गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

व्यापार और रोजगार की नयी विधाये

डिजिटल युग मे ONLINE SHOPPING और व्यापार की असीमित संम्भावनाये हैं कुछ प्रयोग कर  देखे।

सोमवार, 9 मई 2016

गंगाजी का जन्मदिन- अक्षय तृतीया।




वैशाख शुक्ल पक्ष  की तृतीया को अक्षय तृतीया  का त्योहार भारत मे बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। प्रायः इस दिन पर लोग स्वर्ण व चांदी के धातुओं को व इन से निर्मित आभूषण खऱीद कर मनाते हैं। इस तिथि को अबूझ मुहूर्त या चिरंजीवी तिथि भी कहते हैं। इसी दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी का जन्म हुआ था और गणेश जी ने व्यास जी के साथ महाभारत लिखना प्रारम्भ किया। इस दिन लोग व्रत और गंगा स्नान कर,  पुण्य अर्जित करते हैं।


अनेक कहानियॉ प्रचलित है। आज ही के दिन,भारतवर्ष को जीवन प्रदान करने वाली पापनाशिनी पुण्य सलिला गंगां का जन्म भी पर्वत राज हिमालय के घऱ,मेनका के  गर्भ से ज्येष्ठ पुत्री के रूप मे हुआ।
               तृतीया नाम वैशाखे शुक्ला नाम्नाक्षया तिथिः।
               हिमालय गृहे यत्र गंगा जाता चतुर्भुजा ।।
               वैशाखे मासिशुक्लायां तृतीयायां दिनार्धके।
               बभूव देवी सा गंगा शुक्ला सत्युगाकृतिः।।
                                           वृहद्धर्मपुराण।

सती के देह त्याग के पश्चात् देवताओ ने महेश्वरी की स्तुति कर पुनः महादेव के वरण की प्रार्थना की,तभी वह स्वयं कीं इच्छानुकूल हिमालय के घर ज्येष्ठ पुत्री गंगा के रूप में प्रकट हुयी। तदन्नतर वे देवताओ के अनुरोध पर शिव के साथ कैलाश धाम चली गयी। ब्रहमा के अनरोध पर अन्तर्धानांश से अर्थात् निराकार रूप मे कमण्डलु में स्थित हो गयी।तत्पश्चात भगवान शंकर गंगा जी को लेकर वैकुण्ठ में गये। वहां विष्णु के आग्रह पर महादेव रागिनी गाने लगे,तो भावविभोर होकर विष्णु स्वयं  रसमय होकर द्रवीभूत हो गये, उसी समय ब्रहमा जी ने उस द्रव को अपने कमण्डलु से स्पर्श कराया,स्पर्श होते ही गंगा जी स्वयं निराकारा  से  नीराकार अर्थात् जलमय हो गयी।
 
दीर्घावधि तक गंगा जी कमण्डलु मे ही अवस्थित रही। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कियाऔर शुक्राचार्य के व्यवधान के पश्चात् भी राजा बलि वामन भगवान को तीन पग जमीन प्रदान करते है। जैसे ही श्री विष्णु एक पग मे धरती और दूसरे मे वैकुण्ठ धाम नाप देते


है, उसी समय ब्रहमां जी भगवान विष्णु के पैर को कमण्डलु के जल से प्रक्षालित कर देते हैं, और इस प्रकार वह जल पूर्ण रूप से ब्रहमद्रव मे परिवर्तित हो गया।

देवी भागवत के अनुसार लक्ष्मी, सरस्वती व गंगा, तीनो ही भगवान विष्णु की पत्नियां हैं। किन्तु तीनो में सदैव ईर्ष्यां के कारण कलह व्याप्त रहता था।  एक बार सऱस्वती और गंगा के झगड़े के दौरान लक्ष्मी ने गंगा का बचाव किया और सरस्वती को झगड़ा खत्म करने को कहा, परन्तु सरस्वती ने लक्ष्मी को ही शाप दे डाला कि तुम मृत्यु लोक मे जाकर वृक्ष एवं नदी स्वरूपा हो जाओ तथा गंगा को भी मृत्युलोक मे नदी रूप मे परिवर्तित होकर वहां के पाप धोने का शाप दिया। तब गंगा ने भी सरस्वती को शापित कर नदी रूप मे मृत्यु लोक जाने का कहा। 

तदनन्तर विष्णु जी ने तीनो को पास  बुलाया  और कहा लक्ष्मी तुम अपनी कला से पृथ्वी पर जाओ। वहां राजा धर्मध्वज के यहां जाकर स्वयं प्रकट हो जाना। कुछ समय बाद भारतकी पुण्य भूमि मे त्रैलोकपावनी तुलसी के रूप मे तुम्हारी ख्याति होगी, परंतु अभी तुम सरस्वती के शाप से आर्यधरा पर पद्मावती सरिता बन कर जाओ।

गंगे ! तुम्हे सरस्वती का शाप पूर्ण करने के लिये  अपने अँश से पापनाशनी पवित्र सरिता बन कर भारतवर्ष में, राजा भगीरथ के तप और अनुरोध पर जाना पड़ेगा। वहॉ धरातल पर तुम भगीरथी के नाम से प्रख्यात होगी,तथा मेरे अंश से समुद्र की पत्नी होना स्वीकार कर लेना।

“भारती!”प्रभु ने सरस्वती से कहा। तुम गंगा के शाप निहित अपनी एक कला से आर्यभूमि पर जाओ तथा पूर्ण अंश से ब्रहम सदन जाकर उनकी कामिनी बन जाओ,और गंगा अपने पूर्ण अंश से शिव के यहां जाये।  तथा लक्ष्मी को पूर्ण अंश से स्वयं के पास रहने का निर्देश दिया।
इस प्रकार इनके शाप भी भारतवर्ष के लिये वरदान साबित हुये। किन्तु लक्ष्मी के अनुरोध पर भगवान विष्णु बताते है कि कलिके पांच सहस्र वर्ष व्यतीत होने पर तुम  सरिता स्वरूपणी तीनो का उद्धार हो जायेगा और पुनःवैकुण्ठ वापस आ जाओगी।

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

मेरा नया बचपन / सुभद्राकुमारी चौहान

शायद सभी को अपना बचपन कुछ इस तरह याद आये!!!

मेरा नया बचपन / सुभद्राकुमारी चौहान


बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

कविता कोश के सौजन्य से-

सोमवार, 24 नवंबर 2014

बदलती कार्य प्रणाली, और आर्थिकी के नये साधन!!

हम छोटे थे तो कलम और दवात के साथ लिखना पढ़ना होता था। 1985 में जब नौकरी शुरु
 की तो पहली बार कम्प्यूटर देखा। सारे काम तो हाथ से ही होते थे किन्तु डाटा संग्रह कर कम्प्यूटर विभाग को दे दिया जाता था। धीरे धीरे अकांउटस्  की मोटी मोटी किताबें लिखनी आसान हो गयी। हिसाब किताब में भी गुणवत्ता के साथ साथ कार्य की गतिशीलता भी बढ़ने लगी। कम्पनी ने 1987 मे नये कम्प्यूटर मंगाये, हर विभाग में एक कम्प्यूटर लगा दिया गया। इससे कार्य क्षमता अत्यधिक बढ़ गयी। किन्तु तब आइ.टी की शिक्षा के साधन ना के बराबर थे। कभी शैक्षिक होने का प्रयास भी नही किया और आज की स्थिति का एहसास भी नही हुआ।

1990 के बाद इस कार्य प्रणाली में तेजी से बदलाव  आने लगे। तत्पश्चात् एक के बाद एक संस्थान कम्प्यूटर की शिक्षा देने के लिये प्रस्तुत हो गये। स्कूलों में भी प्राथमिकी से ही प्रोद्योगिकी पढ़ाई जाने लगी। इस क्षेत्र में नौकरियों की बाढ़ आ गयी। धनार्जन के लिए उत्तम शिक्षा सिद्ध हुयी। इस क्षेत्र के अभियन्ताओ ने कार्य की प्रणालियां ही बदल डाली।  नये नये साफ्टवेयर, एवं नयी नयी प्रजातियां कम्प्यूटर की आने लगी। तत्पश्चात् मोबाइल क्रान्ति ने तो और भी आसान कर दिया। सोशल साइटस् के कारण पूरा विश्व एक गाॉव में समा गया।कार्य संस्कृति के सभी मानक बदलने लगे। लोगों ने इसे सहर्ष स्वीकार भी किया।

समय चक्र चलता रहा और परिवर्तन तेजी से ग्राह्य होता रहा। नयी तकनीके स्वीकार करने में किसी प्रकार की कोई  परेशानी नही हुयी। पहले कुछ ही लोग टाइपिंग का काम जानते थे, किन्तु आज बच्चे से बृद्ध तक कम्प्यूटर पर टाइप आसानी से कर रहे हैं।

नौकरी के लिये सबसे उत्तम एवं सरल माध्यम बन गया। स्वरोजगार के अवसर भी बढ़ने लगे। धीरे धीरे विश्व में  सम्पन्नता और स्वावलम्बन का आवरण छाने लगा। नित नयी तकनीक का विकास होने लगा। कई कम्पनियां तो "घर से कार्य"  की संस्कृति को भी विकसित करने लगे। इतना ही नही इन्टरनेट के माध्यम से  लोग घर को ही कार्य क्षेत्र में बदलने मे सफल हो गये।

यह एक  संक्रमण काल है,अब तक घर से निकल कर कार्य करने की पद्धति रही, किन्तु अब आॉन लाइन की कार्य पद्धति के विकसित होने से,घर से ही कार्य सम्पन्न होने लगे हैं । कुछ समय बाद यह भी सम्भव हो जायेगा कि सारे काम घर बैठे बैठे निपटा लिये जायेगे। अभी अॉनलाइन शापिंग, नेट बैंकिंग, ई- टिकट, बिलो का भुगतान आदि कई काम, तकनीक का ही परिणाम है, जब भी आवश्यक हुआ कार्य आसानी से, कहीं से भी, सम्पन्न कर लिया जाता है।

अमेरिका मे इस समय कई कम्पनियों ने जन्म ले लिया है, जिन पर काम कर, धनोपार्जन किया जा रहा है।
कई विज्ञापन कम्पनियां भी इसमे शामिल हैं। य़दि फेसबुक, ट्वीटर इन्सटाग्राम  आदि पर विचरण से पता चलता है, कि वहां पर अॉनलाइन काम करना, एक अॉदोलन बन चुका है।


इसी तरह पिछले वर्ष जन्मी एक कम्पनी DS DOMINATION  ने अॉनलाइन की संस्कृति को बढ़ा कर, अपनी ट्रेनिंग और वेबिनार के माॉध्यम से हजारो लोगों को जोड़ लिया है। इतना ही नही, उन्होंने इबे(eBay) और अमेजन(Amazon) के साथ लगभग 800 मिलियन डालर का व्यापार किया है।

यह संस्कृति भविष्य में कितनी सफल होगी. यह तो मैं नही जानता। किन्तु आज एक आवश्कता बनती हुयी दृष्टि गोचर हो रही है। समय के साथ कदम ताल करने वाले हमेशा सफल होते हैं। बढते हुये कदम के लिये रास्ता यहॉ से जाता है। 
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शनिवार, 29 सितंबर 2012

ये बेचारे- रिक्शेवाले!

ये रिक्शे वाले !
सदियों से मानव का बोझ ढ़ोते आ रहे हैं,
मजदूरी की सौदे बाजी निरन्तर करते आ रहे हैं।
मैंने रिक्शे वाले को आवाज दी-
'चलोगे  चौक तक'
'जी चलूंगा'
'पैसे बताओ कितने लोगे'
'जी दे देना'
'नहीं पूरे बताओ'
'पूरे पांच रुपये'
'अच्छा मुझे नही जाना'
'बाबू जी चार दे देना'
'दो देंगे बोलो चलोगे'
'अच्छा जी तीन दे देना'
मैंने भी दो रुपये का लाभ देखकर,
रिकशे में बैठ गया।
न जाने ऐसे कितने सौदौं के शिकार होते हैं
समय और दूरी के बीच, भूखे बच्चों के लिये
जिन्दगी अकुलाती है,
और निरन्तर मानव का बोझ
भूखे पेट, खीचते चले जाते है।
ये बेचारे रिकशे वाले!
( 17 फरवरी 1990 को लिखी गयी)