रविवार, 18 जनवरी 2026

नववर्ष26 पर मतवाली यात्रा- उत्तराखंड कोटाबाग।

  2 जनवरी 2026 हमारे संस्थान के लोगों का समूह नव वर्ष के उपलक्ष‌ मे  उत्तराखंड के कोटाबाग भ्रमण करने के चलने को तैयार था। कुछ ने जाने से व्यक्तिगत कारणों से परहेज किया। 

1 जनवरी की सांय को ‌सभी व्वस्थाए पूर्ण कर ली गयी। साथ ही सभी को प्रातः 6बजे नोएडा सेक्टर 18 पर पहुंच कर गंतव्य के लिए बस पकड़नें का निर्देश  दिया गया। अब प्रतीक्षा थी प्रातः छ बजे की। सभी ने अपनी सम्भावित व्यवस्थाए गंतव्य‌  तक पहुंचनें ‌कर ली। मेरा घर सबसे नजदीक था और पैदल ही पहुंचने में मै सक्षम था। 

आवश्यकतानुसार मैने सभी ‌व्यवस्थाए रात मे ही कर ली थी। प्रातः पांच बजे का अलार्म लगा कर सो गए। किन्तु नींद खुलने मे विलम्ब और अलार्म का सुनायी‌ नही देना तथा सवा छ बजे का समय‌ को सवा चार बजे का भ्रम, सोने पर सुहागा। किन्तु उठ गया और नित्यकर्म से निवृत होने लगा। इस बीच पुनः मोबाइल पर समय देखा तो 6.45, आश्चर्य‌चकित‌ हुआ साथ मे अनेक पुकारें। एक पल लगा कि मै अब रह गया। इन पुकारों से पुनः ‌समपर्क‌ करने पर पता चला कि अभी चलने कुछ समय‌ बाकी‌ है। जल्दी मेैने बेटे‌ को‌ उठा कर बस तक, छोड़ने ‌के‌लिए कहा, ठीक सात बजे मै समूह के साथ सम्मिलित ‌हो‌ सका।

लगभग सवा सात बजे बस रवाना हुयी। तत्पश्चात इंदिरापुरम के पास कुछ अन्य साथियों को भी सम्मिलित किया और गंतव्य की ओर बस गतिमान हुयी। गनीमत थी उस दिन कोहरे से कुछ राहत के कारण दृश्यता अच्छी थीं।  प्रातः कालीन खेतो के हरे भरे दृश्य मन मोह रहे थे।

इस बीच विनीत‌ जैन जी‌ ने, समय‌ को सुगम करने के लिए  अन्ताक्षरी की उद्घोषणा कर दी । फिर ‌क्या‌ लडके और लड़कियों की टोलियां अपनी-अपनी जीत पक्की करने के लिए संघर्षरत रही। और कब हम गजरौला पहुंच गए, अहसास ही नहीं हुआ।

गजरौला मे मोगा रिसोर्ट मे अल्पाहार की व्यवस्था थी। इस अल्पाहार के हाल मे किसी ‌विवाहोत्सव का अहसास हो रहा था, तो अल्पाहार भी विवाह जन्य था।  नव्य व भव्य था।‌ खाऊ प्रकृति वालों ने तो वह खूब उंडेल दिया उदर मे।



अल्पाहार के पश्चात हमे पुनः अपने गंतव्य के लिए चलना तय था। नियति के अनुकूल हम लगभग दस बजे यहां से कोटा वाग की ओर निकल पड़े। बस ने धीरे -धीरे गति पकडी, और गतिमान हो चली। फिर बीच में एक दो जगहों पर, लघुशंका हेतु अल्पविराम ‌ले लिया गया।

दिन मे लगभग ढाई बजे हम लोग कोटा बाग अपने नियत गंतव्य स्थल रिसोर्ट मे पंहुच चुके थे। दोपहर के भोजनोपरान्त तय हुआ कि कुछ दर्शनीय स्थलों की ओर रुख किया जाय। 
 
तत्पश्चात कई गाड़ियों में हम लोग सीतावनी मन्दिर की ओर रवाना हुए। करीब दस पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर निर्जन वन के बीच मे यह मन्दिर ए एस आई की निगरानी मे स्थित है। रास्ता कच्चा, और नितान्त जंगल व सूखी, जंगली नदियों से होते हुए जाता है। अकेले व्यक्ति के या पैदल व खुली गाड़ियों जैसे बाइक आदि से जाने पर , जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है।



पांच बजे के लगभग हमार जत्था धीरे -धीरे मंदिर के पास पंहुचने लगा। मंदिर यद्यपि ‌छोटा सा ही है किन्तु पौराणिक ‌मान्यताए बडी है
सबसे आखिर मे पंहुचने वाला समूह,महभिष, मुस्कान और चांदनी थे। महभिष तो काफी डरी हुई थी, मुझे देखते ही उन्होंने एक आक्रमण किया, कहने लगी, भई आपको अपने सहयोगी कनिष्ठ मुस्कान की चिंता नहीं थी, अब भला कौन समझाए कि मेले खेले मे बड़े बच्चों ‌का‌, कौन ऊंगली पकड़ ‌कर रखता है। खैर अपनी वरिष्ठता का मान रखते हुए माफी मांगने मे ही भलाई समझी। फिर वापसी मे तो तीनो को साथ गाड़ी मे बिठा लिया।
इस मन्दिर के बारे में हमें बताया गया कि यह त्रेता युगीन स्थल है,‌ यहीं पर सीतामाता ने अपने दोनो पुत्रो, लव व कुश को जन्म दिया है। मन्दिर मे सीता माता की,‌ दोनो पुत्रो को गोद बिठाकर, मूर्ति स्थापित की गई है। यहां की खास विशेषता, पानी की तीन धाराएं है, हमें बताया गया कि पहले यहां पर तीन के स्थान पर चार धाराए थी, जिन से, एक से दूध, गरम पानी, दो धाराओं से सामान्य‌ पानी निकलता था, कि कालान्तर मे भौगोलिक संरचनात्मक बदलाव व अन्य‌ कारणों से तीन ही धाराएं शेष है, ये सभी सामान्य‌ जल का उत्पादन करती है। इस निर्जन प्रदेश के इस मन्दिर मे एक नागा साधु धुनी जमाए बैठे मिले।
यही आस पास ही बाल्मीकि आश्रम भी बताया गया। लगभग एक‌ घंटे का समय बिताने के पश्चात हम सभी लोग पुनः अपने रिसोर्ट वापस‌ चले गए।
रात्रिकालीन पार्टी ‌का‌ दौर नौ बजे से प्रारम्भ हुआ। कुछ जाम छलकते रहे। कड़ाकेदार ठंड मे लड़कियों ने अल्प वस्त्रो की पोशाक पहन डाली।  शराब और नृत्य‌, दोनो ने ठंड‌ पर कडा प्रहार किया, फिर क्या था रात‌ की बारह बजे लोग भोजन की मेज तक पंहुच‌ सके। कुछ लोग ‌तो बिना खाए ही बादशाहत तक पंहुच गए। कुछ को तो अगले दिन भी अहसास नहीं हुआ कि उन्होने रात‌ को‌ खाना खाया या नहीं।
नृत्य‌करते सहकर्मी 

खैर, रात को ही तय‌ हुआ कि प्रातः छ बजे जंगल सफारी के‌ लिए जिम कार्बेट पार्क चला‌ जाय। रात‌ जिस‌ कमरे मे मै था वहां मेरे साथी थे सुधीर ‌जी और अनीश। बस एक‌ ओर से बजाज चेतक चल रहा था तो दूसरी ओर से हीरो होंडा। फिर ‌नीद‌ का‌ हुआ कबाड़ा। फिर क्या था, प्रातः ‌पांच‌ बजे ही नित्य कर्म से निवृत्त हो बाहर निकला तो आसमान बिलकुल साफ और ठंड का अहसास नही। रिसोर्ट ‌के अन्दर दो तीन काली बतखे दिखाई ‌दी, मेरी आहट पाकर चौकन्नी तो हुयी किन्तु डरी नही।

किन्तु सहयात्रियों मे सन्नाटा। कोई भी नही जागा। साढ़े ‌छ बजे के आस पास कुछ लोग जागे और फिर सभी ‌एकत्रित‌ होने शुरू हुए। और फिर ‌सभी‌ लोग‌ बस‌ मे बैठ कर काली ढूंगी वाले गेट की ओर रवाना हुए।  वहां पर हमारे साथ चलने वाले गाइड व गाडियां प्रतीक्षा मे थे। 
आवश्यक निर्देश।

पार्क का नक्शा।

समूह का कारवां 

यह लगभग 25किमी‌ का सफर है जहां लोग इस आशा से जाते है कि उन्हें वन्य जीवों ‌से आमने-सामने साक्षात्कार हो सके, किन्तु ऐसा कभी कभी ही होता है। मानवीय‌ गतिविधियों से  जीव भी सजग रह कर दूरी बना लेते है। एक जगह पर मुश्किल से हिरन व नील गाये दिखाई दी, शेष कुछ नही। किन्तु प्रातः कालीन वन भ्रमण अपने आप मे एक संस्मरणीय है। कोलाहल से दूर शान्त व निर्जन वन। जहां सिर्फ शेष स्मृतियां थी तो जिम कार्बेट की। एक‌ शिकारी अंग्रेज की। जिसने उत्तराखंड मे कई नरभक्षी बाघ और बाघिन ‌का‌ शिकार किया।
लगभग ग्यारह बजे प्रातः  समूह वापस रिसोर्ट आ पंहुचा। नाश्ता व अन्य कार्यों ‌से‌ निवृत‌ होकर पुनः वापस नौएडा के लिए चल पडे।
अब सब थके हुए थे, इसलिए ‌बस‌ मे कुछ नींद ‌की आगोश मे थे और कु‌छ मोबाइल के आगोश में। शाम को पांच बजे पुनः मोगा रिसोर्ट पर लंच के लिए रुके। तत्पश्चात यात्रा का अंतिम ‌पडाव प्रारम्भ होता है।
गाजियाबाद से सहयात्री उतरने लगे और अपने‌घरो‌को जाने लगे।  अंत मे श्री मधुसूदन जी का परिवार,जतिन, विजय खुराना जी के साथ मै, आखिरी पड़ाव सेक्टर 18, से रात्री नौ बजे अपने घरों को लौट गए।