे धीरे भूख सताने  लगती है और " मम्मी भूख लग रही है "  और फिर कुछ देर बाद सब कुछ अगली  सुबह तक  के लिए  खो जाता है  बच्चा गहरी नींद में होता है  जगाने से भी नहीं जगता . पहाड़े  याद करने के नाम पर मैंने एडी  चोटी का जोर मार लिया किन्तु दस से आगे नहीं बढ़ पाए यद्यपि बुधि का स्तर तो तेज  है किन्तु स्तेमाल नहीं हो  पा रही है.   अब तो पिछले डेढ़ साल से मैं दिल्ली में और वे देहरादून  में, दूरी बनी हुई है.  इसके साथ मुझे कई प्रयोग करने पड़े , पढने और पढ़ाने  के लिए .
अब इतनी  दूरी पर हूँ  फोन पर ही संवाद बन रहता है दो एक महीने में मिलना हो पाता है   तब उन्हें  दी हुई सजा का मुझे अपराध बोध बना रहता है . बड़े बेटे को प्रेरित करता रहता  हूँ उसे भी पढ़ाने के लिए.  यही विकल्प टुय्सन से अच्छा  लगता है.              

बुधवार, 15 जून 2011

एक और घर पर ताला लगा ही दिया है!

  "अस्त्युत्तरस्याम दिशी देवतात्मा .हिमालयो नाम नगाधिराज :,
   पूर्वापरो तोयनिधि वगाह्या ,स्थित :पृथिव्याम एव मानदंड : ||  "
कुमारसंभव का प्रारंभ  करते हुए महा कवि कालिदास ने जिस हिमालय पर्वत को नगाधिराज की उपाधि प्रदान की उस नगाधि राज की प्राकृतिक सम्पदा, सुन्दरता  और वैभव  की असीम  ख्याति पूरे विश्व में फैली हुई है . यह  कालिदास की मात्र कल्पना नहीं थी बल्कि सजीव  और वास्तविक जीवन को धारण करने वाले पर्वत की स्तुति थी. जिस तरह पूरा विश्व आज इस नगपति के जीवन से कुछ न कुछ प्राप्त कर लेना चाहता है अपनी पताकाओं से हर व्यक्ति अपने को इस ऊँचे हिमालय की तरह ऊँचा प्रदर्शित करने की होड़ में लगा हुआ है  तो निसंदेह यह नगपति वैभवशाली  ही है .

पर्यटकों को  आकर्षित करने वाला हिमालय और हिमालयी क्षेत्र  तो पर्यटन  और घुमक्कड़ी के लिए स्वर्ग  है .
अभी जहाँ फरवरी  और मार्च में उत्तराखंड के जंगल  बुरांस के लाल फूलों की  रक्ताभ चादर सी ओढ़े हुआ था  वही आजकल ( मई और जून) में काफल , हिसोरा  और किन्गोड़े  से  लद पद है .  जंगलों में घुमक्कड़ी  करने और इन फलों को पेड़ो से तोड़ कर खाने का  आनंद ही स्वर्गिक  है.  
 हिमालयी क्षेत्र  उत्तराखंड  देव भूमि कहलाता है  यहाँ देवताओं के निवास के लिए  तो सभी सुख उपलब्ध  है . किन्तु मानवीय जीवन  अत्यंत  विकट है .  इस क्षेत्र की बड़ी विडम्बनाएं  है . यहाँ से निकलती हुई गंगा यमुना  पूरे देश को सींचती हुई, प्यास को तृप्त करती हुई, अरब सागर में जा मिलती है शेष जल के निष्पादन  के लिए . यह क्षेत्र इन इठलाती नदियों  पर गर्व भी महसूस  करता है  मैती  होने का. परन्तु पानी तलहटी से बहता चला जाता है  और खेत इन  गाँव के सूखे के सूखे .  वनस्पतीय, एवं औषधीय  सम्पदा का दोहन  का लाभ भी इस क्षेत्र  को  नहीं मिल पाता है. क्योंकि इन पर सरकारी नियंत्रण है .

  जब तक शिक्षा का प्रसार  नहीं था तब से ही क्षेत्र के लोग आजीविका  के लिए मैदानी  शहरो की ओर जाते रहे . यद्यपि खेती से होने वाले उत्पादन से साल भर का अनाज तो उपलब्ध होता था दूध , घी, शहद  की भी प्रचुरता  रही  है   जनसँख्या कम  थी . अब परिस्थितियां बदली हुई है शिक्षा में तो उत्तराखंड देश के सबसे अधिक शिक्षित राज्यों में से एक है किन्तु  बढती जनसँख्या के हिसाब से खेती का उत्पादन,  जो आसमानी बरसात पर निर्भर रहती है,   कम होता चला गया  और शिक्षा के कारण पारंपरिक खेती से युवाओं  की   रूचि और ध्यान हटता चला गया .  और वे रोजगार की खोज में पलायन करते चले गए और शहरों की  अंधी गलियों में गुमनाम  होते चले गए

पलायन से  कई लोग तो इन शहरों में पूर्णतया रच बस गए और कुछ दो नावो में पैर रख कर अपने को संभाले हुए हैं . उतराखंड को राज्य बने हुए लगभग दस वर्ष पूरे हो चुके है कितु  पलायन  को अभी भी रोका न जा सका. समस्या इतनी गंभीर है की गाँव के आस पास  सरकारी नौकरी करने वाले लोग भी गाँव छोड़ कर राज्य की राजधानी  देहरादून में जाकर बस जाना चाहते हैं . गाँव के गाँव खाली होते चले जा रहे हैं.  कई गाँव तो ऐसे मिलेगे जहाँ पुरुष  नाम की  चीज नहीं  है  शव दाह तक का कार्य महिलाओं को करना पड़ता है .  जब कोई व्यक्ति शहर में नौकरी  करता है तो उसका वहां पर मकान खरीदना, बच्चों की परवरिश हेतु धीरे धीरे बस जाना  तो कुछ समझ आता है किन्तु जो लोग गाँव से जायदाद बेच कर, पास के स्कूल में नौकरी करते हुए शहर में बसने की चाहत लिए हुए हैं या बस गए है मेरी समझ से परे है . यद्यपि जीवन वहां पर अति विकट है परन्तु ये कैसी समझदारी ?
अब कुछ इसी तरह के शिकार मेरे परिवार  के लोग भी होते जा रहे है  पांच चाचा ताउओं के हम पंद्रह भाई है  दो तीन को छोड़ कर  सभी नौकरी  पेशा है  कुछ उत्तराखंड से बाहर है तो कुछ घरेलु जनपद में ही . सभी में पूज्य बड़े भाई  सभी पारिवारिक कार्यों  जैसे विवाह समारोहों, पूजा  आदि सभी  में अग्रणी रहा करते हैं सभी उन्हें समादर  भी करते है. उन्होंने पूरा जीवन डाक विभाग में  E D A कर्मचारी की तरह  वही के लिए समर्पित कर दिया  पढ़े लिखे थे  उस समय पर विभागीय परीक्षाओं के द्वारा वे भी बाहर जा सकते थे किन्तु    नहीं  गए  . उनके दो पुत्र है बड़े वाले गाँव में ही आजीविका  का जुगाड़ करता है किन्तु  छोटा मुंबई में रहता है . बड़े बेटे  से सम्बन्ध भी थोडा ढीले  हैं भाभी जी का भी देहांत हो गया है . अब  वे छोटे बेटे के बच्चों की देखभाल में व्यस्त थे  किन्तु उसने भी अपनी समस्याओं  के मद्देनजर बच्चों  को मुंबई ले जाने की ठान ली.  अब समस्या  थी बड़े भाई साहब की खान पान की  व्यवस्था   का, तो वे साथ  में जाने को तैयार हुए चाहे वेमन  से ही .
इस बात की मुझे पहले खबर मिली  किन्तु एकाएक विश्वास सा नहीं हुआ  किन्तु अभी दो दिन पूर्व देहरादून में  जाकर पाता चला की वे सचमुच  चले  गए है  भाई  साहब की उम्र  लगभग ७६ वर्ष की होगी  अर्थात अब वे हर पारिवारिक  कार्य से भी वंचित रह जायेंगे  एक तो वृद्ध  शरीर और दूसरा आर्थिक  पहलु . दोनों ही भारी पड़ेगें.
 और आखिर कर इस विभीषिका ने एक और घर पर ताला लगा ही  दिया है.  हम लोग भी न जाने कब मिल पाएंगे  यह पता नहीं है .