शनिवार, 29 सितंबर 2012

ये बेचारे- रिक्शेवाले!

ये रिक्शे वाले !
सदियों से मानव का बोझ ढ़ोते आ रहे हैं,
मजदूरी की सौदे बाजी निरन्तर करते आ रहे हैं।
मैंने रिक्शे वाले को आवाज दी-
'चलोगे  चौक तक'
'जी चलूंगा'
'पैसे बताओ कितने लोगे'
'जी दे देना'
'नहीं पूरे बताओ'
'पूरे पांच रुपये'
'अच्छा मुझे नही जाना'
'बाबू जी चार दे देना'
'दो देंगे बोलो चलोगे'
'अच्छा जी तीन दे देना'
मैंने भी दो रुपये का लाभ देखकर,
रिकशे में बैठ गया।
न जाने ऐसे कितने सौदौं के शिकार होते हैं
समय और दूरी के बीच, भूखे बच्चों के लिये
जिन्दगी अकुलाती है,
और निरन्तर मानव का बोझ
भूखे पेट, खीचते चले जाते है।
ये बेचारे रिकशे वाले!
( 17 फरवरी 1990 को लिखी गयी)

25 टिप्‍पणियां:

  1. कितने सुंदर तरह से लिखा है रिक्षेवाले के दर्द को ...उसके जीवन को ...गहन अभिव्यक्ति ....बहुत सुंदर रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. 17 फरवरी 1990 को लिखी गयी कविता आज भी ताजगी लिए है, हालात आज भी ज्यों के त्यों बने हुए है,कुछ भी नहीं बदला, बढ़िया शब्द चित्र हेतु आभार......

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर , मार्मिक

    रिक्शेवाले से एक दो रूपये के लिए चिक चिक हर गली नुक्कड़ पे देखने को मिलती है

    मेर गाँव (:ब्लॉग) में भी तश्रीफ़ लाइयेगा . WWW.GUGLWA.COM

    उत्तर देंहटाएं


  4. ये बेचारे रिक्शेवाले …

    कमजोरों की पीड़ा समझले वही सच्चा इंसान …
    सुंदर भाव ! सुंदर कविता !

    आभार …

    उत्तर देंहटाएं



  5. ஜ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●ஜ
    ♥~*~दीपावली की मंगलकामनाएं !~*~♥
    ஜ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●ஜ
    सरस्वती आशीष दें , गणपति दें वरदान
    लक्ष्मी बरसाएं कृपा, मिले स्नेह सम्मान

    **♥**♥**♥**● राजेन्द्र स्वर्णकार● **♥**♥**♥**
    ஜ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●ஜ

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपको भी ज्योति पर्व दीपावली एवं भैया दूज की ढेरों बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं !
    अस्त-व्यस्त दिनचर्या के चलते नेट पर पर्याप्त समय नहीं दे पता हूँ,जिसका मुझे खेद है.......

    उत्तर देंहटाएं
  7. रिक्शे वालों के दर्द को जीवंत कर दिया आपने ..
    सार्थक प्रस्तुति के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुंदर प्रस्तुति
    नववर्ष की हार्दिक बधाई।।।

    उत्तर देंहटाएं
  9. सच्ची अभिव्यक्ति
    कोई लाग लपेट नही सादा सरल सोम्य भाषा आभार आपका दैन्य पीढ़ित मानव की पुकार का सजीव चित्रण है

    उत्तर देंहटाएं
  10. कौन समझना, चाहे इनको
    काम बहुत,क्या देखें इनको
    वजन खींचते, बोझा ढोते
    दर्द न जाने दुनिया वाले
    ये बेचारे रिक्शे वाले

    माँ की दवा,बहन की शादी
    जाड़ा गर्मी हो या पानी
    इक अनजानी चिंता इनको
    खाए जाती हौले हौले !
    ये बेचारे रिक्शे वाले

    उत्तर देंहटाएं
  11. हकीकत को कहती सुंदर रचना .... हम लोग ही शोषण करते हैं इन लोगों का ।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बिलकुल सही कहा आपने ....
    सार्थक रचना
    साभार !

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत दिन से आपको कोई नयी पोस्ट पढने को नहीं मिली ...आशा है सब ठीक होगा!
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत खूब..सुंदर प्रस्तुति।।।

    उत्तर देंहटाएं
  16. जो उन्हें ढो कर ले जाता है उस परिश्रमी से एक-एक रुपये के लिए चिक-चिक करते हैं और झूठी शान में कितना पैसा उड़ा देते हैं -और होता अधिकतर यही है -आखिर कब तक !

    उत्तर देंहटाएं
  17. bahut sahi v bhavnatamk likha hai aapne rikshaw vale ke baare me .very nice .

    उत्तर देंहटाएं
  18. सच है, हर तरफ मजबूर का शोषण हो रहा है, कहीं अनजाने में, कहीं डंके की चोट पर।

    उत्तर देंहटाएं
  19. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 15/07/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

    उत्तर देंहटाएं

कृपया मार्गदर्शन कीजियेगा